अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारना | एक मार्मिक पारिवारिक कहानी
परिचय समाज बदल रहा है, लेकिन क्या हमारी सोच भी उतनी ही बदली है? कई घरों में बेटियों को आत्मसम्मान और अधिकारों की सीख दी जाती है, जबकि वही अधिकार बहू या पत्नी को नहीं मिलते। प्रस्तुत लघुकथा इसी दोहरे मापदंड पर तीखा व्यंग्य करती है। एक पति अपनी बेटी को निर्भीक बनाना चाहता है, पर जब उसकी पत्नी अपने अधिकारों की बात करती है, तो उसका अहंकार चूर-चूर हो जाता है। "अरे ! ये क्या सिखा रही है तू मेरी बेटी को ? ऐसे तो इसे दब्बू और डरपोक बना देगी ! फिर वहाँ सारा परिवार ही इसके सर पर नाचेगा ! भाड़ मे जाये ऐसे ससुराल वाले ! ये मेरी बेटी है ! वीरेंद्र प्रताप सिंह की बेटी ! मेरी बेटी किसी की जी हुजूरी नहीं करेगी ! ना पति की ना ही सास ससुर की । समझी कि नहीं" ? गरजते हुए उसने अपनी पत्नी माया देवी को फटकार लगाई तो मायादेवी डरी सहमी सी हकलाते हुए बोली कि "जी, वो...वो मैं तो... वो मैं.."मैं तो बस यही कह रही थी कि ससुराल में सबके साथ सम्मान और प्रेम से रहना..."। " बस !... बस कर ! अपनी सीख अपने ही पास रख ! चाहती क्या है तू ? ह...