मैथड - जैसे को तैसा | एक सीख देती लघुकथा
परिचय कई बार हम अपने व्यवहार में प्रेम और अपनापन रखते हुए भी यह समझ नहीं पाते कि सामने वाला हमारे साथ वैसा व्यवहार क्यों नहीं कर रहा। ऐसी ही एक उलझन माँ और बेटी के बीच हुए सहज संवाद का रूप लेती है। बेटी की मासूम-सी बात माँ को अपने ही व्यवहार पर सोचने के लिए मजबूर कर देती है। " माँ ! क्या सोच रही हो" ? "कुछ नहीं बेटा ! बस यूँ ही"। "कैसे बस यूँ ही ? आपने ही तो कहा न माँ कि आप मेरी बैस्ट फ्रैंड हैं, और मैं अपनी हर बात आपसे शेयर करूँ" ! "हाँ कहा था, तो" ? "तो आप भी तो अपनी बातें मुझसे शेयर करो न ! मैं भी तो आपकी बैस्ट फ्रेंड हुई न ! हैं न माँ"! "हाँ भई ! मेरी पक्की वाली सहेली है तू । बताऊँगी तुझे अपनी सारी बातें, पहले थोड़ा बड़ी तो हो जा" ! मुस्कुराते हुए माँ ने उसके गाल छुए। "मैं बड़ी हो गयी हूँ , माँ ! आप बोलो न अपनी बात मुझसे ! मुझे सब समझ आता है"। हाथों को आपस में बाँधकर बड़ी बड़ी आँखें झपकाते हुए वह माँ के ठीक सामने आकर बोली । "अच्छा ! इतनी जल्दी बड़ी हो गयी" ! (माँ ने हँसकर पुचकारते हुए कहा ) "हाँ म...