तीन कुण्डलिया :- भारत महान, हार और विचलित

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अनुभूति पत्रिका में प्रकाशित  तीन कुण्डलिया कुण्डलिया हिन्दी साहित्य का एक लोकप्रिय छंद है जो अपनी लय, भाव और संदेश के कारण पाठकों को आकर्षित करता है। प्रस्तुत हैं तीन कुण्डलिया— 'भारत महान', 'हार' और 'विचलित'। इन रचनाओं में देशप्रेम, संघर्ष में सकारात्मक सोच तथा मानसिक संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया गया है।  भारत महान सारे जग मे हो रहा ,भारत का गुणगान । शुभ संस्कारी भावना, है इसकी पहचान ।  है इसकी पहचान, सभ्यता बड़ी निराली । सर्व धर्म सत्कार, बनाता गौरवशाली । कहे सुधा सुन मीत, लगा लो तुम भी नारे । भारत देश महान, कह रहे जग में सारे।। हार हार करें स्वीकार जो, होते नहीं निराश । सतत परिश्रम कर सदा,मन में रखते आस ।। मन में रखते आस, नहीं बाधा से डरते । गिरकर उठते रोज, कभी ना मन से थकते ।। कहे सुधा निज बात, है यही जीत का सार । करते रहें प्रयास, सौपान बनेगी हार ।। बिचलित विचलित गर मन हो रहा, कर लें प्राणायाम । साधें श्वास - प्रश्वास निज, मिले सुखद आराम ।। मिले सुखद आराम, धैर्य मन में है आता । मिटे बिचार विकार, भाव निर्मल हो जाता ।। कहे सुधा सुन मीत,श्वास साधें जो नियमित...

पुनर्जन्म – एक स्त्री के स्वाभिमान और आत्मविश्वास की प्रेरणादायक हिंदी कहानी

 इस कहानी में 'पुनर्जन्म' का अर्थ नया शरीर धारण कर पुनः जन्म लेना नहीं, बल्कि मन की गहराइयों में सुप्त पड़े स्वाभिमान, संवेदनाओं और व्यक्तित्व का पुनः जागृत होना है।

यह प्रेरणादायक हिंदी कहानी एक ऐसी स्त्री की यात्रा को दर्शाती है, जो वर्षों के समझौतों के बाद अपने आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और खोई हुई पहचान को फिर से खोजती है।



पुनर्जन्म कहानी में आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को पुनः प्राप्त करती एक भारतीय महिला अपनी बेटी के साथ



"साँझ धीरे-धीरे आँगन में उतर रही थी। पश्चिम में डूबते सूरज की सुनहरी आभा दीवारों पर बिखरी थी। कोने में खड़ा अमलतास गर्म हवा के हल्के झोंकों के साथ मद्धिम-सा झूम रहा था। ऐसे ही समय पूरे पन्द्रह दिन बाद भुविका ननिहाल से लौटी।"

उसे देखते ही अनुमेधा ने आगे बढ़कर उसे बाँहों में भर लिया।

"उतर गया तेरा गुस्सा, नकचढ़ी कहीं की?" उसने स्नेहभरे उलाहने से कहा, "इतने दिन नानी के पास बैठी रही। अब कुछ ही दिनों में नौकरी पर चली जाएगी, तब तो माँ को और भी भूल जाएगी।"

भुविका के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान उभरी, पर वह उसकी आँखों तक न पहुँच सकी। माँ की बाँहों से अलग होकर वह चुपचाप अपना बड़ा-सा बैग घसीटते हुए कमरे की ओर बढ़ गई। उसके कदमों की धीमी आहट में जैसे कोई अनकहा बोझ भी साथ-साथ चल रहा था।

"अरे! इतने बड़े थैले में क्या भरकर भेज दिया है तेरी नानी ने?" अनुमेधा ने उत्सुकता और हैरानी से पूछा और उसके पीछे-पीछे कमरे में चली आई।

खिड़की से छनकर आती साँझ की धूप कमरे में बिखरी हुई थी। भुविका बिना कुछ बोले बैग के पास बैठ गई और धीरे से उसकी चेन खोलने लगी।

अनुमेधा भी उत्सुकतावश झुककर भीतर देखने लगी। तभी भुविका ने एक-एक कर कुछ मेडल, सम्मानपत्र और पुरानी तस्वीरें निकालकर बिस्तर पर फैला दीं।

क्षणभर के लिए कमरा जैसे ठहर गया।

"अरे...! ये क्या...?" अनुमेधा के चेहरे का रंग बदल गया। "ये... ये सब यहाँ क्यों ले आई भुवि ?"

