संदेश

दिसंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तीन कुण्डलिया :- भारत महान, हार और विचलित

चित्र
अनुभूति पत्रिका में प्रकाशित  तीन कुण्डलिया कुण्डलिया हिन्दी साहित्य का एक लोकप्रिय छंद है जो अपनी लय, भाव और संदेश के कारण पाठकों को आकर्षित करता है। प्रस्तुत हैं तीन कुण्डलिया— 'भारत महान', 'हार' और 'विचलित'। इन रचनाओं में देशप्रेम, संघर्ष में सकारात्मक सोच तथा मानसिक संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया गया है।  भारत महान सारे जग मे हो रहा ,भारत का गुणगान । शुभ संस्कारी भावना, है इसकी पहचान ।  है इसकी पहचान, सभ्यता बड़ी निराली । सर्व धर्म सत्कार, बनाता गौरवशाली । कहे सुधा सुन मीत, लगा लो तुम भी नारे । भारत देश महान, कह रहे जग में सारे।। हार हार करें स्वीकार जो, होते नहीं निराश । सतत परिश्रम कर सदा,मन में रखते आस ।। मन में रखते आस, नहीं बाधा से डरते । गिरकर उठते रोज, कभी ना मन से थकते ।। कहे सुधा निज बात, है यही जीत का सार । करते रहें प्रयास, सौपान बनेगी हार ।। बिचलित विचलित गर मन हो रहा, कर लें प्राणायाम । साधें श्वास - प्रश्वास निज, मिले सुखद आराम ।। मिले सुखद आराम, धैर्य मन में है आता । मिटे बिचार विकार, भाव निर्मल हो जाता ।। कहे सुधा सुन मीत,श्वास साधें जो नियमित...

हाइबन

चित्र
                               【1】 एक विधवा वन से लकड़ियां काटकर उन्हें घर -घर बेचकर अपने परिवार का भरण पोषण करती थी अचानक वन विभाग से लकड़ी काटने पर सख्त मनाही होने से वह जंगल से लकड़ियां नहीं ला पायी तो घर में भुखमरी की नौबत आ गयी उससे ये सब सहा न गया तो वह रात के अंधेरे में जंगल से लकड़ियां चुराने निकल पड़ी, उसने लकड़ियां काटकर गट्ठर तैयार किया और उठाने ही वाली थी कि तभी भयंकर चिंघाड़ सुनकर उसके हाथ पैर ठंडे पड़ गये देखा तो उसके ठीक सामने चीता खड़ा था , काटो तो खून नहीं वाली हालत थी उसकी डर से...बचने का कोई तरीका नहीं सूझ रहा था उसे...अनायास ही उसने दोनो हाथ जोड़ दिये और जैसी थी वैसी ही जड़ हो गयी, उसने बताया चीता उसके और करीब आया इतना करीब कि अब उसे उसका पीछे का हिस्सा ही दिखाई दे रहा था और वह अपलक स्थिर हाथ जोड़े खड़ी थी उसे लगा कि चीते ने उसे सूंघा और क्षण भर बाद वह मुड़ गया और वहां से चला गया। इसी खौफनाक दृश्य पर निर्मित्त् हाइबन ...... लकड़ी गट्ठा~ करबद्ध महिला चीता सम्मुख             ...

जन्म 'एक और गरीब का

चित्र
                                                                  खिल ही  जाते हैं गरीब की बगिया में भी मौसमानकूल कुछ फूल चाहे अनचाहे, सिसकते सुबकते कुछ अलसाये से । जिनके स्पर्श से जाग उठती है , उनकी अभावग्रस्त मरियल सी आत्मा । आशा की बुझती चिनगारी को फूँकनी से फूँक मार-मारकर, जलाते हैं हिम्मत की लौ । पीठ पर चिपके पेट और कंकाल सी देह को उठाकर धोती के चिथड़े से कमर कसकर सींचने लगते हैं ये अपनी बगिया । सिसकियाँ फिर किलकारियों में बदलती हैं ! और मुस्कराने लगती है इनकी कुटिया !              फिर इन्हीं का सहारा लिए  बढने लगती है    इनकी भी वंशबेल। हर माँ-बाप की तरह ये भी बुनते हैंं, चन्द रंगीन सपने ! और फिर अपनी औकात से बढ़कर, केंचुए सा खिंचकर तैयार करते हैं, अपने नौनिहाल के सुनहरे भविष्य का बस्ता ! उसे शिक्षित और स्वावलंबी बनाने हेतु भेजते हैं अपनी ही तरह  घिसते-पिटते सरक...

दर्द होंठों में दबाकर....

