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मन की गिरहें | पारिवारिक हिंदी कहानी

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मन बड़ा विचित्र होता है। कभी बिना कारण प्रसन्न हो उठता है तो कभी अपनों के प्रेम में भी उपेक्षा खोज लेता है। जब नकारात्मक विचारों का जाल मन पर हावी हो जाता है, तब वास्तविकता धुँधली पड़ जाती है। प्रस्तुत कहानी ऐसी ही एक स्त्री की है, जो अपने ही मन की उलझनों में उलझकर अपनों के प्रेम को समझ नहीं पाती। बेटे की नौकरी अच्छी कम्पनी में लगी तो शर्मा दम्पति खुशी से फूले नहीं समा रहे थे,परन्तु साथ ही उसके घर से दूर चले जाने से दुःखी भी थे । उन्हें हर पल उसकी ही चिंता लगी रहती ।  बार-बार उसे फोन करते और तमाम नसीहतें देते । उसके जाने के बाद उन्हें लगता जैसे अब उनके पास कोई काम ही नहीं बचा, और उधर बेटा अपनी नयी दुनिया में मस्त था ।     पहली ही सुबह वह देर से सोकर उठा और मोबाइल चैक किया तो देखा कि घर से इतने सारे मिस्ड कॉल्स! "क्या पापा ! आप भी न ! सुबह-सुबह इत्ते फोन कौन करता है" ? कॉलबैक करके बोला , तो शर्मा जी बोले, "बेटा ! इत्ती देर तक कौन सोता है ? अब तुम्हारी मम्मी थोड़े ना है वहाँ पर तुम्हारे साथ, जो तुम्हें सब तैयार मिले ! बताओ कब क्या करोगे तुम ?  लेट हो जायेगी ऑफिस के...

अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारना | एक मार्मिक पारिवारिक कहानी

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परिचय समाज बदल रहा है, लेकिन क्या हमारी सोच भी उतनी ही बदली है? कई घरों में बेटियों को आत्मसम्मान और अधिकारों की सीख दी जाती है, जबकि वही अधिकार बहू या पत्नी को नहीं मिलते। प्रस्तुत लघुकथा इसी दोहरे मापदंड पर तीखा व्यंग्य करती है। एक पति अपनी बेटी को निर्भीक बनाना चाहता है, पर जब उसकी पत्नी अपने अधिकारों की बात करती है, तो उसका अहंकार चूर-चूर हो जाता है।                    "अरे ! ये क्या सिखा रही है तू मेरी बेटी को ? ऐसे तो इसे दब्बू और डरपोक बना देगी ! फिर वहाँ सारा परिवार ही इसके सर पर नाचेगा ! भाड़ मे जाये ऐसे ससुराल वाले ! ये मेरी बेटी है ! वीरेंद्र प्रताप सिंह की बेटी ! मेरी बेटी किसी की जी हुजूरी नहीं करेगी ! ना पति की ना ही सास ससुर की । समझी कि नहीं" ?   गरजते हुए उसने अपनी पत्नी माया देवी को फटकार लगाई तो मायादेवी डरी सहमी सी हकलाते हुए बोली कि "जी, वो...वो मैं तो... वो मैं.."मैं तो बस यही कह रही थी कि ससुराल में सबके साथ सम्मान और प्रेम से रहना..."। " बस !... बस कर ! अपनी सीख अपने ही पास रख ! चाहती क्या है तू ?  ह...

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