उसकी आँखें अनायास फैल गईं। जैसे किसी ने वर्षों से बंद पड़ा कोई संदूक अचानक खोल दिया हो।

भुविका ने एक मेडल उठाकर माँ की ओर बढ़ाया।

"माँ! ये सब आपके ही हैं न? ये सारे मेडल, सम्मानपत्र... आपको मिले थे न?"

फिर उसने एक पुरानी तस्वीर उठाई। तस्वीर में आत्मविश्वास से भरी एक युवती मुस्कुरा रही थी।

"और ये..." उसने तस्वीर माँ के सामने करते हुए पूछा, "ये आप ही हो न, माँ?"

"हाँ, तो...?" अनुमेधा ने नजरें चुराते हुए कहा, "ये सब बहुत पुरानी बातें हैं, भुवि। अब इनका यहाँ क्या प्रयोजन?"

इतना कहकर वह जल्दबाजी में मेडल, सम्मानपत्र और तस्वीरें समेटने लगी, मानो वे कागज और धातु के टुकड़े नहीं, बल्कि कोई ऐसी स्मृतियाँ हों जिन्हें दोबारा उजाले में आने का अधिकार न हो।

"बेटा, ये सब यहाँ नहीं लाने चाहिए थे तुझे।"

फिर माथे पर हाथ रखकर बुदबुदाई, "और ये माँ भी न...! नानी ने मना नहीं किया तुझे? क्यों ले आई इन्हें?"

उसकी उँगलियाँ एक अजीब-सी घबराहट में सब सामान वापस बैग में ठूँसने लगीं।

भुविका ने आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया।

"माँ... माँ! रहने दो न । शान्त हो जाओ। छोड़ो ये सब ।"

वह उसे धीरे से बिस्तर पर बैठाते हुए बोली, "आओ, पहले आराम से बैठो।"

कुछ क्षण चुप रहकर उसने माँ की ओर देखा। खिड़की से आती ढलती धूप अनुमेधा के चेहरे पर पड़ रही थी, जहाँ समय की महीन रेखाएँ तो थीं, पर कहीं गहराई में अब भी वही पुरानी चमक छिपी हुई थी।

"माँ, जानते हो वहाँ सब मुझे क्या कह रहे थे?" भुविका मुस्कुराई।

"क्या?"

"यही कि मैं बिल्कुल आप पर गई हूँ। कहते हैं, आप भी पहले ऐसी ही थीं—बहुत बुद्धिमान, होशियार और तेज-तर्रार।"

अपना सिर माँ के कंधे पर टिकाते हुए भुविका कुछ क्षण चुप रही। बाहर अमलतास की शाखों से छनकर आती हवा खिड़की के पर्दों को हल्के-हल्के हिला रही थी।

"फिर अब क्या हो गया आपको, माँ?" उसने धीमे स्वर में पूछा।

"सब कहते हैं मैं आप पर गई हूँ। आप भी पहले बहुत होशियार, आत्मविश्वासी और तेज-तर्रार थीं। फिर कहाँ खो गईं आप?"

उसने माँ का हाथ अपने हाथों में ले लिया।

"क्यों इतनी सीधी और भोली बनी फिरती हैं? दिखाई नहीं देता आपको कि घर में कितने लोग आपकी अच्छाई का फायदा उठाते हैं? बड़े तो बड़े, अब छोटे भी कुछ भी कह जाते हैं।"

उसकी आवाज़ में अब दबा हुआ आक्रोश उतर आया था।

"और पापा... कम से कम उन्हें तो आपका साथ देना चाहिए न? लेकिन वे भी जब चाहें, सबके सामने आपको डाँट देते हैं। उस दिन तो..." कहते-कहते वह रुक गई। आँखों में फिर वही घटना तैर उठी।

"श्श्श...!" अनुमेधा ने तुरंत उसे टोका।

"कुछ ज़्यादा ही सोच रही है तू। अरे, इतना तो चलता है घर-परिवार में । हाँ तेरे पापा का स्वभाव थोड़ा गुस्से वाला है, बस। पर मैं सब सम्भाल लेती हूँ।"

उसने बात को वहीं समाप्त करना चाहा और उठने लगी, पर भुविका ने उसकी बाँह पकड़ ली।

"नहीं माँ!"

