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मनमुटाव तो कहीं से भी शुरू हो सकता हैं न ? | प्रेरक हिंदी लघुकथा

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 परिचय मनमुटाव हमेशा किसी बड़ी घटना से नहीं जन्म लेता। कई बार एक छोटी-सी बात, मन में उठी अनकही शंका या दूसरे के बारे में बना लिया गया अनुमान भी रिश्तों में दूरी पैदा कर देता है। प्रस्तुत लघुकथा "मनमुटाव तो कहीं से भी शुरू हो सकता है, न!" एक साधारण-सी घटना के माध्यम से यही बताती है कि रिश्तों की मधुरता केवल त्याग या समायोजन से नहीं, बल्कि स्पष्ट संवाद और सकारात्मक सोच से भी बनी रहती है। दूसरे के मन का अनुमान लगाने से पहले यदि हम अपने मन के भ्रम और मनमुटाव को समझ लें, तो अनेक रिश्ते अनावश्यक कटुता से बच सकते हैं।                               रिश्तों में मनमुटाव अक्सर छोटी-छोटी बातों से नहीं, बल्कि मन की धारणाओं से जन्म लेता है। "जाने दे बेटा ! एक कुर्सी ही तो है ,वो हो या ये, क्या फर्क पड़ता है,  बैठना ही तो है न । इसी से काम चला ले"। "नहीं मम्मा ! इस टेबल के साथ की वही चेयर है। उसकी ऊँचाई भी इसी टेबल के हिसाब से है, जबकि यह चेयर उसके टेबल की है। फिर भी उसने बदल ली..." "जाने दे न बेटा ! रहने दे , शायद उ...

अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारना | एक मार्मिक पारिवारिक कहानी

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परिचय समाज बदल रहा है, लेकिन क्या हमारी सोच भी उतनी ही बदली है? कई घरों में बेटियों को आत्मसम्मान और अधिकारों की सीख दी जाती है, जबकि वही अधिकार बहू या पत्नी को नहीं मिलते। प्रस्तुत लघुकथा इसी दोहरे मापदंड पर तीखा व्यंग्य करती है। एक पति अपनी बेटी को निर्भीक बनाना चाहता है, पर जब उसकी पत्नी अपने अधिकारों की बात करती है, तो उसका अहंकार चूर-चूर हो जाता है।                    "अरे ! ये क्या सिखा रही है तू मेरी बेटी को ? ऐसे तो इसे दब्बू और डरपोक बना देगी ! फिर वहाँ सारा परिवार ही इसके सर पर नाचेगा ! भाड़ मे जाये ऐसे ससुराल वाले ! ये मेरी बेटी है ! वीरेंद्र प्रताप सिंह की बेटी ! मेरी बेटी किसी की जी हुजूरी नहीं करेगी ! ना पति की ना ही सास ससुर की । समझी कि नहीं" ?   गरजते हुए उसने अपनी पत्नी माया देवी को फटकार लगाई तो मायादेवी डरी सहमी सी हकलाते हुए बोली कि "जी, वो...वो मैं तो... वो मैं.."मैं तो बस यही कह रही थी कि ससुराल में सबके साथ सम्मान और प्रेम से रहना..."। " बस !... बस कर ! अपनी सीख अपने ही पास रख ! चाहती क्या है तू ?  ह...

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