जब साधन स्वामी बन बैठा – मोबाइल की लत पर हिंदी कविता कविता
परिचय मोबाइल फोन आज हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। संवाद, शिक्षा, काम और मनोरंजन जैसे अनेक कार्य अब उसी के माध्यम से पूरे हो जाते हैं। समस्या मोबाइल के होने में नहीं, बल्कि उसके असीमित और असंयमित उपयोग में है। जब एक साधन धीरे-धीरे हमारा समय, हमारा ध्यान और हमारे रिश्ते नियंत्रित करने लगे, तब वह सुविधा नहीं, आदत बन जाता है। "जब साधन स्वामी बन बैठा" कविता इसी बदलती जीवनशैली का संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करती है। यह कविता केवल मोबाइल की लत की बात नहीं करती, बल्कि उन अनमोल रिश्तों, संवादों, बचपन की सहजता और मानवीय आत्मीयता की ओर भी ध्यान दिलाती है, जो अनजाने में डिजिटल दुनिया की चमक के पीछे छूटते जा रहे हैं। वो तो पुरानी बातें थी जब तन्हाई से डरते थे । अपना कोई साथ रहे सब ऐसा सोचा करते थे । टीवी, रेडियो, गपशप, बातें, करते दिन ढल जाता था । हँस लेते थे जब अपनों संग, हर कष्ट बड़ा टल जाता था । फिर एक दिन तेरे आने से, बदला जीने का अंदाज़ । अब अपने हर पल पर यारों इस छोटी स्क्रीन का राज । ऐसी लत लगी तेरी कि सबकुछ पीछे छूट गया । घर आँगन और अपनो...