इस बार उसकी आवाज़ दृढ़ थी।

वह माँ की आँखों में देखते हुए बोली,

"सम्भाल नहीं रही आप... झेल रही हैं। और किसी का दुर्व्यवहार चुपचाप सह लेना कोई गुण नहीं होता। यह बहुत गलत बात है, माँ।"


"नहीं बेटा, ऐसी बात नहीं है।" अनुमेधा ने धीमे स्वर में कहा।

"घर-गृहस्थी में ऐसी छोटी-मोटी बातें होती रहती हैं। हर बात को दिल से लगा लिया जाए तो रिश्ते निभाना मुश्किल हो जाए।"

वह क्षणभर रुकी, फिर जैसे स्वयं को भी समझाते हुए बोली,

"और फिर, मेरे थोड़ा-सा सह लेने से अगर घर में सुख-शांति बनी रहती है, तो इसमें बुरा ही क्या है ?"

भुविका अविश्वास से माँ को देखती रह गई।

खिड़की से आती हवा ने मेज पर रखे एक पुराने सम्मानपत्र का कोना हिला दिया। उसकी दृष्टि अनायास उसी पर टिक गई।

"सुख-शांति?" उसके होंठों पर एक फीकी-सी मुस्कान उभरी।

"कौन-सी सुख-शांति, माँ ?"

अब उसकी आवाज़ में पीड़ा थी, केवल गुस्सा नहीं।

"आपके मन की सुख-शांति का क्या? आपके आत्मसम्मान का क्या? उन आँसुओं का क्या, जिन्हें आप सबकी नजरों से बचाकर चुपचाप पोंछ लिया करती हैं ?"

वह कुछ और करीब खिसक आई।

"घर की सुख-शांति का ठेका क्या आपने अकेले ले रखा है ? क्या बाकी किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं ? या फिर आपकी खुशियाँ, आपकी तकलीफें और आपका सम्मान इस घर में सबसे आख़िर में आते हैं?"

कमरे में कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया।


बेटी को इस तरह आक्रोशित देख अनुमेधा ने उसके सिर पर स्नेह से हाथ फेरा।

उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान थी, पर आँखों में वर्षों की थकान उतर आई थी।

"नहीं बच्चे, गुस्सा नहीं करते।"

वह धीमे स्वर में बोली,

"देख, सबका अपना-अपना स्वभाव होता है। जो जैसा है, उसे वैसा ही स्वीकार करना पड़ता है। हर बात पर टकराने से जीवन आसान नहीं होता।"

खिड़की के बाहर हवा का एक झोंका आया। अमलतास की कुछ पीली पंखुड़ियाँ टूटकर आँगन में बिखर गईं।

अनुमेधा की दृष्टि अनायास बाहर चली गई।

"और फिर..." वह धीरे से बोली, "जितना हो सके शांत रहकर परिवार निभाते रहो, तो धीरे-धीरे बहुत-सी बातें अपने आप ठीक भी हो जाती हैं।"

यह कहते हुए उसकी आवाज़ में एक ऐसा विश्वास था, जिसे वह बरसों से दोहराती आई थी; और एक ऐसी थकान भी, जिसे शायद वह स्वयं भी पहचान नहीं पाई थी।

फिर वातावरण को हल्का करने की कोशिश में उठते हुए बोली,

"चल, अब इन बातों को छोड़ । तू अभी-अभी आई है । मैं तेरे लिए कुछ खाने को लाती हूँ । तब तक तू हाथ-मुँह धो ले ।"


भुविका कुछ क्षण चुप रही।

उसकी नजरें माँ के चेहरे पर टिकी थीं, मानो वह वर्तमान की अनुमेधा में कहीं उस पुरानी अनुमेधा को खोज रही हो, जिसकी झलक उसने अभी-अभी तस्वीरों में देखी थी।

"सही कहा आपने, माँ," उसने धीमे पर स्पष्ट स्वर में कहा, "सबका अपना-अपना स्वभाव होता है।"

फिर वह हल्का-सा मुस्कुराई, पर उस मुस्कान में व्यंग्य घुला हुआ था।

"तो फिर आपका वही तेज-तर्रार, आत्मविश्वासी स्वभाव कहाँ खो गया?"

