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छटाँक भर का | भावनात्मक हिंदी कहानी

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  यह एक भावनात्मक हिंदी कहानी है जो माता-पिता और बच्चे के रिश्ते की गहराई को दर्शाती है। "छटाँक भर का" कहानी माता-पिता की वृद्धावस्था को देखकर बेटे के मन की चिंता, भय और उनके प्रति असीम प्रेम को दर्शाती है । छटाँक भर का – एक भावनात्मक हिंदी कहानी "ओ गॉड ! ये तो मेरे साथ चीटिंग है " ! एयरपोर्ट से बाहर निकलते बेटे के मुँह से ऐसे शब्द सुनते ही शर्मा जी और उनकी पत्नी एक दूसरे का मुँह ताकने लगे । बेटे से मिलने का उत्साह जैसे कुछ ठंडा सा पड़ गया ।   सोचने लगे कहाँ तो हमें लगा कि इतने समय बाद हमें देखकर बेटा खुश होगा पर ये तो भगवान को ही कोसने लगा है" । तभी बेटा आकर दोनों के पैर छूकर गले मिला और फटाफट सामान को गाड़ी में रखवा कर तीनों जब बैठ गए तब पापा ने चुटकी लेते हुए कहा , " क्यों रे ! किसका इंतजार था तुझे ? कौन आयेगा तुझे लेने यहाँ..?.. हैं ?... अच्छा आज तो वेलेंटाइन डे हुआ न तुम लोगों का ! कहीं कोई दोस्त तो नहीं आयी है लेने ! हैं ?..  बता दे "? बेटा चिढ़ते हुए - "मम्मी ! देख लो पापा को ! कुछ भी बोल देते हैं" । "सही तो कह रहे तेरे पापा" -...

हम फल नहीं — बालमन और माँ के प्रेम की भावपूर्ण लघुकथा

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परिचय कभीकभी-कभी बच्चों के छोटे-से व्यवहार में भी मन को छू लेने वाली बड़ी संवेदनाएँ दिखाई देती हैं। परिवार में किसी अपने की तकलीफ बच्चों के मन को भी प्रभावित करती है और वे अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को पीछे रखकर अपनों की खुशी के बारे में सोचने लगते हैं। इसी भाव ने मुझे यह लघुकथा लिखने के लिए प्रेरित किया। ‘हम फल नहीं खायेंगे’ में बालमन की सहज संवेदना और परिवार के प्रति प्रेम को शब्द देने का प्रयास किया है।                          आज बाबा जब अपने लाए थोड़े से फलों को बार - बार देखकर बड़े जतन से टोकरी में रख रहे थे तब रीना ने अपने छोटे भाई रवि को बुलाकर धीमी आवाज में समझाया कि बाबा जब माँ को फल काटकर देंगे और माँ हमेशा की तरह हमें खिलायेगी तो हम फल नहीं खायेंगे ! सुनकर रवि बोला, "क्यों नहीं खायेंगे ? दीदी ! ऐसे तो माँ परेशान हो जायेगी न ! अगर परेशान होकर और बीमार हो गयी तो ? नहीं मुझे माँ को परेशान नहीं करना ! मैं तो चुपचाप खा लूँगा " । कहकर वो जाने लगा तो रीना ने उसकी कमीज पकड़कर उसे पास खींचा और फिर वैसी ही दबी आवाज में बोली, ...

नोबची

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"ये क्या है मम्मा ! आजकल आप हमसे भी ज्यादा समय अपने पौधों को देते हो"...? शिकायती लहजे में पलक और पल्लवी ने माँ से सवाल किया। "हाँ बेटा !  ये पौधे हैं ही इतने प्यारे...अगर तुम भी इन पर जरा सा ध्यान दोगे न , तो मोबाइल टीवी छोड़कर मेरी तरह इन्हीं के साथ समय बिताना पसन्द करोगे,  आओ मैं तुम्हें इनसे मिलवाती हूँ"....माँ उनका ध्यान खींचते हुए बोली। दोनों  पास आये तो माँ ने उन्हें गमले में उगे पौधे की तरफ इशारा करते हुए कहा  "देखो !  ये है नोबची" नोबची ! ये कैसा नाम है ?...दोनों ने आँख मुँह सिकोड़ते हुए एक साथ पूछा। "हाँ ! नोबची,  और जानते हो इसे नोबची क्यों कहते है" ? "क्यों कहते हैं" ?   उन्होंने पूछा तो माँ बोली, "बेटा ! क्योंकि ठीक नौ बजे सुबह ये पौधा अपने फूल खिलाता है"। हैं !!.नौ बजे !!...हमें भी देखना है।  (दोनों बड़े आश्चर्यचकित एवं उत्साहित थे) और अगली सुबह समय से पहले ही दोनों बच्चे नोबची पर नजर गड़ाए खड़े हो गये। बस नौ बजने ही वाले है दीदी !  हाँ  पलक ! और देख  नोबची भी खिलने लगा है !!!... नोबची की खिलखिलाहट के साथ अपनी बेटियों...

सोसायटी में कोरोना की दस्तक — कोरोना काल की एक और व्यंग्यात्मक लघुकथा

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 परिचय कोरोना काल में संक्रमण से बचाव के लिए सावधानी और नियमों का पालन बेहद जरूरी था। लेकिन कई बार संकट की घड़ी में भी मनुष्य अपनी सुविधा और स्वार्थ को प्राथमिकता देने लगता है। प्रस्तुत व्यंग्यात्मक लघुकथा इसी मानसिकता पर हल्के-फुल्के अंदाज में कटाक्ष करती है। सोसायटी में कोरोना की दस्तक “माफ कीजिएगा, इंस्पेक्टर साहब! आपसे एक रिक्वेस्ट है। कृपया सोसायटी का गेट बंद मत कीजिए। और यह नोटिस भी गेट के बाहर चिपकाने की क्या जरूरत है? आप इसे हमें दे दीजिए। हम सोसायटी के सभी लोगों को इसकी जानकारी दे देंगे। इसे सोसायटी ऑफिस के बाहर लगा देंगे, वहाँ सभी की नजर पड़ जाएगी। आप बेफिक्र रहिए।” सोसायटी के प्रधान राकेश चौहान की बात सुनकर इंस्पेक्टर साहब बोले, “चौहान जी, मुझे यह समझ में नहीं आ रहा कि आप गेट को सील क्यों नहीं करने देना चाहते। आपकी सोसायटी में इसके अलावा दो गेट और हैं। इस गेट के पास वाले अपार्टमेंट में कोरोना पॉजिटिव मरीज मिला है। ऐसे में सबकी सुरक्षा को देखते हुए इस गेट का बंद होना जरूरी है। आपको इसमें क्या परेशानी है?” “परेशानी तो कुछ नहीं, सर! बस सोच रहे थे कि यह गेट हम ही अंदर से लॉक...

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