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करते रहो प्रयास | प्रेरणादायक दोहे और सकारात्मक सोच

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परिचय जीवन में सफलता का रास्ता हमेशा सरल नहीं होता। कई बार असफलता, ठोकर और बाधाएँ मन को निराश कर देती हैं, लेकिन निरंतर प्रयास और धैर्य ही आगे बढ़ने की राह बनाए रखते हैं। इन्हीं भावों को सरल शब्दों में व्यक्त करते हुए मैंने ये प्रेरणादायक दोहे लिखे हैं 1. करते करते ही सदा, होता है अभ्यास ।     नित नूतन संकल्प से, करते रहो प्रयास।। 2. मन से कभी न हारना, करते रहो प्रयास ।   सपने होंगे पूर्ण सब, रखना मन में आस ।। 3. ठोकर से डरना नहीं, गिरकर उठते वीर ।   करते रहो प्रयास नित, रखना मन मे धीर ।। 4. पथबाधा को देखकर, होना नहीं उदास ।    सच्ची निष्ठा से सदा, करते रहो प्रयास ।। 5. प्रभु सुमिरन करके सदा, करते रहो प्रयास ।    सच्चे मन कोशिश करो, मंजिल आती पास ।। निष्कर्ष इन दोहों के माध्यम से मन में यही कहने का प्रयास किया है कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, प्रयास की डोर हाथ से नहीं छूटनी चाहिए। धैर्य और निरंतर कर्म के साथ आगे बढ़ते रहने में ही जीवन की राह को बेहतर बनाने की उम्मीद छिपी रहती है। हार्दिक अभिनंदन🙏 पढ़िए एक और रचना निम्न लिंक पर उत्तराखंड में मधु...

सैनिक, संत, किसान | देश और समाज को समर्पित दोहा मुक्तक

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परिचय देश और समाज के निर्माण में सैनिक, संत और किसान तीनों की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है। सैनिक देश की सीमाओं की रक्षा करता है, संत अपने ज्ञान और विचारों से जीवन को दिशा देते हैं और किसान अपने परिश्रम से अन्न उपजाकर सबका पोषण करता है। इन तीनों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता के भाव को शब्द देने का मेरा यह प्रयास है। सैनिक रक्षा करते देश की, सैनिक वीर जवान । लड़ते लड़ते देश हित, करते निज बलिदान । ओढ़ तिरंगा ले विदा,  जाते अमर शहीद, नमन शहीदों को करे, सारा हिंदुस्तान ।। संत संत समागम कीजिए, मिटे तमस अज्ञान । राह सुगम होंगी सभी, मिले सत्य का ज्ञान । अमल करे उपदेश जो, होगा जीवन धन्य, मिले परम आनंद तब, खिले मनस उद्यान । किसान खून पसीना एक कर , खेती करे किसान । अन्न प्रदाता है वही, देना उसको मान । सहता मौसम मार वह, झेले कष्ट तमाम, उसके श्रम से पल रहा सारा हिंदुस्तान ।         सैनिक, संत, किसान 1) सीमा पर सैनिक खड़े, खेती करे किसान ।    संत शिरोमणि से सदा,  मिलता सबको ज्ञान।    गर्वित इन पर देश है , परहित जिनका ध्येय,    वंदनीय हैं सर्वदा...

रक्षाबंधन पर रोला छंद | भ्रात की सजी कलाई

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परिचय रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम, स्नेह और विश्वास का पावन पर्व है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधकर उसके सुख, समृद्धि और दीर्घायु की कामना करती है। प्रस्तुत ‘भ्रात की सजी कलाई’ रोला छंद में रक्षाबंधन के इसी प्रेमपूर्ण और भावनात्मक स्वरूप को शब्दों में अभिव्यक्त किया गया है। सावन पावन मास , बहन है पीहर आई । राखी लाई साथ, भ्रात की सजी कलाई ।। टीका करती भाल, मधुर मिष्ठान खिलाती । देकर शुभ आशीष, बहन अतिशय हर्षाती ।। सावन का त्यौहार, बहन राखी ले आयी । अति पावन यह रीत, नेह से खूब निभाई ।। तिलक लगाकर माथ, मधुर मिष्ठान्न खिलाया । दिया प्रेम उपहार , भ्रात का मन हर्षाया ।। राखी का त्योहार, बहन है राह ताकती । थाल सजाकर आज, मुदित मन द्वार झाँकती ।। आया भाई द्वार, बहन अतिशय हर्षायी ।  बाँधी रेशम डोर, भ्रात की सजी कलाई ।। निष्कर्ष रक्षाबंधन केवल कलाई पर बाँधी गई राखी का त्योहार नहीं, बल्कि भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और आत्मीय रिश्ते का उत्सव है। राखी की यह रेशम डोर जीवनभर स्नेह और अपनत्व का संदेश देती रहे—इसी मंगलकामना के साथ मेरी यह रक्षाबंधन पर रोला छंद रचना आपको समर्पित है...

