विडम्बना : घरेलू हिंसा पर एक मार्मिक लघुकथा
परिचय कुछ घाव समय के साथ भर जाते हैं, पर कुछ ऐसे होते हैं जो हर दिन भीतर ही भीतर रिसते रहते हैं। जब घर की चौखट पर ही भय, अपमान और हिंसा अपना डेरा जमा लें, तब सबसे अधिक घायल वे मासूम मन होते हैं, जो अपने प्रियजनों को टूटते हुए देखते हैं। प्रस्तुत लघुकथा ऐसे ही एक बेटे की मूक वेदना और एक माँ की विवश चुप्पी की कहानी है। "माँ! क्या आप पापा की ऐसी हरकत के बाद भी उन्हें उतना ही मानती हो?" अपने और माँ के शरीर पर जगह-जगह पड़े चोट के निशान और सूजन की ओर इशारा करते हुए बेटे ने पूछा। माँ की आँखों से आँसुओं का सैलाब बह निकला। वह बेटे के उन घावों को सहलाती रही, जो उसे बचाने की कोशिश में पिता की मार से लगे थे। उसके काँपते होंठ बहुत कुछ कहना चाहते थे, पर शब्द जैसे भीतर ही दम तोड़ चुके थे। बेटा कुछ पल माँ को देखता रहा, फिर धीमे स्वर में बोला— "माँ! मैं अब बड़ा हो गया हूँ। आपकी चुप्पी का दर्द भी समझता हूँ और मेरी असहायता भी। जिस घर में माँ की इज़्ज़त सुरक्षित न हो, वहाँ बेटे का बचपन भी ज़िंदा नहीं रहता। आपके पति-परमेश्वर की इन हरकतों के विरोध में यदि कभी मेरी जुबान या हाथ उठ गए, तो शायद...