मनमुटाव तो कहीं से भी शुरू हो सकता हैं न ? | प्रेरक हिंदी लघुकथा
परिचय मनमुटाव हमेशा किसी बड़ी घटना से नहीं जन्म लेता। कई बार एक छोटी-सी बात, मन में उठी अनकही शंका या दूसरे के बारे में बना लिया गया अनुमान भी रिश्तों में दूरी पैदा कर देता है। प्रस्तुत लघुकथा "मनमुटाव तो कहीं से भी शुरू हो सकता है, न!" एक साधारण-सी घटना के माध्यम से यही बताती है कि रिश्तों की मधुरता केवल त्याग या समायोजन से नहीं, बल्कि स्पष्ट संवाद और सकारात्मक सोच से भी बनी रहती है। दूसरे के मन का अनुमान लगाने से पहले यदि हम अपने मन के भ्रम और मनमुटाव को समझ लें, तो अनेक रिश्ते अनावश्यक कटुता से बच सकते हैं। रिश्तों में मनमुटाव अक्सर छोटी-छोटी बातों से नहीं, बल्कि मन की धारणाओं से जन्म लेता है। "जाने दे बेटा ! एक कुर्सी ही तो है ,वो हो या ये, क्या फर्क पड़ता है, बैठना ही तो है न । इसी से काम चला ले"। "नहीं मम्मा ! इस टेबल के साथ की वही चेयर है। उसकी ऊँचाई भी इसी टेबल के हिसाब से है, जबकि यह चेयर उसके टेबल की है। फिर भी उसने बदल ली..." "जाने दे न बेटा ! रहने दे , शायद उ...