और एक साल बीत गया | समय और जीवन पर भावपूर्ण हिंदी कविता

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परिचय समय अपनी गति से निरंतर आगे बढ़ता रहता है और देखते ही देखते एक और साल हमारी जिंदगी से गुजर जाता है। ‘और एक साल बीत गया’ समय, उम्र, जीवन की भागदौड़ और आत्मचिंतन पर आधारित एक भावपूर्ण हिंदी कविता है। यह रचना हमें जीवन की दौड़ में कुछ पल ठहरकर अपने भीतर झाँकने, जो मिला है उसे सहेजने और संतोष के साथ जीवन जीने का संदेश देती है। प्रदत्त पंक्ति ' और एक साल बीत गया' पर मेरा एक प्रयास  और एक साल बीत गया  दिन मास पल छिन  श्वास तनिक रीत गया  हाँ ! और एक साल बीत गया ! ओस की सी बूँद जैसी उम्र भी टपक पड़ी  अंत से अजान ऐसी बेल ज्यों लटक खड़ी  मन प्रसून पर फिर से आस भ्रमर रीझ गया  और एक साल बीत गया ! साल भर चैन नहीं पाने की होड़ लगी  और, और, और अधिक संचय की दौड़ लगी  भान नहीं पोटली से प्राण तनिक छीज गया और एक साल बीत गया ! जो है सहेज उसे चैन की इक श्वास तो ले जीवन उद्देश्य जान सुख की कुछ आस तो ले    मन जो संतुष्ट किया वो ही जग जीत गया  और एक साल बीत गया ! निष्कर्ष हर बीतता हुआ साल हमें यह याद दिलाता है कि जीवन केवल अधिक पाने और जोड़ने...

हरते सबके कष्ट सदाशिव भोले शंकर | शिव भक्ति कुण्डलिया छंद

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 परिचय भगवान शिव की महिमा और सावन की शिवभक्ति से भावित यह कुण्डलिया छंद सदाशिव भोले शंकर को समर्पित है। इसमें भोलेनाथ के करुणामय स्वरूप, भक्तों के प्रति उनकी कृपा और शिव नाम के प्रति आस्था को शब्द देने का प्रयास किया गया है।                        【1】 शंकर भोलेनाथ शिव , नंदीश्वर, भगवान । बाघम्बर भैरव शिवा, शम्भू कृपा निधान । शम्भू कृपा निधान, उमापति बम बम भोले । अवढर दानी नाथ, सभी की किस्मत खोले । जपते नमः शिवाय, भक्त सावन में घर घर  । हरते सबके कष्ट, सदाशिव भोले शंकर  ।।                            【2】 शिवशंकर कैलाशपति , महिमा अपरम्पार । शशिशेखर विरुपाक्ष शिव,जग के पालनहार । जग के पालनहार,  दीन के हैं रखवारे । बम बम भोले घोष, भक्त करते जयकारे । भजे सुधा कर जोरि, नमामि जै गिरिजेश्वर । करो सृष्टि उद्धार, कृपानिधि जै शिवशंकर ।। ✨धन्यवाद🙏 सावन और शिव भक्ति पर आधारित अन्य कुण्डलिया छंद  ●  मन में भरे उमंग, मनोहर पावन सावन

