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प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज

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  बाग की क्यारी के पीले हो गये हैं हाथ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है अंबर से झरती बूँद  आशा ला रही है  टिपटिप मधुर संगीत सी  भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । पढ़िये एक और रचना निम्न लिंक पर ●  बसंत की पदचाप

हाइबन

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                               【1】 एक विधवा वन से लकड़ियां काटकर उन्हें घर -घर बेचकर अपने परिवार का भरण पोषण करती थी अचानक वन विभाग से लकड़ी काटने पर सख्त मनाही होने से वह जंगल से लकड़ियां नहीं ला पायी तो घर में भुखमरी की नौबत आ गयी उससे ये सब सहा न गया तो वह रात के अंधेरे में जंगल से लकड़ियां चुराने निकल पड़ी, उसने लकड़ियां काटकर गट्ठर तैयार किया और उठाने ही वाली थी कि तभी भयंकर चिंघाड़ सुनकर उसके हाथ पैर ठंडे पड़ गये देखा तो उसके ठीक सामने चीता खड़ा था , काटो तो खून नहीं वाली हालत थी उसकी डर से...बचने का कोई तरीका नहीं सूझ रहा था उसे...अनायास ही उसने दोनो हाथ जोड़ दिये और जैसी थी वैसी ही जड़ हो गयी, उसने बताया चीता उसके और करीब आया इतना करीब कि अब उसे उसका पीछे का हिस्सा ही दिखाई दे रहा था और वह अपलक स्थिर हाथ जोड़े खड़ी थी उसे लगा कि चीते ने उसे सूंघा और क्षण भर बाद वह मुड़ गया और वहां से चला गया। इसी खौफनाक दृश्य पर निर्मित्त् हाइबन ...... लकड़ी गट्ठा~ करबद्ध महिला चीता सम्मुख             ...

जन्म 'एक और गरीब का

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                                                                  खिल ही  जाते हैं गरीब की बगिया में भी मौसमानकूल कुछ फूल चाहे अनचाहे, सिसकते सुबकते कुछ अलसाये से । जिनके स्पर्श से जाग उठती है , उनकी अभावग्रस्त मरियल सी आत्मा । आशा की बुझती चिनगारी को फूँकनी से फूँक मार-मारकर, जलाते हैं हिम्मत की लौ । पीठ पर चिपके पेट और कंकाल सी देह को उठाकर धोती के चिथड़े से कमर कसकर सींचने लगते हैं ये अपनी बगिया । सिसकियाँ फिर किलकारियों में बदलती हैं ! और मुस्कराने लगती है इनकी कुटिया !              फिर इन्हीं का सहारा लिए  बढने लगती है    इनकी भी वंशबेल। हर माँ-बाप की तरह ये भी बुनते हैंं, चन्द रंगीन सपने ! और फिर अपनी औकात से बढ़कर, केंचुए सा खिंचकर तैयार करते हैं, अपने नौनिहाल के सुनहरे भविष्य का बस्ता ! उसे शिक्षित और स्वावलंबी बनाने हेतु भेजते हैं अपनी ही तरह  घिसते-पिटते सरक...

दर्द होंठों में दबाकर....

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उम्र भर संघर्ष करके रोटियाँ अब कुछ कमाई झोपड़ी मे खाट ताने नींद नैनों जब समायी नींद उचटी स्वप्न भय से क्षीण काया जब बिलखती दर्द होठों में दबाकर भींच मुट्ठी रूह तड़पती... शिथिल देह सूखा गला जब घूँट जल को है तरसता हस्त कंपित जब उठा वो सामने मटका भी हँसता ब्याधियाँ तन बैठकर फिर आज बिस्तर हैं पकड़ती दर्द होंठों में दबाकर भींच मुट्ठी रुह तड़पती ये मिला संघर्ष करके मौत ताने मारती है असह्य सी इस पीर से अब जिन्दगी भी हारती है खत्म होती देख लिप्सा रोटियाँ भी हैं सुबकती दर्द होंठों में दबाकर भींच मुट्ठी रुह तड़पती                           चित्र साभार गूगल से.... ऐसे ही एक और रचना वृद्धावस्था पर  " वृद्धावस्था   "

अपनों को परखकर....

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 अपनों को परखकर यूँ परायापन दिखाते हो  पराए बन वो जाते हैं तो आंसू फिर बहाते हो न झुकते हो न रुकते क्यों बातें तुम बनाते हो  उन्हें नीचा दिखाने को खुद इतना गिर क्यों जाते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर बहाते हो अपनों को परखकर...... मिले रिश्ते जो किस्मत से निभाना है धरम अपना जीत लो प्रेम से मन को यही सच्चा करम अपना तुम्हारे साथ में वो हैं तो हक अपना जताते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर बहाते हो। अपनों को परखकर ...... कोई रिश्ता जुड़ा तुमसे निभालो आखिरी दम तक सुन लो उसके भी मन की, सुना लो नाक में दम तक बातें घर की बाहर कर, तमाशा क्यों बनाते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर बहाते हो अपनों को परखकर...... ये घर की है तुम्हारी जो, उसे घर में ही रहने दो कमी दूजे की ढूँढ़े हो, कमी अपनी भी देखो तो बही थी प्रेम गंगा जो, उसे अब क्यों सुखाते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर बहाते हो अपनों को परखकर.... चले घर त्याग करके जो, तो जाने दो न रोको तुम जहाँ खुश हैं रहें जाकर, न जाके उनको टोको तुम क्यों जाने वालों को घर की राह फिर फिर दिखाते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर ...

कभी ले हरी नाम अरी रसना!

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फूटे घट सा है ये जीवन भरते-भरते भी खाली है कभी ले हरि नाम अरी रसना ! अब साँझ भी होने वाली है..... जब से हुई भोर और आँख खुली जीवन, घट भरते ही बीता कितना भी किया सब गर्द गया खुद को पाया रीता-रीता धन-दौलत जो भी कमाई है सब यहीं छूटने वाली है। कभी ले हरी नाम अरी रसना! अब साँझ भी होने वाली है...... इस नश्वर जग में नश्वर सब रिश्ते-नाते भी मतलब के दिन-रैन जिया सब देख लिया अन्तर्मन को अब तो मथ लें... मुरलीधर माधव नैन बसा छवि जिनकी बहुत निराली है कभी ले हरी नाम अरी रसना! अब साँझ भी होने वाली है......                            चित्र, photopin.comसे...

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