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हो सके तो समभाव रहें : जीवन की धारा से मिली अनमोल सीख

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परिचय - जीवन किसी शांत सरोवर की तरह स्थिर नहीं, बल्कि निरंतर बहती हुई धारा है। इस यात्रा में कभी ठहराव मिलता है, कभी संघर्ष, कभी अपने साथ चलते हैं तो कभी राहें अकेली हो जाती हैं। यह गद्य-कविता जीवन की उसी धारा में समभाव और सकारात्मक दृष्टिकोण खोजने का एक विनम्र प्रयास है। जीवन की धारा के बीचों-बीच बहते चले गये, कभी किनारे की चाहना ही न की ।  बतेरे किनारे भाये नजरों को , लुभाए भी मन को ,  पर रुके नहीं कहीं । बहना जो था, फिर क्या रुकते ! कई किनारे अपना ठहराव छोड़ साथ भी आये,  अपनापन दिखाए,कुछ बतियाये,                         फिर कुछ कदम साथ चलकर ठहर गये ।  ऐसे ही कुछ किनारे साथ-साथ चले,  पर साथ नहीं चले !  धारा के मध्य आकर साथ निभाना  शायद मुश्किल था उनके लिए ।  बस किनारे किनारे ही बराबर में दौड़ते रहे, देख-देखकर हँसते-मुस्कराते । हाँ , कहीं उलझनों में उलझा देख, वे भी किनारों पर ठीक सामने ही कुछ ठहरे,  सुलझने की तरकीबें सुझाकर अलविदा बोल  वापस हो लिए अपने ठहराव की ओर ।  आख...

मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता : आत्मनिर्भरता की प्रेरक कहानी

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परिचय कहावत है—"मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता।" इसका अर्थ केवल कष्ट सहना नहीं, बल्कि पुराने डर, निराशा और निर्भरता को छोड़कर नए जीवन की शुरुआत करने का साहस भी है। प्रस्तुत कहानी इसी भाव को साकार करती है। वीरा और सरला जैसी दो वृद्ध महिलाओं के माध्यम से यह लघुकथा बताती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन हों, यदि मन में आत्मविश्वास हो और अनुभवों को नयी दिशा देने का साहस हो तो जीवन के किसी भी पड़ाव पर आत्मनिर्भर बनने की राह निकाली जा सकती है। "कभी-कभी जीवन में आगे बढ़ने के लिए जड़ों को नहीं, केवल सूखी शाखाओं को काटना पड़ता है। यही सोचकर वीरा उस बूढ़े नीम की छँटाई कर रही थी..."  कंधे में लटके थैले को खेत की मेंड मे रख साड़ी के पल्लू को कमर में लपेट उसी में दरांती ठूँस बड़े जतन से उस बूढ़े नीम में चढ़कर उसकी अधसूखी टहनियों को काटकर फैंकते हुए वीरा खिन्न मन से अपने में बुदबुदायी, "चल फिर से शुरू करते हैं । हाँ ! शुरू से शुरू करते हैं, एक बार फिर , पहले की तरह"।  फिर धीरे-धीरे उसकी बूढ़ी शाखें पकड़ नीचे उतरी। लम्बी साँस लेकर टहनी कटे बूढ़े नीम को देखकर बोली, "उदास म...

जो घर देखा नहीं सो अच्छा | प्रेरणादायक कहानी

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 परिचय  हम अक्सर दूर से दूसरों का जीवन देखकर उसके सुख और वैभव से प्रभावित हो जाते हैं। जो हमारे पास नहीं होता, वही हमें अधिक आकर्षक लगता है। परंतु हर चमकती हुई चीज़ सुख और संतोष का प्रतीक नहीं होती। प्रस्तुत लघुकथा इसी मानवीय प्रवृत्ति और स्वतंत्रता के महत्व को सरल किंतु मार्मिक ढंग से उजागर करती है।  एक चिड़िया ने अपने बच्चों को शहर के पॉश इलाकों में घुमाने का प्रोग्राम बनाया । जो उनके नीड़ से काफी दूर था । चिड़िया और उसके नन्हें बच्चे वहाँ जाने के लिए बहुत उत्साहित थे ।  अगले दिन बड़े तड़के सुबह ही उन्होंने उड़ान भर दी । थोड़ी देर में वे सुन्दर आलीशान भवनों और ऊँची -ऊँची इमारतों को देखकर बहुत ही खुश और आश्चर्यचकित थे, और चूँ-चूँ कर अपनी ही भाषा में अपनी माँ से उत्सुकतावश तरह तरह के सवाल कर रहे थे , माँ चिड़िया भी अपने बच्चों को बड़े लाड़ से उनके सवालों के जबाब में ही जीवन के गुर भी सिखाये जा रही थी ।  वहाँ के बाग बगीचे साफ-सुथरे और फूलों से लदे थे , जिन पर तरह तरह की रंग-बिरंगी तितलियों को मंडराते देखकर नन्हीं चिड़ियों की खुशी का तो ज्यों ठिकाना ही न था । और माँ चिड़िया ...

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