चित्र
उम्र भर संघर्ष करके रोटियाँ अब कुछ कमाई झोपड़ी मे खाट ताने नींद नैनों जब समायी नींद उचटी स्वप्न भय से क्षीण काया जब बिलखती दर्द होठों में दबाकर भींच मुट्ठी रूह तड़पती... शिथिल देह सूखा गला जब घूँट जल को है तरसता हस्त कंपित जब उठा वो सामने मटका भी हँसता ब्याधियाँ तन बैठकर फिर आज बिस्तर हैं पकड़ती दर्द होंठों में दबाकर भींच मुट्ठी रुह तड़पती ये मिला संघर्ष करके मौत ताने मारती है असह्य सी इस पीर से अब जिन्दगी भी हारती है खत्म होती देख लिप्सा रोटियाँ भी हैं सुबकती दर्द होंठों में दबाकर भींच मुट्ठी रुह तड़पती                           चित्र साभार गूगल से.... ऐसे ही एक और रचना वृद्धावस्था पर  " वृद्धावस्था   "

अपनों को परखकर....

चित्र
 अपनों को परखकर यूँ परायापन दिखाते हो  पराए बन वो जाते हैं तो आंसू फिर बहाते हो न झुकते हो न रुकते क्यों बातें तुम बनाते हो  उन्हें नीचा दिखाने को खुद इतना गिर क्यों जाते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर बहाते हो अपनों को परखकर...... मिले रिश्ते जो किस्मत से निभाना है धरम अपना जीत लो प्रेम से मन को यही सच्चा करम अपना तुम्हारे साथ में वो हैं तो हक अपना जताते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर बहाते हो। अपनों को परखकर ...... कोई रिश्ता जुड़ा तुमसे निभालो आखिरी दम तक सुन लो उसके भी मन की, सुना लो नाक में दम तक बातें घर की बाहर कर, तमाशा क्यों बनाते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर बहाते हो अपनों को परखकर...... ये घर की है तुम्हारी जो, उसे घर में ही रहने दो कमी दूजे की ढूँढ़े हो, कमी अपनी भी देखो तो बही थी प्रेम गंगा जो, उसे अब क्यों सुखाते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर बहाते हो अपनों को परखकर.... चले घर त्याग करके जो, तो जाने दो न रोको तुम जहाँ खुश हैं रहें जाकर, न जाके उनको टोको तुम क्यों जाने वालों को घर की राह फिर फिर दिखाते हो पराये बन वो जाते हैं तो आँसू फिर ...

कभी ले हरी नाम अरी रसना!

चित्र
फूटे घट सा है ये जीवन भरते-भरते भी खाली है कभी ले हरि नाम अरी रसना ! अब साँझ भी होने वाली है..... जब से हुई भोर और आँख खुली जीवन, घट भरते ही बीता कितना भी किया सब गर्द गया खुद को पाया रीता-रीता धन-दौलत जो भी कमाई है सब यहीं छूटने वाली है। कभी ले हरी नाम अरी रसना! अब साँझ भी होने वाली है...... इस नश्वर जग में नश्वर सब रिश्ते-नाते भी मतलब के दिन-रैन जिया सब देख लिया अन्तर्मन को अब तो मथ लें... मुरलीधर माधव नैन बसा छवि जिनकी बहुत निराली है कभी ले हरी नाम अरी रसना! अब साँझ भी होने वाली है......                            चित्र, photopin.comसे...

फ़ॉलोअर

लेबल

कुण्डलिया छन्द3 गजल11 गढ़वाली कविता एवं उसका हिन्दी रूपांतरण1 गढ़वाली गीत1 गर्मी पर कविता1 गर्मी पर बाल कविता1 गीत18 चौपाई1 जलवायु परिवर्तन ग्लोबल वार्मिंग1 दोहा मुक्तक3 दोहे6 नवगीत15 नारी सशक्तिकरण1 पारिवारिक कहानी1 पुस्तक समीक्षा1 प्रसंग1 प्रार्थना3 प्रेणादायक आलेख1 प्रेरक लघुकथा1 प्रेरणादायक कहानी1 प्रेरणादायक हिंदी कविता1 बाल कविता3 भावनात्मक1 भावनात्मक रचना1 मन1 मनहरण घनाक्षरी छंद6 महिला सशक्तिकरण पर प्रेरणादायक कहानी।1 मुक्तक4 मुहावरे पर आधारित लघुकथा2 रिश्ते1 रोला छंद2 लघु कथा2 लघु कहानी6 लघुकथा20 लेख4 व्यंग कविता1 व्यंग लेख1 शिक्षा -परीक्षा1 संघर्ष1 संस्मरण1 संस्मरणात्मक लेख1 सकारात्मक सोच1 समीक्षा2 साहित्य1 हाइबन1 हायकु3 हास्यव्यंग कविता1 हास्यव्यंग लघुकथाएं1 हिंदी भावनात्मक कहानी1 हिंदी साहित्य1 हिन्दी कविता1
ज़्यादा दिखाएं