आज मौसम का रुख जब उसे समझ आया | भावपूर्ण हिंदी कविता
परिचय (Introduction) कभी-कभी हम अपनों की खुशियों के लिए इतना कुछ सहते रहते हैं कि स्वयं को भूल जाते हैं। समय बीतने के बाद जब सचाई का एहसास होता है, तब पछतावे के अलावा बहुत कुछ हाथ नहीं आता। प्रस्तुत कविता "आज मौसम का रुख जब उसे समझ आया" जीवन, रिश्तों, त्याग और आत्मबोध की ऐसी ही मार्मिक अनुभूति को शब्द देती है । "रिश्तों में त्याग, आत्मबोध और जीवन के बदलते मौसमों पर आधारित हिंदी कविता" की जो नादानियाँ तब खुद पे अब तरस आया आज मौसम का रुख, जब उसे समझ आया तप्त तो था मौसम वो कड़वी दवा पीती रही वजह बेवजह ही खुद को सजा देती रही सजा-ए-दर्द सहे मन भी बहुत पछताया आज मौसम का रुख जब उसे समझ आया हाँ ! मौसम की ये फितरत ना समझ पाती थी उसकी खुशियों के खातिर कुछ भी कर जाती थी उसकी गर्मी और सर्दी में खुद को उलझाया आज मौसम का रुख जब उसे समझ आया दी सजाएं जो रोग बनके तन में पलती रही नैन बरसात से बरसे ये उम्र ढ़लती रही कुछ सुहाना हुआ मौसम पर न अब रास आया आज मौसम का रुख जब उसे समझ आया। सुख में दुःख में जो न सम्भले वो दिन रीत गये सर्दी गर्मी और बरसात के दिन बीत गये ढ़ल गयी साँझ, देखो ...