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जरा अलग सा अबकी मैंने राखी पर्व मनाया

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🌺   रक्षाबंधन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं 🌺 जरा अलग सा अबकी मैने राखी पर्व मनाया । रौली अक्षत लेकर अपने माथे तिलक लगाया ।। एक हाथ से राखी लेकर दूजे पर जब बाँधी ! लगी पूछने खुद ही खुद से क्यों सीमाएं लाँघी ? भाई बहन का पर्व है राखी, क्यों अब इसे भुलाया ?  रक्षा सूत्र को ऐसे खुद से खुद को क्यों पहनाया ? दो मत दो रूपों में मैं थी अपने पर ही भारी ! मतभेदों की झड़ी लगी मुझ पे ही बारी-बारी। तिरछी नजर व्यंगबाण धर  मुझसे ही मैं बोली ! सीमा पर तैनात है तू, जो भय था लगे ना गोली ? रक्षा सूत्र बाँध स्वयं की किससे रक्षा करती  ? ऐसी भी कुछ खास नहीं ,जो बुरी नजर से डरती ! ठंडी गहरी साँस भरी फिर शाँतचित्त कह पायी ! मुझसे ही मेरी रक्षा का बंधन आज मनायी ! मैं ही हूँ दुश्मन अपनी अब जाकर मैंने जाना । अपने ही अंतर्मन रिपु को अच्छे से पहचाना । राग द्वेष, ईर्ष्या मद मत्सर ये दुश्मन क्या कम थे ! मोह चाह महत्वाकांक्षा के अपने ही गम थे । तिस पर मन तू भी बँट-छँट के यूँ विपरीत खड़ा है । वक्त-बेबक्त बात-बेबात अटकलें लिए पड़ा है शक,संशय, भय, चिंता और निराशा साथ सदा से। देता रहता बिन माँगे भी, ...

मन में भरे उमंग, मनोहर पावन सावन

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  सावन बरसा जोर से, नाच उठा मनमोर । कागज की कश्ती बही , बाल मचाये शोर ।। बाल मचाये शोर, पींग झूले की भरते । रिमझिम बरसे मेघ, भीग अठखेली करते ।। कहे सुधा सुन मीत, कि पावस है मनभावन । मन में भरें उमंग, मनोहर पावन सावन ।। आया सावन मास अब, मन शिव में अनुरक्त । पूजन अर्चन जग करे, शिव शिव जपते भक्त ।। शिव शिव जपते भक्त, चल रहे काँवर टाँगे । करते शिव अभिषेक,  मन्नतें प्रभु से माँगे ।। चकित सुधा करजोरि, देखती शिव की माया । भक्ति भाव उल्लास ,  लिये अब सावन आया ।।

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