तीन कुण्डलिया :- भारत महान, हार और विचलित
अनुभूति पत्रिका में प्रकाशित तीन कुण्डलिया कुण्डलिया हिन्दी साहित्य का एक लोकप्रिय छंद है जो अपनी लय, भाव और संदेश के कारण पाठकों को आकर्षित करता है। प्रस्तुत हैं तीन कुण्डलिया— 'भारत महान', 'हार' और 'विचलित'। इन रचनाओं में देशप्रेम, संघर्ष में सकारात्मक सोच तथा मानसिक संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया गया है। भारत महान सारे जग मे हो रहा ,भारत का गुणगान । शुभ संस्कारी भावना, है इसकी पहचान । है इसकी पहचान, सभ्यता बड़ी निराली । सर्व धर्म सत्कार, बनाता गौरवशाली । कहे सुधा सुन मीत, लगा लो तुम भी नारे । भारत देश महान, कह रहे जग में सारे।। हार हार करें स्वीकार जो, होते नहीं निराश । सतत परिश्रम कर सदा,मन में रखते आस ।। मन में रखते आस, नहीं बाधा से डरते । गिरकर उठते रोज, कभी ना मन से थकते ।। कहे सुधा निज बात, है यही जीत का सार । करते रहें प्रयास, सौपान बनेगी हार ।। बिचलित विचलित गर मन हो रहा, कर लें प्राणायाम । साधें श्वास - प्रश्वास निज, मिले सुखद आराम ।। मिले सुखद आराम, धैर्य मन में है आता । मिटे बिचार विकार, भाव निर्मल हो जाता ।। कहे सुधा सुन मीत,श्वास साधें जो नियमित...

करते रहो प्रयास बहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंसुंदर,प्रेरक, सकारात्मक संदेश देती ऊर्जावान अभिव्यक्ति दी।
जवाब देंहटाएंसस्नेह
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार १४ अक्टूबर २०२५ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सुंदर बोध देते दोहे
जवाब देंहटाएंसकारात्मक ऊर्जा का संचार करती बहुत सुन्दर दोहावली ।
जवाब देंहटाएंसार्थक, सामयिक बहुत सुन्दर होदे ...
जवाब देंहटाएंये दोहे सच में मन को हिम्मत देते हैं। आप बड़ी सरल भाषा में बहुत काम की बात कह जाते हैं। मुझे अच्छा लगा कि आप अभ्यास, धैर्य और भरोसे को बार-बार याद दिलाते हैं, क्योंकि असल ज़िंदगी में यही सबसे ज़्यादा काम आते हैं।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर सीख देती रचना
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