आइना' समाज का | शराब की लत और पत्नी की बेबसी पर मार्मिक संस्मरण
परिचय
सुबह की सैर केवल शरीर को नहीं, मन को भी अनेक अनुभव दे जाती है। उस दिन भी मैं रोज़ की तरह मॉर्निंग वॉक पर निकली थी। रास्ते में जो दृश्य देखा, उसने कदम तो आगे बढ़ा दिए, लेकिन मन बहुत देर तक उसी जगह अटका रहा। यह केवल एक शराबी व्यक्ति की कहानी नहीं थी, बल्कि उस पत्नी की भी थी, जो पति के गुस्से, अपमान और नशे के बावजूद उसे सुरक्षित घर ले आने की कोशिश में लगी रही।
शराब केवल व्यक्ति को नहीं, पूरे परिवार को तोड़ती
आज मॉर्निंग वॉक करते-करते मैं सामान्य से कुछ अधिक दूर निकल गई। सड़क किनारे बने बस स्टॉप की बेंच पर बैठकर थोड़ा विश्राम कर ही रही थी कि पास से किसी सिक्योरिटी गार्ड की तेज़ आवाज़ सुनाई दी। वह किसी पर गुस्सा कर रहा था। कुछ लोग भी वहाँ इकट्ठा होने लगे।।
जिज्ञासावश मैं भी वहाँ पहुँची। देखा, एक व्यक्ति सड़क के बीचों-बीच नशे की हालत में पड़ा हुआ था। सिक्योरिटी गार्ड उसे डाँटते हुए उठाने की कोशिश कर रहा था ताकि कोई दुर्घटना न हो जाए।
तभी लगभग अधेड़ उम्र की एक महिला तेज़ी से वहाँ पहुँची। उसने गार्ड के साथ मिलकर उस व्यक्ति को सड़क के किनारे बैठाया और गार्ड का धन्यवाद किया।
अब समझ आया कि वह नशे में धुत व्यक्ति उसी महिला का पति था।
थोड़ी देर बाद उसने आँखें खोलीं, पत्नी का हाथ झटकते हुए लड़खड़ाती आवाज़ में कहा—
"मैं घर नहीं आऊँगा।"
मैंने सोचा, शायद घर में किसी बात पर नाराज़ होकर शराब पी ली होगी। यह सोचकर मैं फिर अपनी बेंच पर लौट आई।
कुछ देर बाद जब घर लौटने लगी तो पुल पर वही महिला दिखाई दी। इस बार उसके चेहरे पर गुस्सा, चिंता, बेबसी और दुख—सब एक साथ दिखाई दे रहे थे। गला भर आया था, लेकिन वह लगातार कुछ बड़बड़ा रही थी।
एक हाथ से सिर का पल्लू थामे वह पुल के नीचे देख रही थी। सुबह की हल्की हवा बार-बार पल्लू उड़ाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन वह उसे कसकर पकड़े थी; जैसे पल्लू नहीं, अपनी पूरी गृहस्थी संभाल रही हो।
मैंने भी नीचे झाँका।
तारबाड़ के पार खेतों से होता हुआ वही व्यक्ति नदी की ओर लड़खड़ाते कदमों से बढ़ रहा था। जैसे कभी भी गिर पड़े ।
महिला लगातार उसे आवाज़ दे रही थी—
"जो हुआ, उसे भूल जाओ... मुझे माफ कर दो... मान लिया, गलती मेरी ही थी... बस घर चलो..."
लेकिन वह बिना पीछे देखे आगे बढ़ता रहा।
कुछ देर बाद शायद महिला भी टूट गई। गुस्से में बोली—
"जा... कभी मत आना। मेरी बला से। मैं जा रही हूँ... बच्चे भी परेशान हो रहे होंगे।"
महिला पूरी कोशिश से पल्लू संभाले थी जैसे वहाँ पर उसके ससुरजी हों ।
यह कहकर वह आगे बढ़ी, शायद यह सोचकर कि यदि वह दिखाई नहीं देगी तो पति स्वयं घर लौट आएगा।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
वह व्यक्ति खेत में जाकर घास पर लेट गया।
अब महिला की सारी नाराज़गी फिर चिंता में बदल गई। शायद उसके मन में तरह-तरह के भय उठ रहे थे—कहीं साँप न हो, कहीं नदी की ओर न चला जाए, कहीं अपने साथ कुछ अनहोनी न कर बैठे।
आख़िरकार वह तारबाड़ पार करके फिर उसी की ओर चल पड़ी—उसे मनाने, उठाने और घर ले जाने की एक और कोशिश करने।
मैं अधिक देर वहाँ खड़ी नहीं रह सकी।
भारी मन से घर लौटते समय बार-बार यही सोचती रही कि काश, मैं उस महिला से कह पाती—
"आप घर चली जाइए। नशा उतरने पर वह स्वयं लौट आएगा।"
लेकिन अगले ही क्षण मन ने उत्तर दिया—
क्या कोई पत्नी ऐसा कर पाएगी?
जो अपने सिर का पल्लू हवा के भरोसे नहीं छोड़ सकती, वह अपने पति को उसके हाल पर कैसे छोड़ दे?
