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श्राद्ध में करें तर्पण (मनहरण घनाक्षरी)

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  श्राद्ध में करें तर्पण, श्रद्धा मन से अर्पण, पितरों को याद कर, पूजन कराइये । ब्राह्मण करायें भोज, उन्नति मिलेगी रोज, दान, दक्षिणा, सम्मान, शीष भी नवाइये । पिण्डदान का विधान, पितृदेव हैं महान, बैतरणी करें पार  गयाजी तो जाइये । तर्पण से होगी मुक्ति, श्राद्ध है पावन युक्ति, पितृलोक से उद्धार, स्वर्ग पहुँचाइये । पितृदेव हैं महान, श्राद्ध में हो पिण्डदान, जवा, तिल, कुश जल, अर्पण कराइये । श्राद्ध में जिमावे काग, श्रद्धा मन अनुराग, निभा सनातन रीत, पितर मनाइये । पितर आशीष मिले वंश खूब फूले फले , सुख समृद्धि संग, खुशियाँ भी पाइये । सेवा करें बृद्ध जन, बात सुने पूर्ण मन, विधि का विधान जान, रीतियाँ निभाइये । हार्दिक अभिनंदन🙏 पढ़िए एक और मनहरण घनाक्षरी छंद ●  प्रभु फिर आइए

राम एक संविधान | मनहरण घनाक्षरी छंद

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परिचय मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भारतीय संस्कृति, आदर्श जीवन और धर्म के शाश्वत प्रतीक हैं। अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए आस्था और आनंद का विषय है। प्रस्तुत 'राम एक संविधान | मनहरण घनाक्षरी छंद' में रामभक्ति, प्राण-प्रतिष्ठा के उल्लास और रामराज्य की मंगलमय भावना को काव्यात्मक रूप में अभिव्यक्त करने का विनम्र प्रयास किया गया है। मनहरण घनाक्षरी छंद गूँज उठी जयकार, तोरण से सजे द्वार, पाँच शतक के बाद, शुभ दिन आये हैं ! कौशल्या दुलारे राम, दशरथ प्यारे राम, पधारे अवध धाम,                      मंदिर बनाये हैं । सज्ज हुआ सिंहद्वार, सज्ज राम दरबार, पंच मंडपों के संग, देवता दर्शाए हैं । प्रिय शिष्य हनुमान, करेंगे सभी के त्राण, राम राजकाज हेतु, गदा जो उठाये हैं । सिया राम परिवार, सुखप्रद घरबार, नयनाभिराम अति, आसन सजाये हैं । राम राज अभिषेक, प्राण-प्रतिष्ठा को देख, शिशिर में भी भक्तों के, जोश गरमाये हैं । राम आरती अजान , राम एक संविधान, भारती के प्राण राम, भक्त मन भाये है । इष्ट में विशिष्ट राम, शिष्ट में प्रकृष...

प्रभु फिर आइए | भक्तिभाव और विश्व शांति की प्रार्थना | मनहरण घनाक्षरी छंद

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परिचय कभी-कभी मन में उठते कुछ भाव शब्दों का रूप लेकर स्वयं ही रचना बन जाते हैं। ‘प्रभु फिर आइए’ भी ऐसे ही भावों से उपजी मेरी एक प्रार्थना है। संसार में बढ़ती अशांति और अधर्म को देखकर मन में यही इच्छा जागी कि प्रभु फिर आएँ और मानवता को सत्य, धर्म और प्रेम का मार्ग दिखाएँ। इन्हीं भावों को मैंने मनहरण घनाक्षरी छंद के माध्यम से शब्द देने का प्रयास किया है। जग के पालनहार, दीन करते गुहार, लेके अब अवतार, प्रभु फिर आइए । दैत्य वृत्ति बढ़ रही, कुत्सा सर चढ़ रही, प्रीत का मधुर राग, जग को सुनाइए । भ्रष्ट बुद्धि हुई क्रुद्ध, धरा झेल रही युद्ध, सृष्टि के उद्धार हेतु, चक्र तो उठाइए । कर्म की प्रधानता का, धर्म की महानता का, सत्य पुण्य नीति ज्ञान, सब को बताइये । दुष्ट का संहार कर, तेज का विस्तार कर, धुंध के विनाश हेतु, मार्ग तो सुझाइए । बने पुनः विश्व शान्ति, मिटे सभी मन भ्रांति, भक्त हो सुखी सदैव, कृपा बरसाइए । आओ न कृपानिधान, बाँसुरी की छेड़ तान, विधि के विधान अब, पुनः समझाइए  । धर्म की कराने जय, मेंटने संताप भय, दिव्य रुप धार कर, प्रभु फिर आइए । निष्कर्ष इस रचना को लि...

