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तकनीक के बढ़ते कदम और सिमटती मानवीय संवेदनाएँ

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                          डिजिटल जुड़ाव के बीच बदलता जीवन आज की तकनीक-संचालित दुनिया में यदि कोई चीज़ सबसे तेज़ी से हमारे जीवन का हिस्सा बनी है, तो वह है डिजिटल जुड़ाव । सुबह की पहली किरण के साथ आँख खुलते ही हाथ स्मार्टफोन की ओर बढ़ता है और रात को सोने से पहले की आखिरी झलक भी अक्सर स्क्रीन पर ही ठहरती है। फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप ने दूरियों को कम किया है। अब किसी से बात करने के लिए दूरी कोई बाधा नहीं रही। आज हमारे पास संपर्कों की कमी नहीं है। मित्रों और फॉलोअर्स की संख्या बढ़ती जा रही है, संदेशों का आदान-प्रदान पहले से कहीं अधिक है, फिर भी मनुष्य के भीतर अकेलेपन का एहसास क्यों बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है? सुविधाएँ तो बहुत बढ़ी हैं, लेकिन इस आभासी जुड़ाव के बीच हमारी वास्तविक आत्मीयता और संवेदना कहीं पीछे तो नहीं छूट रही? संवेदना के बदलते अर्थ संवेदना, करुणा, सहानुभूति और आपसी समझ ही वे गुण हैं, जो मनुष्य को केवल बुद्धिमान प्राणी नहीं, बल्कि मनुष्य बनाते हैं। तकनीक हमारे काम को सरल कर सकती है, समय बचा सकती है और...

बीती ताहि बिसार दे -अतीत छोड़कर वर्तमान में जीने की कला

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परिचय :- क्या आप भी बार-बार अपनी पुरानी बातों और दुखद यादों में खो जाते हैं? क्या बीता हुआ कल आज की खुशियों पर भारी पड़ता है? यदि हाँ, तो “बीती ताहि बिसार दे” केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन को सरल और सुखी बनाने का एक गहरा मंत्र है। अतीत को छोड़कर ही वर्तमान में सच्ची खुशी मिलती है । अतीत की यादें हमें क्यों सताती हैं : अतीत का दामन थामें मन कभी-कभी अतीत के भीषण बियाबान में पहुँच जाता है और भटकने लगता है — उसी तकलीफ के साथ जिससे वर्षों पहले उबर भी चुका था। दुखद यादें धीरे-धीरे मन और ध्यान में उतर जाती हैं। वे बीते घावों की पपड़ियाँ खुरचकर उस दर्द को फिर से ताज़ा कर देती हैं। हमें पता भी नहीं चलता कि यादों के झुरमुट में फँसकर हम अनजाने में उन्हीं कष्टों को दोबारा जी रहे होते हैं, जिनसे हम बड़ी बहादुरी से पार पा चुके थे। नकारात्मक सोच का वर्तमान पर प्रभाव कहा जाता है कि हम जिस पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वही हमारे जीवन में बढ़ने लगता है। ऐसे में, जब हम बार-बार बीते दुखों का ध्यान...

जीवन की राहों में आखिर असली प्रतिस्पर्धा किससे है ? | प्रेरणादायक लेख

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जीवन की राहों में असली प्रतिस्पर्धा किससे है? बचपन से परीक्षाओं में अव्वल रहने वाले लोग अक्सर यह मान लेते हैं कि वे जीवन की हर प्रतिस्पर्धा में सफल होंगे। लेकिन क्या सच में ऐसा होता है? जीवन की राहों में असली प्रतिस्पर्धी कौन? बचपन से परीक्षाओं में उत्तीर्ण और कक्षा में उत्तीर्ण रहने वाले लोगों को अपनी बुद्धिमानी पर कभी कोई संदेह नहीं रहता । उन्हें विश्वास हो जाता है कि जीवन की हर परीक्षा भी वे अपनी बुद्धि के बल पास कर ही लेंगे ।  लेकिन अक्सर वे नहीं जानते कि जीवन की  परीक्षाएं कुछ अलग होती हैं — यहाँ प्रतिस्पर्धी अपने ही होते हैं। अपनों से प्रतिस्पर्धा का सच  यह सच सामने आता भी है, तो वे सोचते हैं — "अपनों से प्रतिस्पर्धा में भला क्या डर!" हार भी अपनी और जीत भी अपनी । आगे बढ़ने की कीमत: अकेलापन इसीअपनत्व और स्नेह के भाव के साथ वे आगे बढ़ते हैं। लेकिन जैसे ही वे दूसरों से दो कदम आगे निकलते हैं, वे खुद को अकेला पाते हैं। क्यों खींचते हैं लोग पीछे? क्योंकि अपनों के साथ होने वाली ऐसी प्रतिस्पर्धाएं अक्सर आगे बढ़ने की होती ही नहीं, ये प्रतिस्पर्धाएं तो किसी को आगे बढ़ने से...

