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प्रभु फिर आइए | भक्तिभाव और विश्व शांति की प्रार्थना | मनहरण घनाक्षरी छंद

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परिचय कभी-कभी मन में उठते कुछ भाव शब्दों का रूप लेकर स्वयं ही रचना बन जाते हैं। ‘प्रभु फिर आइए’ भी ऐसे ही भावों से उपजी मेरी एक प्रार्थना है। संसार में बढ़ती अशांति और अधर्म को देखकर मन में यही इच्छा जागी कि प्रभु फिर आएँ और मानवता को सत्य, धर्म और प्रेम का मार्ग दिखाएँ। इन्हीं भावों को मैंने मनहरण घनाक्षरी छंद के माध्यम से शब्द देने का प्रयास किया है। जग के पालनहार, दीन करते गुहार, लेके अब अवतार, प्रभु फिर आइए । दैत्य वृत्ति बढ़ रही, कुत्सा सर चढ़ रही, प्रीत का मधुर राग, जग को सुनाइए । भ्रष्ट बुद्धि हुई क्रुद्ध, धरा झेल रही युद्ध, सृष्टि के उद्धार हेतु, चक्र तो उठाइए । कर्म की प्रधानता का, धर्म की महानता का, सत्य पुण्य नीति ज्ञान, सब को बताइये । दुष्ट का संहार कर, तेज का विस्तार कर, धुंध के विनाश हेतु, मार्ग तो सुझाइए । बने पुनः विश्व शान्ति, मिटे सभी मन भ्रांति, भक्त हो सुखी सदैव, कृपा बरसाइए । आओ न कृपानिधान, बाँसुरी की छेड़ तान, विधि के विधान अब, पुनः समझाइए  । धर्म की कराने जय, मेंटने संताप भय, दिव्य रुप धार कर, प्रभु फिर आइए । निष्कर्ष इस रचना को लि...

गणपति वंदना भगवान गणेश की भक्तिमय कविता

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 परिचय श्रीगणेश को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य से पहले उनका स्मरण मन में श्रद्धा और विश्वास भर देता है। इसी भक्तिभाव से मैंने गणपति वंदना के रूप में अपने भाव शब्दों में पिरोने का प्रयास किया है। जय जय जय गणराज गजानन गौरी सुत , शंकर नंदन । प्रथम पूज्य तुम मंगलकारी करते हम करबद्ध वंदन । मूस सवारी गजमुखधारी मस्तक सोहे रोली चंदन । भावसुमन अर्पित करते हम हर लो प्रभु जग के क्रंदन । सिद्धि विनायक हे गणनायक  विघ्नहरण मंगलकर्ता । एकदंत प्रभु दयावंत तुम करो दया संकटहर्ता । चौदह लोक त्रिभुवन के स्वामी रिद्धि सिद्धि दातार प्रभु  ! बुद्धि प्रदाता, देव एकाक्षर भरो बुद्धि भंडार प्रभु  ! शिव गिरिजा सुत लम्बोदर प्रभु कोटि-कोटि प्रणाम सदा । श्रीपति श्री अवनीश चतुर्भुज  विरजें मन के धाम सदा। निष्कर्ष विघ्नहर्ता गणपति से यही प्रार्थना है कि उनकी कृपा सब पर बनी रहे और सभी के जीवन में सुख, शांति तथा सद्बुद्धि का प्रकाश बना रहे।

अब दया करो प्रभु सृष्टि पर

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भगवान तेरी इस धरती में  इंसान तो अब घबराता है इक कोविड राक्षस आकर मानव को निगला जाता है तेरे रूप सदृश चिकित्सक भी अब हाथ मले पछताते हैं वरदान से इस विज्ञान को छान संजीवनी पा नहीं पाते हैं अचल हुआ इंसान कैद जीवनगति रुकती जाती है तेरी कृपादृष्टि से वंचित प्रभु ये सृष्टि बहुत पछताती है जब त्राहि-त्राहि  साँसे करती दमघोटू तब अट्हास करे ! अस्पृश्य तड़पती रूहें जब अरि एकछत्र परिहास करे ! तन तो निगला मन भी बदला मानवता छोड़ रहा मानव साँसों की कालाबाजारी में कफन बेच बनता दानव अब दया करो प्रभु सृष्टि पर  भूलों को अबकी क्षमा कर दो! कोविड व काले फंगस को दुनिया से दूर फ़ना कर दो चित्र साभार;photopin.com से।

सुख-दुख के भंवरजाल से माँ बचा लो....

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जाने क्या मुझसे खता हो गयी ? यूँ लग रहा माँ खफा हो गई... माँ की कृपा बिन जीवन में मेरी देखो तो क्या दुर्दशा हो गयी...... माँ! माफ कर दो, अब मान जाओ इक बार मुझ पर कृपा तो बनाओ कृपा बिन तो मेरी उजड़ी सी दुनिया माँ ! बर्बाद होने से मुझको बचाओ..... माँ! तेरे आँचल के साया तले तो चिलमिलाती लू भी मुझे छू न पायी तेरी ओट रहकर तो तूफान से भी, निडर हो के माँ मैंने नजरें मिलाई..... तेरे साथ बिन मेरा,  मन डर रहा माँ ! तन्हा सा जीवन, भय लग रहा माँ ! दिव्य ज्योति से मन के अंधेरे मिटा दो, शरण में हूँ माँ मैं ,चरण में जगह दो...... ना मैं जोग जानूँ न ही तप मैं जानूँ नियम भी न जानूँ, न संयम मैं जानूँ पाप-पुण्य हैं क्या, धर्म-कर्म कैसे ? सुख -दुख के भंवरजाल से माँ बचा लो.... गुमराह हूँ मैंं, माँ सही राह ला दो, भंवर में है नैया, पार माँ लगा दो... तुम बिन नहीं मेरा,कोई सहारा माँ मूरख हूँ, अवगुण मेरे तुम भुला दो... खता माफ कर दो,माँ मान जाओ, विश्वास भक्ति का, मेरे मन में जगाओ.... भंवर में है नैया, पार माँ लगा लो... सुख-दुख के भंवरजाल से माँ बचा लो...   ...

शुक्रिया प्रभु का.......

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हम चलें एक कदम फिर कदम दर कदम यूँ कदम से कदम हम फिर बढाते चले । जिन्दगी राह सी,और चलना ही अगर मंजिल नयी उम्मीद मन में जगाते रहें। खुशियाँ मिले या गम हम चले, हर कदम शुकराने तेरे मन में गाते रहें। डर भी है लाजिमी, इन राहों पर, कहीं खाई है, तो कभी तूफान हैं । कभी राही मिले जाने-अनजाने से, कहीं राहें बहुत ही सुनसान हैं । आशा उम्मीद के संग हो थोड़ा सब्र साहस देना तो उसकी पहचान है । मन मेंं हर पल करे जो शुकराना तेरा मंजिलें पास लाना तेरा काम है । ये दुनिया तेरी, जिन्दगानी तेरी, बस यूँ जीना सिखाना तेरा काम है । कभी चिलमिलाती उमस का कहर, कभी शीत जीवन सिकुडाती सी है । कभी रात काली अमावश बनी, कभी चाँद पूनम दे जाती जो है । न हो कोई शिकवा ,न कोई गिला बस तेरे गुण ही यूँ गुनगुनाते रहें, जीवन दर्शन जो दिया तूने, शुकराने तेरे मन में गाते रहें । नयी उम्मीद मन में जगाते रहें ।

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