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मार्च, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तीन कुण्डलिया :- भारत महान, हार और विचलित

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अनुभूति पत्रिका में प्रकाशित  तीन कुण्डलिया कुण्डलिया हिन्दी साहित्य का एक लोकप्रिय छंद है जो अपनी लय, भाव और संदेश के कारण पाठकों को आकर्षित करता है। प्रस्तुत हैं तीन कुण्डलिया— 'भारत महान', 'हार' और 'विचलित'। इन रचनाओं में देशप्रेम, संघर्ष में सकारात्मक सोच तथा मानसिक संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया गया है।  भारत महान सारे जग मे हो रहा ,भारत का गुणगान । शुभ संस्कारी भावना, है इसकी पहचान ।  है इसकी पहचान, सभ्यता बड़ी निराली । सर्व धर्म सत्कार, बनाता गौरवशाली । कहे सुधा सुन मीत, लगा लो तुम भी नारे । भारत देश महान, कह रहे जग में सारे।। हार हार करें स्वीकार जो, होते नहीं निराश । सतत परिश्रम कर सदा,मन में रखते आस ।। मन में रखते आस, नहीं बाधा से डरते । गिरकर उठते रोज, कभी ना मन से थकते ।। कहे सुधा निज बात, है यही जीत का सार । करते रहें प्रयास, सौपान बनेगी हार ।। बिचलित विचलित गर मन हो रहा, कर लें प्राणायाम । साधें श्वास - प्रश्वास निज, मिले सुखद आराम ।। मिले सुखद आराम, धैर्य मन में है आता । मिटे बिचार विकार, भाव निर्मल हो जाता ।। कहे सुधा सुन मीत,श्वास साधें जो नियमित...

"तन्हाई रास आने लगी"

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वो तो पुरानी बातें थी जब हम...... अकेलेपन से डरते थे कोई न कोई साथ रहे ऐसा सोचा करते थे कभी तन्हा हुए तो  टीवी चलाते, रेडियो बजाते... फिर भी चैन न आये तो फोन करते, दोस्तों को बुलाते..... जाने क्यों तन्हाई से डरते थे पर जब से मिले तुम..!!! सब बदल सा गया, बस तेरे ख्यालों में... मन अटक सा गया..!!! अब कोई साथ हो , तो वह खलता है मन में बस तेरा ही सपना पलता है... सपनीली दुनिया में  ख्वावों की मन्जिल है उसमें हम तुम रहते फिर तन्हा किसको कहते ? अब तो घर के उस कोने में मन अपना लगता है, जहाँ न आये कोई बाधा  ख्यालों में न हो खलल  बस मैं और तुम..... मेरे प्यारे मोबाइल!!! आ तेरी नजर उतारूँ अब तुझ पर ही मैं अपना हर पल वारूँ..... जब से तुझसे मन लगाने लगी तब से....सच में..... तन्हाई रास आने लगी......। अब तो ....... कहाँ हैं...कैसे हैं ....कोई साथ है..... कोई फर्क नहीं पड़ता.... रास्ता भटक गये!!! तो भी नहीं कोई चिन्ता बस तू और ये इन्टरनैट साथ रहे ...... तो समझो सब कुछ सैट अब तो बस .…...... तुझ पर ही मन...

सुख-दुख के भंवरजाल से माँ बचा लो....