आवश्यकता आविष्कार की जननी

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  कहते हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी है । क्योंकि अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए कोई भी प्राणी हाथ पैर तो पटकता ही है ।  तो हम यह भी कह सकते हैं कि आवश्यकता हमें उद्यमी बनाती है । ऐसा ही एक वाकया याद आया । कुछ दिनों पहले एक तरुणी से मिलना हुआ कुछ परेशान लग रही थी तो पूछने पर बोली,"क्या करूँ परेशान हूँ । यहाँ (ससुराल में) सबकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर ही पा रही । सब कह रहे हैं कि पूरे गाँव भर में बड़ी तारीफें थी तुम्हारी। बड़ी उद्यमी लड़की बता रहे थे तुम्हें सारे गाँव वाले। पर यहाँ तो ऐसा कुछ तुम कर नहीं रही ।  अब आप ही बताइये यहाँ मैं कौन सा पहाड़ उखाड़ूँ  ! घर गाँव में तो खेत-खलिहान के दसों काम करती थी यहाँ जो है वही तो करुँगी न ।  ग्रेजुएशन पूरी हुई नहीं अभी, नौकरी भी क्या खाक मिलेगी मुझे" !  और भी ना जाने क्या- क्या । जो कुछ था मन में सब एक साँस में कहती चली गयी वह । कभी रुँआसी होकर तो कभी आक्रोश में, बिना रुके बोले जा रही थी , बस बोले जा रही थी । और मैं चुपचाप उसे देख रही थी ,सुन रही थी और समझ रही थी, बस । और करती भी क्या, शायद वो चाहती भी तो यही थी मुझसे ।...

सीख दुनियादारी की

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छि! क्या दुनिया है ?...कैसी दुनिया है?...बड़ी अजीब दुनिया है....ऐसी ही है ये दुनियादारी...!!! लोगों से बार-बार ऐसे शब्द सुन तंग आ गयी दुनिया की रूह! फिर लिया फैसला और चली  हर एक नवजात शिशु को दुनिया में आते ही दुनिया का हाल बताने ।  ताकि उसे न लगे इतनी अजीब ये दुनिया । न हो दुनिया से शिकायत ! और न सुनाये वह भी दुनिया को दुनियादारी के ताने । वह मिली हर उस नवजातक से, जो दुनिया और दुनियादारी से बेखबर आँखे मूँदे मन्द-मन्द मुस्करा रहा था । बन्द मुट्ठी में लायी अपनी तकदीर को होले होले से हिला रहा था ।  नहीं जानता था वो दुनिया के दुख-सुख, रिश्ते - नाते और नहीं पता था उसे अच्छाई क्या और बुराई क्या ! अभी तो मानो विधाता से ही चल रही थी उसकी गुप्तगू ! विधाता के सिवा उसके लिए कहीं भी कुछथा ही नहीं । उसके पास जाकर धीरे से बोली ,                            "हे नन्हें नाजुक प्यारे से नवजातक ! मुझे सुनो ! बड़े ध्यान से सुनो !                           ...

आइना' समाज का | शराब की लत और पत्नी की बेबसी पर मार्मिक संस्मरण

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परिचय सुबह की सैर केवल शरीर को नहीं, मन को भी अनेक अनुभव दे जाती है। उस दिन भी मैं रोज़ की तरह मॉर्निंग वॉक पर निकली थी। रास्ते में जो दृश्य देखा, उसने कदम तो आगे बढ़ा दिए, लेकिन मन बहुत देर तक उसी जगह अटका रहा। यह केवल एक शराबी व्यक्ति की कहानी नहीं थी, बल्कि उस पत्नी की भी थी, जो पति के गुस्से, अपमान और नशे के बावजूद उसे सुरक्षित घर ले आने की कोशिश में लगी रही। शराब केवल व्यक्ति को नहीं, पूरे परिवार को तोड़ती आज मॉर्निंग वॉक करते-करते मैं सामान्य से कुछ अधिक दूर निकल गई। सड़क किनारे बने बस स्टॉप की बेंच पर बैठकर थोड़ा विश्राम कर ही रही थी कि पास से किसी सिक्योरिटी गार्ड की तेज़ आवाज़ सुनाई दी। वह किसी पर गुस्सा कर रहा था। कुछ लोग भी वहाँ इकट्ठा होने लगे।। जिज्ञासावश मैं भी वहाँ पहुँची। देखा, एक व्यक्ति सड़क के बीचों-बीच नशे की हालत में पड़ा हुआ था। सिक्योरिटी गार्ड उसे डाँटते हुए उठाने की कोशिश कर रहा था ताकि कोई दुर्घटना न हो जाए। तभी लगभग अधेड़ उम्र की एक महिला तेज़ी से वहाँ पहुँची। उसने गार्ड के साथ मिलकर उस व्यक्ति को सड़क के किनारे बैठाया और गार्ड का धन्यवाद किया। अब समझ आ...

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