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प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज

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  बाग की क्यारी के पीले हो गये हैं हाथ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है अंबर से झरती बूँद  आशा ला रही है  टिपटिप मधुर संगीत सी  भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । पढ़िये एक और रचना निम्न लिंक पर ●  बसंत की पदचाप

एक मोती क्या टूटा जो उस माल से...

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एक मोती क्या टूटा जो उस माल से हर इक मोती को खुलकर जगह मिल गयी एक पत्ता गिरा जब किसी डाल से नयी कोंपल निकल कर वहाँ खिल गयी तुम गये जो घरोंदा ही निज त्याग कर त्यागने की तुम्हें फिर वजह मिल गयी लौट के आ समय पर समय कह रहा फिर न कहना कि मेरी जगह हिल गई  था जो कमजोर झटके में टूटा यहाँँ जोड़ कर गाँठ अब उसमें पड़ ही गयी कौन रुकता यहाँँ है किसी के लिए सोच उसकी भी आगे निकल ही गई तेरे जाने का गम तो बहुत था मगर जिन्दगी को अलग ही डगर मिल गई   चित्र साभार pixabay से.....

हिन्दी अपनी शान

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कुण्डलिया छन्द --   प्रथम प्रयास  【1】 हिन्दी भाषा देश की, सब भाषा सिरमोर। शब्दों के भण्डार हैं, भावों के नहिं छोर। भावों के नहिं छोर, सहज सी इसकी बोली। उच्चारण आसान, रही संस्कृत हमजोली। कहे सुधा ये बात, चमकती माथे बिन्दी। भारत का सम्मान, देश की भाषा हिन्दी  【2】 भाषा अपने देश की , मधुरिम इसके बोल। सहज सरल मनभावनी, है हिन्दी अनमोल। है हिन्दी अनमोल, सभी के मन को भाती। चेतन चित्त विभोर, तरंगित मन लहराती। कहे सुधा इक बात, यही मन की अभिलाषा। हिन्दी बने महान , राष्ट्र की गौरव भाषा।। चित्र, साभार pixabay से......

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