तीन कुण्डलिया :- भारत महान, हार और विचलित
ये मन भी न पल में इतना वृहद कि समेट लेता है अपने में सारे तन को, और हवा हो जाता है जाने कहाँ-कहाँ ! तन का जीव इसमें समाया उतराता उकताता जैसे हिचकोले सा खाता, भय और विस्मय से भरा, बेबस !
मन उसे लेकर वहाँ घुस जाता है जहाँ सुई भी ना घुस पाये, बेपरवाह सा पसर जाता है। बेचारा तन का जीव सिमटा सा अपने आकार को संकुचित करता, समायोजित करता रहता है बामुश्किल स्वयं को इसी के अनुरूप वहाँ जहाँ ये पसर चुका होता है सबके बीच।
लाख कोशिश करके भी ये समेटा नहीं जाता, जिद्दी बच्चे सा अड़ जाता है । अनेकानेक सवाल और तर्क करता है समझाने के हर प्रयास पर , और अड़ा ही रहता है तब तक वहीं जब तक भर ना जाय ।
और फिर भरते ही उचटकर खिसक लेता वहाँ से तन की परवाह किए बगैर ।
इसमें निर्लिप्त बेचारा तन फिर से खिंचता-भागता-सा चला आ रहा होता है इसके साथ, कुछ लेकर तो कुछ खोकर, अनमना-सा, अपने आप से असंतुष्ट और विवश।
हाँ ! निरा विवश होता है ऐसा तन जो मन के अधीन हो।
ये मन वृहद् से वृहद्तम रूप लिए सब कुछ अपने में समेटकर करता रहता है मनमानी । वहीं इसके विपरीत कभी ये पलभर में सिकुड़कर या सिमटकर अत्यंत सूक्ष्म रूप में छिपकर बैठ जाता है तन के भीतर ही कहीं !
इसके बैठते भी तो फिर वही निरा व विवश हो जाता है तन क्योंकि ये वृहद रूप में जितना प्रभावशाली है उतना ही सूक्ष्म रूप में भी ।
ऐसा लगता है मानो इसके सूक्ष्मतम बिंदु स्वरूप में शरीर की समस्त नस-नाड़ियाँ सिमट रही हों। एक अजीब-सा संकुचन पूरे अस्तित्व को घेर लेता है।
जितना प्रयास करो, यह उतने ही भाव खाता है। कभी भय, शंका, क्रोध और दुख से भर देता है, तो कभी प्रेम, ममता, मोह और जुनून की अतिशयता में डुबो देता है। भावों की यही अति जीवन को दूभर बना देती है।
पर यदि एक बार साहस करके इसे इसके हाल पर छोड़ दिया जाए, तो यह अपने समस्त दीर्घ और लघु रूप त्यागकर बराबरी के साथी-सा आ बैठता है।
परन्तु इसे इसके हाल पर छोड़ना इतना भी आसान कहाँ ! समझ ही कहाँ आता है कि कब ये तन के भीतर और बाहर अपना स्थापित्व जमा बैठा !
ये तन में है या तन इसमें ?
इसे बस में करने के लिए तो शायद इसके ही अन्दर घुसना होगा । सच में बड़ा मायावी है ये मन !
धन्य हैं वे जो आत्मचिंतन, ध्यान और साधना के माध्यम से मन को साध लेते हैं तथा निर्विकार होकर आत्मोन्नति की राह पर अग्रसर होते हैं।
सचमुच धन्य हैं वे ...!
✨धन्यवाद🙏
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वाह मीना जी...क्या खूब लिखा...मन वृहद् से वृहद्तम रूप लिए सब कुछ अपने में समेटकर करता रहता है मनमानी..वाह
जवाब देंहटाएंतन और मन की/देहरी के बीच
जवाब देंहटाएंभावों के उफनते/अथाह उद्वेगों के ज्वार / सिर पटकते रहते है।
देहरी पर खड़ा/अपनी मनचाही
इच्छाओं को पाने को आतुर
चंचल मन,
अपनी सहुलियत के हिसाब से
तोड़कर देहरी की मर्यादा पर रखी
हर ईंट
बनाना चाहता हैनयी देहरी ..
दी बहुत सुंदर विश्लेषण मन का .. ।
सस्नेह प्रणाम दी।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ४ जनवरी २०२५ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सच में | हां धन्य हैं वे :)
जवाब देंहटाएंअद्भुत लेखन
जवाब देंहटाएंशायद इसके सामर्थ्य को देख कर ही ''मन का मनका'' फेरने को कहा गया है
जवाब देंहटाएंVery Nice Post.....
जवाब देंहटाएंWelcome to my blog
मन के भावों का गहन विश्लेषण सुधा जी !बहुत सुन्दर और लाजवाब सृजन ।
जवाब देंहटाएंखेल ही सारा मन का है जो विचलित ही रहता है
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