निष्कर्ष
शराब केवल एक व्यक्ति को नहीं, पूरे परिवार को अपने साथ डुबोती है। नशे में डूबा व्यक्ति अपनी ज़िम्मेदारियाँ भूल सकता है, लेकिन उसके अपने हर पल भय, अपमान और चिंता के बीच जीते हैं। उस सुबह मैंने केवल एक शराबी व्यक्ति नहीं देखा, बल्कि एक ऐसी पत्नी को देखा, जो शायद वर्षों से अपने रिश्ते, परिवार और उम्मीदों को टूटने से बचाने की कोशिश कर रही थी।
✨धन्यवाद🙏

वाह बहुत सुन्दर.
जवाब देंहटाएंधन्यवाद, सुधा जी आपका हृदयतल से आभार...।
हटाएंसादर नमस्कार ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (5-4-22) को "शुक्रिया प्रभु का....."(चर्चा अंक 4391) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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कामिनी सिन्हा
हार्दिक धन्यवाद एवं आभार कामिनी जी !मेरी इतनी पुरानी रचना साझा करने हेतु ।
हटाएंगहन एहसास जो एक दृश्य से उत्पन्न हुए और उन्हें शब्द दिए आपने ।
जवाब देंहटाएंऔर एक दर्शन भी
"जो सिर के पल्लू को उडने के लिए नही छोड़ सकती, वह अपने पति को उसके हाल पर कैसे छोड़ सकती है ।
सच...
हृदयतल से धन्यवाद जवं आभार कुसुम जी !
हटाएंओह!एकनशाखोर की पीडिता पत्नी का दुख शब्दों में साकार हो मन को झझकोर गया प्रिय सुधा जी। एकआम भारतीय नारी जो बच्चों के साथ-साथ एक पति को,भले वह कैसा भी क्यों न हो,भी हर तरह से सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।उसके जीवन की सभी खुशियाँ और रंग इसी पति नाम के प्राणी से ही तो हैं,भले वह नशेडी हो या गजेडी।
जवाब देंहटाएंहो।
जी सही कहा आपने...
हटाएंअत्यंत आभार जवं धन्यवाद।
उत्तम कहानी
जवाब देंहटाएंतहेदिल से धन्यवाद एवं आभार आ.कैलाश जी !
हटाएंआपकी लिखी रचना सोमवार 28 नवम्बर 2022 को
जवाब देंहटाएंपांच लिंकों का आनंद पर... साझा की गई है
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
संगीता स्वरूप
हृदयतल से धन्यवाद आ. संगीता जी ! मेरे भूले बिसरे सृजन को मंच प्रदान करने हेतु ।
हटाएंसादर आभार ।
स्त्री अपनी स्थिति की स्व जिम्मेदार होती है
जवाब देंहटाएंआदरणीया मैम, मन को झकझोरती हुई घटना । सच है कि एक स्त्री अपने पति और परिवार के दुर्व्यवहार के आगे कितनी असहाय हो जाती है, यही हमारे समाज का सत्य है । स्त्री सशक्तिकरण की बड़ी -बड़ी बातें और बड़े -बड़े सेमीनार मात्र नाम के लिए सशक्तिकरण हैं क्योंकि वहाँ बोलने वाली एण्ड सुनने वाली महिलायें पहले से सशक्त होतीं हैं । वास्तविक सशक्तिकरण तो तब आए जब हम ऐसी महिलाओं और इनके परिवारों तक पहुँच कर उन्हें जागरूक और सशक्त करें । वैसे ऐसी परिस्थिति में स्त्री को ही इस मानसिकता से बाहर आना होगा कि उसके जीवन में आया यह पति नाम का प्राणी उसके सभी सुखों का आधार है, चुपचाप से अपने घर जाना चाहिए और जब पति घर पहुंचे तो उसके मुँह पे दरवाजा बंद कर के अच्छा सबक सिखाना चाहिए । ऐसे पति के साथ रहने से अच्छा तो वह अकेले ही अधिक सुखी रह लेगी ।
जवाब देंहटाएंएक साधारण स्त्री की मनोदशा और हृदय की व्यथा की ऐसा सजीव चित्रण किया है आपने कि दृश्य चलचित्र की भाँति आँखों में तैर गये सुधा जी।
जवाब देंहटाएंबेहद संवेदनशील मनोभाव लिखा है आपने और 'जो सिर के पल्लू को उडने के लिए नही छोड़ सकती, वह अपने पति को उसके हाल पर कैसे छोड़ सकती है ।' इन पंक्तियों में संपूर्ण सार है।
प्रिय सुधा जी, एक बार फिर से एक पत्नी की आन्तरिक पीड़ा को अनुभव किया।एक कड़वी सच्चाई और परमपरागत नारी के जीवन की जीवन्त दास्तान शायद समाज के हर गली हर कुचे की कहानी है।सस्नेह--
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंसच में भारतीय समाज में नारी को कितनी तरह की यंत्रणाएं झेलनी पड़ती हैं, ऊपर से नशाखोरी में पति का पत्नी को परेशान करना तो आम बात है, स्त्री मन के घर्षण पर संवेदना से परिपूर्ण उत्कृष्ट आलेख ।
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