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जनवरी, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मिन्नी और नन्हीं तितली

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                         चित्र : साभार गूगल से कम्प्यूटर गेम नहीं मिलने पर मिन्नी बहुत बहुत रोई... गुस्से से  लाल होकर वह घर से बाहर चली गयी.... घर नहीं आउंगी चाहे जो हो, ऐसा सोच के ऐंठ गयी, पार्क में जाकर कुछ बड़बड़ाकर वहीं बैंच पर बैठ गयी । रंग बिरंगे पंखो वाली इक नन्हींं सी तितली आयी पास के फूलों में वह बैठी, कभी दूर जा मंडरायी... नाजुक रंग बिरंगी पंखों को खोल - बन्द कर इतरायी थोड़ी दूर गई पल में वह अपनी सखियों को लायी.... भाँति-भाँति की सुन्दर तितलियां मिन्नी के मन को भायी । भूली मिन्नी रोना धोना, तितली के संग संग खेली कली फूल तितली से खुश, वह अब कम्प्यूटर गेम भूली मनभाते सुन्दर फूल देख, मिन्नी खुश हो खिलखिलाई तितली सी मंडराई वह खेली, गालों में लाली छायी । साँझ हुई तो सभी तितलियाँ दूर देश को चली गयी..... कल फिर आना,मिलक़र खेलेंगे बोली और ओझल हो गयी । खुशी-खुशी और सही समय पर मिन्नी वापस घर आयी..... तरो-ताजा और भली लगती थी लाड़-प्यार सबका पायी । रात सुहाने सपनों में...

बवाल मच गया — नारी स्वतंत्रता पर व्यंग्य कविता

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परिचय समाज में स्त्री और पुरुष के लिए बनाए गए मापदंड अक्सर एक जैसे नहीं होते। पुरुष के व्यवहार को सहजता से स्वीकार कर लिया जाता है, लेकिन वही स्वतंत्रता जब स्त्री अपने लिए चुनती है तो सवाल उठने लगते हैं। ‘बवाल मच गया’ इसी दोहरे दृष्टिकोण पर तीखा व्यंग्य करती कविता है। रचना के माध्यम से स्त्री की स्वतंत्र अभिव्यक्ति, उसकी अपनी पसंद और उसके अस्तित्व को लेकर समाज की मानसिकता पर सवाल उठाया गया है।         सुन-सुन कान पक गए, उसके तो उम्र भर - इक लफ़्ज़ जो कहा तो बवाल मच गया! झुक-झुक के ताकने की कोशिश सभी किए थे, घूरती नज़र के बाणों से तन बिंधे थे। ललचाई थीं निगाहें, नज़रों से चाटते थे— घूँघट स्वयं उठाया तो बवाल मच गया! अपने ही इशारों पर नचाते रहे सदियों से, कठपुतली-सी उसे यूँ ही घुमाते रहे अँगुलियों पे। विलास का साधन उसे समझा सदा तूने - जब पाँव स्वयं थिरके तो बवाल मच गया! सदा नाचते-गाते, घोड़ी पर चढ़े दूल्हे मनमौज में थे तुम तो, वो फूँकती थी चूल्हे। अपने ही ब्याह में - इस बार नाच ली दुल्हन, तो बवाल मच गया! निष्कर्ष स्त्री की स्वतंत्रता को स्वीकार करना केवल उसके अधिकारों...

सर्द मौसम और मैं

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देखा सिकुड़ते तन को ठिठुरते जीवन को मन में ख्याल आया... थोड़ा ठिठुरने का , थोड़ा सिकुड़ने का, शॉल हटा लिया.... कानो से ठण्डी हवा , सरसराती हुई निकली, ललकारती सी बोली ; इसमें क्या ? सिर्फ शॉल हटाकर, करते मेरा मुकाबला !! लदा है तन बोझ से, मोटे ऊनी कपड़ो के तुम नहीं ठिठुर सकते ! सिकुड़ना नहीं बस में तेरे ! बस फिर क्या.... मन मुकाबले को तैयार उतार फैंके गरम कपड़े उठा लिए हथियार.... कंटीली सी हवा तन-मन बेधती निकली जब आर - पार हाथ दोनों बंधकर सिकुड़े नाक भी हुई तब लाल.... सिकुड़ने लगा तन मन  पल में मानी हार.... लपके कपड़ों पर ज्यों ही सर्द हवा को ठिठोली सूझी तेजी का रूख अपनाया फिर कपड़ो को दूर उड़ाया आव देखा न ताव देखा जब सामने अलाव देखा !!! दौड़े भागे अलाव के आगे काँप रहे थे ,बने अभागे अलाव की गर्माहट से कुछ जान में जान आयी.... पुनः सहज सी लगने लगी सर्द मौसम से अपनी लड़ाई.... मन के भावों को जैसे सर्द प्रकृति ने भांप लिया मुझे हराने, अलाव बुझाने फिर से मन में ठान लिया मारुत में फिर तेजी आयी अलाव की अग्नि भी पछता...

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