फर्क : कोरोना काल में मानवीय संवेदनाओं पर व्यंग्य
परिचय कोरोना काल में संक्रमण से बचाव के लिए सावधानी और स्वच्छता जरूरी थी। लेकिन संकट के समय भी मनुष्य का व्यवहार उसके सामाजिक भेदभाव को उजागर कर देता है। यह लघुकथा इसी दोहरे व्यवहार पर सहज और व्यंग्यात्मक ढंग से सवाल उठाती है। फर्क ट्रिंग-ट्रिंग... डोरबेल की आवाज सुनते ही माधव ने दरवाजा खोला। सामने एक व्यक्ति खड़ा था। “जी?” “मैं बैंक से आया हूँ। आपने लोन के लिए आवेदन किया है?” इतना सुनते ही माधव के चेहरे पर मुस्कान फैल गई। वह बड़े आदर से बैंक कर्मचारी को अंदर ले आया। “जी, जी सर जी! आइए प्लीज... बैठिए सर जी।” उसे सोफे पर बैठाकर माधव ने पत्नी को आवाज लगाई—“श्रीमती जी! देखिए, सर जी आए हैं। जल्दी से चाय-नाश्ते की व्यवस्था करो। पहले पानी, ठंडा वगैरह लाओ।” बैंक कर्मचारी ने संकोच से कहा, “नहीं-नहीं, इसकी कोई जरूरत नहीं है। आप लोग कष्ट न करें। धन्यवाद आपका।" “अरे सर जी! कैसी बातें करते हैं? कष्ट कैसा? ये तो हमारे भारतीय संस्कार हैं—‘अतिथि देवो भवः’... है न!” माधव की बनावटी हँसी के बीच कुछ ही देर में मेज कोल्ड ड्रिंक, चाय और नाश्ते से सज गई। तभी फिर डोरबेल बजी। ट्रिंग-ट्रिंग...