शरद भोर | मनहरण घनाक्षरी छंद में शरद ऋतु का मनोहारी चित्रण

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परिचय प्रकृति का प्रत्येक प्रभात अपने साथ एक नया संदेश लेकर आता है, किंतु शरद ऋतु की भोर का आकर्षण कुछ अलग ही होता है। निर्मल नभ, सुनहरी किरणें, ओस से भीगी धरती, मंद समीर और पुष्पों की भीनी सुगंध मिलकर ऐसा मनोरम दृश्य रचते हैं कि मन सहज ही प्रकृति की अनुपम छटा में खो जाता है। प्रस्तुत मनहरण घनाक्षरी में उसी मनमोहक शरद प्रभात के सौंदर्य और उसके आनंदमय वातावरण को भावों के माध्यम से अभिव्यक्त करने का विनम्र प्रयास किया गया है। मोहक निरभ्र नभ भास्कर विनम्र अब अति मनभावनी ये शरद की भोर है पूरब मे रवि रथ शशि भी गगन पथ  स्वर्णिम से अंबरांत छटा हर छोर हैं सेम फली झूम रही पवन हिलोर बही मालती सुगंध भीनी फैली चहुँ ओर है महकी कुसुम कली विहग विराव भली टपकन तुहिन बिंदु खुशी की ज्यों लोर है शब्दार्थ  -  लोर - अश्रु  निष्कर्ष शरद की यह मोहक बेला प्रकृति के सौंदर्य का उत्सव है। निर्मल आकाश, स्वर्णिम प्रभात, सुगंधित समीर और तुहिन कणों से सजा यह दृश्य मन को शांति, प्रसन्नता और नवीन ऊर्जा से भर देता है। जब हम प्रकृति के इन सूक्ष्म रूपों को हृदय से अनुभव करते हैं, तब जीवन भी उसी निर्मलता...

विश्वविदित हो भाषा

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  मनहरण घनाक्षरी (घनाक्षरी छन्द पर मेरा एक प्रयास)  हिंदी अपनी शान है, भारत का सम्मान है, प्रगति की बाट अब, इसको दिखाइये । मान दें हिन्दी को खास, करें हिंदी का विकास, सभी कार्य में इसे ही, अग्रणी बनाइये । संस्कृत की बेटी हिंदी, सोहती ज्यों भाल बिंदी, मातृभाषा से ही निज, साहित्य सजाइये । हिंदी के विविध रंग, रस अलंकार छन्द, इसकी विशेषताएं, सबको बताइये । समानार्थी मुहावरे, शब्द-शब्द मनहरे, तत्सम,तत्भव सभी, उर में बसाइये । संस्कृति की परिभाषा, उन्नति की यही आशा, राष्ट्रभाषा बने हिन्दी, मुहिम चलाइये । डिजिटल युग आज, अंतर्जाल पे हैं काज, हिंदी का भी सुगम सा, पोर्टल बनाइए । विश्वविदित हो भाषा, सबकी ये अभिलाषा, जयकारे हिन्दी के, जग में फैलाइए । पढ़िए मातृभाषा हिन्दी पर आधारित एक कविता ● बने राष्ट्रभाषा अब हिन्दी

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