तन में मन है या मन में तन ? : एक आत्मचिंतन
संक्षिप्त परिचय तन में मन है या मन में तन?" यह प्रश्न जितना सरल प्रतीत होता है, उतना ही गहन और रहस्यमय भी है। मन कभी असीम विस्तार लेकर समस्त संसार में विचरण करने लगता है तो कभी सूक्ष्म होकर तन के भीतर ही कहीं सिमट जाता है। प्रस्तुत चिंतन मन की इसी मायावी प्रकृति, उसके प्रभाव और उसे समझने की मानवीय यात्रा को अभिव्यक्त करता है। ये मन भी न पल में इतना वृहद कि समेट लेता है अपने में सारे तन को, और हवा हो जाता है जाने कहाँ-कहाँ ! तन का जीव इसमें समाया उतराता उकताता जैसे हिचकोले सा खाता, भय और विस्मय से भरा, बेबस ! मन उसे लेकर वहाँ घुस जाता है जहाँ सुई भी ना घुस पाये, बेपरवाह सा पसर जाता है। बेचारा तन का जीव सिमटा सा अपने आकार को संकुचित करता, समायोजित करता रहता है बामुश्किल स्वयं को इसी के अनुरूप वहाँ जहाँ ये पसर चुका होता है सबके बीच। लाख कोशिश करके भी ये समेटा नहीं जाता, जिद्दी बच्चे सा अड़ जाता है । अनेकानेक सवाल और तर्क करता है समझाने के हर प्रयास पर , और अड़ा ही रहता है तब तक वहीं जब...