उफ्फ ! "गर्मी आ गयी"– पर्यावरण विनाश और बढ़ती गर्मी पर व्यंग्यात्मक कविता
परिचय :- उफ! गर्मी आ गई केवल एक मौसम की कहानी नहीं, बल्कि मानव द्वारा प्रकृति के साथ किए गए व्यवहार का आईना है। जब सर्दी थी तब हम उससे परेशान थे, पेड़ों की छाँव को महत्व नहीं दिया, और प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ते रहे। अब बढ़ती गर्मी, लू और पर्यावरण संकट हमें उसी का परिणाम दिखा रहे हैं। प्रस्तुत कविता में गर्मी स्वयं मनुष्यों से संवाद करती है और उन्हें उनके कर्मों का स्मरण कराती है। उफ! गर्मी आ गई बसंत की मेजबानी अभी चल ही रही थी, तभी दरवाजे पर दस्तक दे गर्मी बोली— "लो, मैं आ गई!" और फिर सब एक साथ बोल उठे— "उफ! गर्मी आ गई!" हाँ! मैं आ गई, अब क्या हुआ? सखी, सर्दी जब यहाँ आई, तब भी तुम कहाँ खुश थे भाई। रोज स्मरण कर मुझे, कोसे थे सर्दी को तुम। ताने-बाने सर्दी सुनकर चुप लौटी बेचारी बनर। उसे मिटाने और निबटाने, क्या-क्या नहीं किए थे तुम! पेड़ भी सारे काट गिराए, बस तुमको तब धूप ही भाए। छाँव कहीं पर रह न जाए, राहों के भी वृक्ष कटाए। जगह-जगह अलाव जलाकर, फिर सर्दी को तुम निबटाए। गई बेचारी अपमानित होकर, बसंत आ गया फिर मुँह धोकर। दो दिन की मेहम...