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मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा | गढ़वाली गीत

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  ✨ परिचय (Intro) गढ़वाल की वादियों में हर मौसम अपनी अलग कहानी लेकर आता है, लेकिन मोल्यारी मास (बसंत ऋतु) का सौंदर्य कुछ खास होता है। यह गीत उसी बसंती एहसास, पहाड़ की खुशबू, बचपन की यादों और लोकजीवन की सरलता को शब्दों में पिरोता है। कलीं कलीं वनफसा फूलीं, उँण्या कुण्याँ सँतराज खिल्याँ  मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  बाट किनार बसींगा फूलीं छन रौली-खौली काली जीरी फूलीं  चल दगड़्यों म्याल खैयोला बण की डाली फलूण झूलीं उड़दि तितली रंग-बिरंगी भोंरा बि छन गुंजण लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा,डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  ऊँची डाड्यूँ मा सुनेरी उल्यार रोली खोली हर्याली छयीं छुम बजांदि दाथुणि छुमका घास घस्याण घसेरी जयीं खुदेड़ गीतुंक गुणगुणाट आँख्यूँ मा टुपि दे आँसू बह्याँ। मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ पुराण दिन याद आदिन मैति मैत्युंक लोभ लग्याँ खुद लगदि ज्यु खुदेंदी फूलूँ दगड़ी भाव बग्याँ धरती म्यरि, म्यरु पहाड़्यों स्वरग जणि च भलि लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ फसल कटि, बिखौंति मनीगे जगा जगा ...

वहम

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  "प्रिया !तुम्हारी मम्मी दिखाई नहीं दे रही कल से...क्या बात है तबियत तो ठीक है न उनकी"?  सामने वाली बालकनी से सीमा ने पूछा तो प्रिया  रूआँसी आवाज में बोली,  "नहीं आन्टी !  मम्मी ठीक नहीं हैं उन्हें कोरोना हो गया है.............कल जो कोरोना टेस्ट करने वाले आये थे न सोसाइटी में, उनके टेस्ट में मम्मी की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव है,तब से मम्मी ने अपने को कमरे में बन्द कर दिया है, और उनकी तबीयत भी ठीक नहीं है....सिर दर्द से परेशान है मम्मी.... हम कुछ भी नहीं कर पा रहे"। "अरे बेटा! पॉजिटिव रिपोर्ट तो मेरी भी आयी कल,  मुझे भी बहुत टेंशन हुई और साथ में शक भी ........ ।   तो मैंने जाकर प्राइवेट अस्पताल में दुबारा टेस्ट करवाया वहाँ मेरी रिपोर्ट नेगेटिव आयी......।  और तुम्हारी मम्मी तो घर पर ही रहती हैं और उन्हें कल तक तो कोरोना के कोई भी लक्षण नहीं थे ,फिर पॉजिटिव रिपोर्ट मिलते ही तबियत कैसे खराब हो गयी...? बेटा ! अपनी मम्मी का एक बार और टेस्ट करवाइए, कहीं उनकी तबियत बिगड़ने का कारण उनका वहम तो नहीं"। "जी आन्टी ! आप सही कह रही हैं, मैं पापा को बताती हूँ"...

खून के हैं जो रिश्ते , मिटेंगे नहीं

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  तुम कहते रहोगे वो सुनेंगे नहीं अब तुम्हारे ही तुमसे मनेंगे नहीं इक कदम जो उठाया सबक देने को चाहकर भी कदम अब रुकेंगे नहीं जा चुका जो समय हाथ से अब तेरे जिन्दगी भर वो पल अब मिलेंगे नहीं जोड़ते -जोड़ते वक्त लगता बहुत टूटे  रिश्ते सहज तो जुड़ेंगे नहीं तेरे 'मैं' के इस फैलाव की छाँव में तेरे नन्हे भी खुलके बढेंगे नहीं छोटी राई का पर्वत बना देख ले खाइयां पाटकर भी पटेंगे नहीं चढ़ ले चढ़ ले कहा तो चढ़े पेड़ पर अब उतरने को कोई कहेंगे नहीं निज का अभिमान इतना बड़ा क्या करें  घर की देहरी पे जो झुक सकेंगे नहीं जो दलीलें हों झूठी, और इल्ज़ाम भी सच के साहस के आगे टिकेंगे नहीं दिल के रिश्तों को जोड़ा फिर तोड़ा, मगर  खून के हैं जो रिश्ते , मिटेंगे नहीं ऐसे ही रिश्तों पर आधारित मेरा एक और सृजन ●  उठे वे तो जबरन गिराने चले

तमाशा देखो दाना फेंको

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  सु बह सुबह सीमा ने हमेशा की तरह छत पर चिड़ियों के लिए दाना डाला और वहीं कोने में आसन बिछाकर योग करने बैठी तो देखा कि एक कबूतर बाकी कबूतरों को दाने के आस-पास भी नहीं फटकने दे रहा .... कुछ कबूतर उससे दाना लेने की फिराक में लड़ रहे हैं तो कुछ आकर सीमा के आसन के इर्दगिर्द गुटरगूँ करते हुए घूम रहे हैं मानों उस कबूतर की शिकायत करके अपने लिए अलग दाना-पानी माँग रहे हों.....।         सीमा को उन पर दया आयी और लड़ने वाले कबूतर पर गुस्सा.......।                                                            जी चाहा कि लड़ाकू कबूतर को पकड़कर खूब खरी-खटी सुनाये कि हम मनुष्यों का फेंका दाना खा-खाकर आखिर तुममें भी स्वार्थ और बैमनस्य की भावना आ ही गयी ।  अरे ! प्यार से रहो न जैसा हमेशा रहते आये हो.....    क्यों तुम भी हम मनुष्यों की तरह तेरा मेरा करने लगे...? पर सोचा कि इन्हें कहाँ कुछ समझ आयेगा हमें भी कौन सा आता है.....

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