संदेश

फ़रवरी, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज

चित्र
  बाग की क्यारी के पीले हो गये हैं हाथ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है अंबर से झरती बूँद  आशा ला रही है  टिपटिप मधुर संगीत सी  भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । पढ़िये एक और रचना निम्न लिंक पर ●  बसंत की पदचाप

"पुष्प और भ्रमर"

चित्र
तुम गुनगुनाए तो मैने यूँ समझा प्रथम गीत तुमने मुझे ही सुनाया तुम पास आये तो मैं खिल उठी यूँ अनोखा बसेरा मेरे ही संग बसाया । हमेशा रहोगे तुम साथ मेरे, बसंत अब हमेशा खिला ही रहेगा तुम मुस्कुराये तो मैंं खिलखिलाई ये सूरज सदा यूँ चमकता रहेगा । न आयेगा पतझड़ न आयेगी आँधी, मेरा फूलमन यूँ ही खिलता रहेगा। तुम सुनाते रह़ोगे तराने हमेशा और मुझमें मकरन्द बढता रहेगा। तुम्हें और जाने की फुरसत न होगी मेरा प्यार बस यूँ ही फलता रहेगा ।।            "मगर अफसोस" !!! तुम तो भ्रमर थे मै इक फूल ठहरी वफा कर न पाये ? / था जाना जरूरी ? मैंं पलकें बिछा कर तेरी राह देखूँ                    ये इन्तजार अब यूँ ही चलता रहेगा । मौसम में जब भी समाँ लौट आये मेरा दिल हमेशा तडपता रहेगा कि ये "शुभ मिलन" अब पुनः कब बनेगा                                                      ...

हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते-बिखरते देखा है ;

चित्र
जंग लगे/दीमक खाये खोखले से थे वे, कलई / पालिस कर चमका दिये गये नये /मजबूत से दिखने लगे एकदम... ऐसे सामानों को बाजारों में बिकते देखा है। खोखले थे सो टूटना ही था, दोष लाने वालों पर मढ़ दिये गये... शुभ और अशुभ भी हो गयी घड़ियाँ.... मनहूसियत को बहुओं के सर मढ़ते देखा है। हाँ !मैने कुछ रिश्तों को टूटते-बिखरते देखा है। झगड़ते थे बचपन मे भी, खिलौने भी छीन लेते थे एक-दूसरे के.... क्योंकि खिलौने लेने तो पास आयेगा दूसरा, हाँ! "पास आयेगा" ये भाव था प्यार/अपनेपन का.... उन्ही प्यार के भावों में नफरत को भरते देखा है। हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है। वो बचपन था अब बड़े हुए, तब प्यार था अब नफरत है..... छीनने के लिए खिलौने थे, औऱ अब पैतृक सम्पत्ति..... तब सुलह कराने के लिए माँ-बाप थे, अब वकील औऱ न्यायाधीश.... भरी सभा में सच को मजबूरन गूँगा होते देखा है ; या यूँ कह दें-"झूठ के आगे सच को झुकते देखा है"। हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है ।। हो गयी जीत मिल गये हिस्से, खत्म हुए अब कोर्ट के किस्से... ...

फ़ॉलोअर