पा प्रियतम से प्रेम का वर्षण | वसंत ऋतु पर भावपूर्ण हिंदी कविता

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परिचय वसंत ऋतु के आगमन के साथ प्रकृति में नवजीवन और उल्लास का संचार होने लगता है। सूनी डालियों पर नए पत्ते आने लगते हैं, फूल खिल उठते हैं और वातावरण में एक नई-सी ताजगी महसूस होती है। ‘पा प्रियतम से प्रेम का वर्षण’ कविता में वसंत के इसी आगमन के साथ प्रकृति और प्रेम से जुड़ी भावनाओं को शब्द देने का प्रयास किया गया है। शिशिर शरद से गुजर धरा का , व्यथित मलिन सा मुखड़ा । धूल धूसरित वृक्ष केश सब बयां कर रहे दुखड़ा । पीत पर्ण से जीर्ण वसन लख  व्याकुल नभ घबराया । अंजुरि भर-भर स्नेह बिंदु फिर प्रेम से यूँ छलकाया । पा प्रियतम से प्रेम का वर्षण हुआ गुलाबी मुखड़ा । हर्षित मन नव अंकुर फूटे भूली पल में दुखड़ा । सीने से सट क्षितिज के पट धरा गगन से बोली । "नैना तेरे दीप दिवाली, वचन प्रेमरस होली । रंग दे मेरे मन का आँगन, अनगिन कष्ट भुलाऊँ । युग युग तेरे प्रेम के खातिर हद से गुजर मैं जाऊँ" । अधखुले नेत्र अति सुखातिरेक, नभ मंद-मंद मुस्काया । हर्षित दो मन तब हुए एक, बहुरंगी चाप बनाया । अद्भुत छवि लख मुदित सृष्टि, अभिनंदित ऋतुपति आये । करने श्रृंगारित वसुधा को फिर, स्वयं काम-रति धाये । निष्कर्ष वस...

आज प्राण प्रतिष्ठा का दिन है | श्रीराम भक्ति पर कविता

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परिचय 22 जनवरी 2024 का दिन श्रीराम भक्तों के लिए विशेष आस्था और उल्लास का दिन रहा। अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के इस ऐतिहासिक अवसर ने मन को भी राममय कर दिया। उसी भाव और वातावरण से जुड़ी अनुभूतियों को मैंने इस कविता में शब्द देने का प्रयास किया है।                              चित्र साभार 'गूगल' से हर शहर अवध सा सजा हुआ, हर सदन राम मंदिर है बना । हर मन , मन ही मन, राम जपे, हर रोम रोम में राम बसे । देखो तो राममय हवा चली, सबके उर ऐसी भक्ति जगी । जिससे जितना ही बन पाया, वह रत है राम की भक्ति में । कुछ कहते सियासी मुद्दे हैं, पर किसको लगे ये भद्दे हैं ? जगमग फिर पूरा देश हुआ, आज दीप जले हर बस्ती में । खुशियों की ऐसी लहर चली, उत्सुकता सबके हृदय पली । शिशिर अचरज स्तब्ध खड़ी, है जोश भक्ति की शक्ति में । पक्ष विपक्ष गर छोड़ दें हम, सियासत का भ्रम तोड़ दें हम । श्रद्धेय नमन उस साधक को रत अनुष्ठान व्रत भक्ति में । आज प्राण प्रतिष्ठा का दिन है , आस्था भी कहाँ मन्दिर बिन है । पंच शतक की पूर्ण प्रतीक्षा, हैं जयकारे अब ...

प्राणायाम - दिल -दिमाग को स्वस्थ बनाये | प्राणायाम पर कविता

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परिचय आज की व्यस्त जीवनशैली में शरीर के साथ मन को स्वस्थ और संतुलित रखना भी जरूरी है। प्राणायाम और ध्यान इसी ओर ध्यान दिलाते हैं। मन की चंचलता, एकाग्रता और आत्मचिंतन के भावों को समेटती मेरी यह कविता प्राणायाम की उपयोगिता को अपने ढंग से अभिव्यक्त करती है। जिम एरोबिक एक्सरसाइज, तन को स्वस्थ बनाते । हेल्दी-वेल्थी तो कहते सब , मन की सोच ना पाते । हर चौथे दिन बंक मारते, मन नहीं जिम जाने का । हेल्दी वेल्थी छोड़ - छाड़, मन जंक फूड खाने का । हास्य-आसन मे 'हा-हा' करते, मूड नहीं खुश रहता । सब कुछ होकर भी नाखुश से, मन खाली सा रहता । कुछ भी नहीं 'मन' पर मालिक बन, अपना रौब दिखाता । कभी उछलता बच्चों सा बन कभी ये रुग्ण बनाता । गौर करें आओ इस मन पर, मन है बड़ा अलबेला ! कभी हँसाता कभी रुलाता, खेले अद्भुत खेला । चेतन, अवचेतन ,अचेतन, भेद हैं इसके ऐसे । आधिपत्य हो जिसका इनपे, शासक स्व का जैसे । 'स्व-राज' तन-मन पर जिसका, मति एकाग्र कर पाता । हेल्दी-वेल्थी और वाइज बन, जीवन सफल बनाता । समझें तो 'मन' समझ ना आता, करें तो है आसान । एक्सरसाइज करते ही हैं, बाद करें कुछ ध्यान । श्वासों...

