हो सके तो समभाव रहें : जीवन की धारा से मिली अनमोल सीख
परिचय - जीवन किसी शांत सरोवर की तरह स्थिर नहीं, बल्कि निरंतर बहती हुई धारा है। इस यात्रा में कभी ठहराव मिलता है, कभी संघर्ष, कभी अपने साथ चलते हैं तो कभी राहें अकेली हो जाती हैं। यह गद्य-कविता जीवन की उसी धारा में समभाव और सकारात्मक दृष्टिकोण खोजने का एक विनम्र प्रयास है। जीवन की धारा के बीचों-बीच बहते चले गये, कभी किनारे की चाहना ही न की । बतेरे किनारे भाये नजरों को , लुभाए भी मन को , पर रुके नहीं कहीं । बहना जो था, फिर क्या रुकते ! कई किनारे अपना ठहराव छोड़ साथ भी आये, अपनापन दिखाए,कुछ बतियाये, फिर कुछ कदम साथ चलकर ठहर गये । ऐसे ही कुछ किनारे साथ-साथ चले, पर साथ नहीं चले ! धारा के मध्य आकर साथ निभाना शायद मुश्किल था उनके लिए । बस किनारे किनारे ही बराबर में दौड़ते रहे, देख-देखकर हँसते-मुस्कराते । हाँ , कहीं उलझनों में उलझा देख, वे भी किनारों पर ठीक सामने ही कुछ ठहरे, सुलझने की तरकीबें सुझाकर अलविदा बोल वापस हो लिए अपने ठहराव की ओर । आख...