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जाने क्या मुझसे खता हो गयी ? यूँ लग रहा माँ खफा हो गई... माँ की कृपा बिन जीवन में मेरी देखो तो क्या दुर्दशा हो गयी...... माँ! माफ कर दो, अब मान जाओ इक बार मुझ पर कृपा तो बनाओ कृपा बिन तो मेरी उजड़ी सी दुनिया माँ ! बर्बाद होने से मुझको बचाओ..... माँ! तेरे आँचल के साया तले तो चिलमिलाती लू भी मुझे छू न पायी तेरी ओट रहकर तो तूफान से भी, निडर हो के माँ मैंने नजरें मिलाई..... तेरे साथ बिन मेरा,  मन डर रहा माँ ! तन्हा सा जीवन, भय लग रहा माँ ! दिव्य ज्योति से मन के अंधेरे मिटा दो, शरण में हूँ माँ मैं ,चरण में जगह दो...... ना मैं जोग जानूँ न ही तप मैं जानूँ नियम भी न जानूँ, न संयम मैं जानूँ पाप-पुण्य हैं क्या, धर्म-कर्म कैसे ? सुख -दुख के भंवरजाल से माँ बचा लो.... गुमराह हूँ मैंं, माँ सही राह ला दो, भंवर में है नैया, पार माँ लगा दो... तुम बिन नहीं मेरा,कोई सहारा माँ मूरख हूँ, अवगुण मेरे तुम भुला दो... खता माफ कर दो,माँ मान जाओ, विश्वास भक्ति का, मेरे मन में जगाओ.... भंवर में है नैया, पार माँ लगा लो... सुख-दुख के भंवरजाल से माँ बचा लो...   ...

ऐ वसंत! तुम सबको खुशियों की वजह दे दो ....

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                     चित्र : साभार Shutterstock से ऐ रितुराज वसंत ! तुम तो बहुत खुशनुमा हो न !!! आते ही धरा में रंगीनियां जो बिखेर देते हो ! बिसरकर बीती सारी आपदाएं  खिलती -मुस्कराती है प्रकृति, मन बदल देते हो, सुनो न ! अब की कुछ तो नया कर दो ! ऐ वसंत ! तुम सबको खुशियों की वजह दे दो। हैं जो दुखियारे, जीते मारे -मारे कुछ उनकी भी सुन लो, कुछ दुख तुम ही हर लो, पतझड़ से झड़ जायें उनके दुख,कोंपल सुख की दे दो ! ऐ वसंत ! तुम सबको खुशियों की वजह दे दो । तेरे रंगीन नजारे, आँखों को तो भाते हैं । पर  लब ज्यों ही खिलते हैं, आँसू भी टपक जाते हैं, अधरों की रूठी मुस्कानो को हंसने की वजह दे दो ! ऐ वसंत! तुम सबको खुशियों की वजह दे दो । तेरी ये शीतल बयार, जख्मों को न भाती है भूले बिसरे घावों की,पपड़ी उड़ जाती है, उन घावों पर मलने को, कोई मलहम दे दो ! ऐ वसंत ! तुम सबको खुशियों की वजह दे दो । तरसते है जो भूखे, दो जून की रोटी को मधुमास आये या जाये, क्या जाने वे तुझको, आने वाले कल की,उम्मीद नयी दे दो ! ऐ वसंत !...

इम्तिहान - "जिन्दगी का "

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उम्मीदें जब टूट कर बिखर जाती है, अरमान दम तोड़ते यूँ ही अंधेरों में । कंटीली राहों पर आगे बढ़े तो कैसे ? शून्य पर सारी आशाएं सिमट जाती हैं । विश्वास भी स्वयं से खो जाता है, निराशा के अंधेरे में मन भटकता है। जायें तो कहाँ  लगे हर छोर बेगाना सा , जिन्दगी भी तब स्वयं से रूठ जाती है। तरसती निगाहें  सहारे की तलाश में , आकर सम्भाले कोई ऐसा अजीज चाहते हैं । कौन वक्त गँवाता है , टूटे को जोड़ने में बेरुखी अपनों की और भी तन्हा कर जाती है । बस यही पल अपना इम्तिहान होता है .... कोई सह जाता है , कोई बैठे रोता है । बिखरकर भी जो निखरना चाहते है.... वे ही उस असीम का आशीष पाते हैं । उस पल जो बाँध लें, खुद को अपने में इक ज्योत नजर आती मन के अँधेरे में.... हौसला रखकर मन में जो आशा जगाते हैं, इक नया अध्याय तब जीवन में पाते हैं ।।                 चित्र : साभार Shutterstock से...

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