पावस के कजरारे बादल | वर्षा ऋतु पर हिंदी कविता
परिचय प्रकृति का प्रत्येक रूप मेरे मन को गहराई से स्पर्श करता है, परंतु वर्षा ऋतु का आगमन एक अलग ही अनुभूति जगाता है। कजरारे बादलों का उमड़ना-घुमड़ना, तपती धरती पर अमृत-सी वर्षा बरसाना और कभी अपने असंतुलित रूप से बाढ़ तथा सूखे जैसी विषम परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देना—इन सभी भावों ने इस कविता को जन्म दिया। "पावस के कजरारे बादल" केवल वर्षा का चित्रण नहीं, बल्कि बादलों से की गई एक विनम्र प्रार्थना है कि वे समभाव से बरसें, जिससे प्रकृति का संतुलन बना रहे और प्रत्येक जीव के जीवन में हरियाली, आनंद और नवजीवन का संचार हो। पावस के कजरारे बादल, जमकर बरसे कारे बादल , उमस धरा की मिटा न पाए, बरस बरस कर हारे बादल । घिरी घटा गहराये बादल, भर भर के जल लाये बादल, तीव्र ताप से तपी धरा पर, मधुर सुधा बरसाये बादल । सूरज से घबराए बादल, चढ़ी धूप छितराए बादल, उमड़-घुमड़ पहुँचे गिरि-कानन, घन घट फट पछताए बादल । भली नहीं अतिवृष्टि बादल, करे याचना सृष्टि बादल, कहीं बाढ़ कहीं सूखा क्यों ? समता की रख दृष्टि बादल ! छोड़ भी दो मनमानी बादल, बहुत हुई नादानी बादल, बरसो ऐसा कि सब बोलें, पावस भली सुहान...