प्रेम
प्रेम अपरिभाषित एहसास। 'स्व' की तिलांजली... "मै" से मुक्ति ! सर्वस्व समर्पण भाव निस्वार्थ,निश्छल तो प्रेम क्या ? बन्धन या मुक्ति ! प्रेम तो बस, शाश्वत भाव एक सुखद एहसास !! एहसास ? हाँ ! पर होता है.. दिल का दिल से आत्मिक /अलौकिक कहीं भी, कभी भी.. बिन सोचे, बिन समझे एक अनुभूति , अलग सी बहुत दूर.. दिल के बहुत पास, टीस बनकर चुभ जाती है, औऱ उस दर्द में आनन्द आता है, असीम आनन्द ! और चुभन ? आँसू बनकर बहते आँखों से ...