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मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा | गढ़वाली गीत

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  ✨ परिचय (Intro) गढ़वाल की वादियों में हर मौसम अपनी अलग कहानी लेकर आता है, लेकिन मोल्यारी मास (बसंत ऋतु) का सौंदर्य कुछ खास होता है। यह गीत उसी बसंती एहसास, पहाड़ की खुशबू, बचपन की यादों और लोकजीवन की सरलता को शब्दों में पिरोता है। कलीं कलीं वनफसा फूलीं, उँण्या कुण्याँ सँतराज खिल्याँ  मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  बाट किनार बसींगा फूलीं छन रौली-खौली काली जीरी फूलीं  चल दगड़्यों म्याल खैयोला बण की डाली फलूण झूलीं उड़दि तितली रंग-बिरंगी भोंरा बि छन गुंजण लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा,डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  ऊँची डाड्यूँ मा सुनेरी उल्यार रोली खोली हर्याली छयीं छुम बजांदि दाथुणि छुमका घास घस्याण घसेरी जयीं खुदेड़ गीतुंक गुणगुणाट आँख्यूँ मा टुपि दे आँसू बह्याँ। मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ पुराण दिन याद आदिन मैति मैत्युंक लोभ लग्याँ खुद लगदि ज्यु खुदेंदी फूलूँ दगड़ी भाव बग्याँ धरती म्यरि, म्यरु पहाड़्यों स्वरग जणि च भलि लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ फसल कटि, बिखौंति मनीगे जगा जगा ...

पराया धन - बेटी या बेटा

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                  चित्र, साभार pixabay से "अनुज सुन ! वो...पापा...पापा को हार्टअटैक आया है। भाई !  हम बहुत परेशान हैं माँ का रो - रोकर बुरा हाल है , ...हैलो ! हैलो ! अनुज तू सुन तो रहा है न" ?  सिसकते हुए अनु ने पूछा तो उधर से निधि (अनुज की पत्नी) बोली, "दीदी मैं सुन रही हूँ अनुज तो बाथरूम में हैं मैं बताती हूँ उन्हें"। "निधि तुम दोनों आ जाओ न । ऐसे वक्त में हमें तुम्हारी बहुत जरूरत है। प्लीज निधि ! अनुज को फोन करने को कहना ! ओके" ! कहकर अनु जल्दी से फोन रख दवाइयों का लिफाफा लेकर भागी। अनु कभी माँ को संभालती तो कभी दवाइयाँ वगैरह के लिए भागदौड़ करती फिर भी बार-बार मोबाइल स्क्रीन चैक करती कि कहीं अनुज की कॉल मिस न हो जाय ।  सुबह से शाम ढ़ल गयी पर अनुज का फोन नहीं आया तो अनु को लगा कि शायद सीधे आ रहे होंगे दोनों । इसलिए कॉल नहीं किया होगा। पापा की हालत जानकर परेशान हो गये होंगे बेचारे । माँ ने पूछा तो बता दिया कि निधि को बताया है शायद निकल पड़े होंगे इसीलिए फोन नहीं कर पाये होंगे। और माँ भी बेटे की बाट जोहने लगी।  ऑपरेशन सफल रहा...

आओ ! खुद से प्यार करें

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चित्र साभार pixabay.com से चलो स्वयं से इश्क लड़ाएं  कुछ मुस्काएं कुछ शरमाए ! एक गुलाब स्वयं को देकर वेलेंटाइन अपना मनाएं ! आओ खुद से प्यार करें! लव-शब कह इजहार करें! बने-ठने कुछ अपने लिए, दर्पण में आभार करें !! इक छोटी सी डेट पे जाएं , कॉफी संग कोई मेज सजाएं । कुछ कह लें कुछ सुन लें यारा! खुद से खुद की चैट कराएं !! खुदगर्जी नहीं खुद से प्यार यह तो तन मन का अधिकार तन-मन  से ही है ये जीवन कर लें जीवन का सत्कार !! अरमानों के बीच खड़े, दौलत के मायाजाल बड़े। कभी तो निकलें इन सब से, खुद से खुद के लिए लड़ें ! अपनों की परवाह हमें अपनी भी कुछ आज करें छोटी-छोटी फतह सराहें अपने पर कुछ नाज करें मरूथल से बीहड़ जीवन का  मन -आँगन गुल्जार करें ! वेलेंटाइन के अवसर पर आओ ! खुद से प्यार करें।।          

मुझे बड़ा नहीं होना - दिल छू लेने वाली हिंदी लघुकथा

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"मुझे बड़ा नहीं होना" बचपन की मासूम सोच और भावनाओं पर आधारित दिल छू लेने वाली लघुकथा - "दादू ! अब से न मैं आपको प्रणाम नहीं करूंगा ?" हाथ से हाथ बाँधते हुए दादू के बराबर बैठकर मुँह बनाते हुए विक्की बोला। " अच्छा जी ! तो हाय हैलो करोगे या गुड मॉर्निंग, गुड नाइट "। दादू मुस्कुराते हुए बोले, "सब चलेगा छोटे साहब! आखिर हम मॉडर्न विक्की के सुपर मॉडर्न दादू जो हैं । और हम तुम्हें हर हाल में वही आशीर्वाद देंगे जो हमेशा देते हैं-- खुश रहो और जल्दी से बड़े हो जाओ ।"  "ओह्ह!  दादू, फिर से वही ?   विक्की चिढ़कर बोला और अपने नन्हें हाथों से सोफे पर हल्का मुक्का मार दिया । " प्लीज दादू अपना आशीर्वाद बदल दीजिए -- खासकर दूसरा वाला ! !" दादू ठठाकर हँसते हुए बोले,  “अरे! बड़ा नहीं होना क्या ?” विक्की का चेहरा अचानक गंभीर हो गया। वह दादू के सामने आकर खड़ा हो गया और उनकी आँखों में देखते हुए बोला— "नहीं दादू ! सच्ची में बड़ा नहीं होना । आप इसकी जगह कोई और आशीर्वाद दीजिए न , कोई भी" ।   दादू ने हैरानी से पूछा, "पर क्यों ? छोटे साहब ?"  व...

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