प्रभु फिर आइए | भक्तिभाव और विश्व शांति की प्रार्थना | मनहरण घनाक्षरी छंद

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परिचय कभी-कभी मन में उठते कुछ भाव शब्दों का रूप लेकर स्वयं ही रचना बन जाते हैं। ‘प्रभु फिर आइए’ भी ऐसे ही भावों से उपजी मेरी एक प्रार्थना है। संसार में बढ़ती अशांति और अधर्म को देखकर मन में यही इच्छा जागी कि प्रभु फिर आएँ और मानवता को सत्य, धर्म और प्रेम का मार्ग दिखाएँ। इन्हीं भावों को मैंने मनहरण घनाक्षरी छंद के माध्यम से शब्द देने का प्रयास किया है। जग के पालनहार, दीन करते गुहार, लेके अब अवतार, प्रभु फिर आइए । दैत्य वृत्ति बढ़ रही, कुत्सा सर चढ़ रही, प्रीत का मधुर राग, जग को सुनाइए । भ्रष्ट बुद्धि हुई क्रुद्ध, धरा झेल रही युद्ध, सृष्टि के उद्धार हेतु, चक्र तो उठाइए । कर्म की प्रधानता का, धर्म की महानता का, सत्य पुण्य नीति ज्ञान, सब को बताइये । दुष्ट का संहार कर, तेज का विस्तार कर, धुंध के विनाश हेतु, मार्ग तो सुझाइए । बने पुनः विश्व शान्ति, मिटे सभी मन भ्रांति, भक्त हो सुखी सदैव, कृपा बरसाइए । आओ न कृपानिधान, बाँसुरी की छेड़ तान, विधि के विधान अब, पुनः समझाइए  । धर्म की कराने जय, मेंटने संताप भय, दिव्य रुप धार कर, प्रभु फिर आइए । निष्कर्ष इस रचना को लि...

मन में भरे उमंग, मनोहर पावन सावन - सावन पर कुण्डलिया छंद

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परिचय सावन का मौसम आते ही प्रकृति हरियाली, वर्षा और उमंग से भर उठती है। रिमझिम फुहारों और मनोहारी पवन के बीच मन भी आनंद से सराबोर हो जाता है। सावन की इसी सुंदर अनुभूति और शिवभक्ति को कुण्डलिया छंद के माध्यम से शब्द देने का एक छोटा-सा प्रयास है।   सावन बरसा जोर से, नाच उठा मनमोर । कागज की कश्ती बही , बाल मचाये शोर ।। बाल मचाये शोर, पींग झूले की भरते । रिमझिम बरसे मेघ, भीग अठखेली करते ।। कहे सुधा सुन मीत, कि पावस है मनभावन । मन में भरें उमंग, मनोहर पावन सावन ।। आया सावन मास अब, मन शिव में अनुरक्त । पूजन अर्चन जग करे, शिव शिव जपते भक्त ।। शिव शिव जपते भक्त, चल रहे काँवर टाँगे । करते शिव अभिषेक,  मन्नतें प्रभु से माँगे ।। चकित सुधा करजोरि, देखती शिव की माया । भक्ति भाव उल्लास ,  लिये अब सावन आया ।। निष्कर्ष सावन केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि प्रकृति और मन दोनों में उमंग जगाने वाला मौसम है। वर्षा की फुहारों और शिवभक्ति से जुड़ी यही सुंदर अनुभूति इस कुण्डलिया छंद में शब्दों के रूप में उतर आई है। ✨धन्यवाद🙏 सावन की इस मनोहारी अनुभूति के साथ शिवभक्ति का भाव भी मन को सहज ...

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