अनुमेधा चुप रही।

"लगता है, आपके उस स्वभाव को यहाँ किसी ने स्वीकार नहीं किया। इसलिए धीरे-धीरे आपको खुद को बदलना पड़ा... है न?"

उसने बिस्तर पर पड़ी पुरानी तस्वीर उठाई और माँ के सामने कर दी।

"फिर आप वैसी बनती चली गईं, जैसी सबको चाहिए थी—शांत, सहनशील, हर बात मान लेने वाली..."

उसकी आवाज़ भर्रा गई।

"और अपने हिस्से के दुख, अपने आँसू, अपने मन की बातें... सब भीतर ही दबाती रहीं।"

भुविका ने मुँह फेर लिया।

"सिर्फ इसलिए कि घर की शांति बनी रहे... है न माँ?"

"हे भगवान!" अनुमेधा ने माथे पर हाथ रख लिया, "ये लड़की भी ना...!"

उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान तैर गई।

"तू अभी तक वहीं अटकी हुई है? मुझे तो लगा था कि इतने दिन नानी के पास रहकर सब भूल-भाल गई होगी।"

वह खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। बाहर साँझ अब और गहरा गई थी। आकाश में लौटते पक्षियों की कतारें अपने-अपने बसेरों की ओर बढ़ रही थीं।

"अरे बेटा, जीवन में ये सब चलता रहता है। छोटी-छोटी बातों को पकड़े बैठोगी तो आगे कैसे बढ़ोगी?"

उसने मुड़कर भुविका की ओर देखा।

"चल, अब इन बातों को यहीं छोड़। कुछ खा-पी ले, फिर सबसे मिल भी लेना।"

फिर जैसे अचानक उसे कुछ याद आया।

"और हाँ..." उसने उँगली उठाकर कहा, "उस दिन जो बड़ों से जुबान लड़ाई थी न, उसके लिए माफी माँगना मत भूलना। समझी?"

इतना कहकर उसने भुविका के सिर पर हल्की-सी चपत लगा दी।

उसकी आँखों में ममता थी, पर अनजाने में वही पुराना संस्कार भी, जो हमेशा समझौते को ही समाधान मानता आया था।

"माँ! आपसे माँगी किसी ने माफी ?" भुविका ने तुरंत पूछा।

"गलती तो उनकी भी थी न?"

अनुमेधा ने सहज भाव से कहा, "बेटा, वो बड़े हैं । बड़ों से ऐसी अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए ।"

कुछ क्षणों के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया।

भुविका अविश्वास से माँ को देखते हुए बोली,

"ये कैसी बात हुई, माँ?"

उसकी आवाज़ अब ऊँची होने लगी थी।

"कोई बड़ा है, इसलिए जो चाहे कह दे, जो चाहे कर दे... और बाकी सब चुपचाप सहते रहें?"

वह बिस्तर से उठकर खिड़की के पास चली गई।

बाहर अँधेरा धीरे-धीरे आँगन में उतर रहा था।

"कोई बड़ा है तो अपने आप में महान... और कोई छोटा है, तो नासमझ बेचारा ?"

उसने पलटकर माँ की ओर देखा।

आँखों में गुस्से से ज्यादा पीड़ा थी।

"तो एक बात बताइए, माँ..."

वह धीरे-धीरे उनके पास आकर बोली

"आप क्या हो?"

अनुमेधा चौंककर उसे देखने लगी।

"हाँ, आप ही बताइए न माँ .... आप क्या हो?"

काँपती आवाज में आगे बोली,

"कोई इंसान हो कि नहीं जिसकी अपनी भावनाएँ हैं, अपना सम्मान है... या फिर बस एक पंचिंग बैग?"

"जिस पर जब जिसका मन करे, अपने शब्दों का, अपने गुस्से का, अपने अधिकार का प्रहार कर दे?"

फिर गहरी साँस लेकर बोली।

"हद है माँ..."

भुविका को इस तरह आपा खोते देख अनुमेधा ने आगे बढ़कर उसके कंधों पर हाथ रख दिए।

"शान्त... शान्त हो जा मेरी काली माई," वह हल्के से मुस्कुराई।

उस मुस्कान में माँ का वही पुराना स्नेह था, जो हर तूफ़ान को थाम लेना चाहता है।

"अच्छा बाबा, मान लिया। तू कहती है तो मैं तेरी बात पर ध्यान दूँगी। ठीक है?"

उसने प्यार से उसके कंधे थपथपाए।

"पर अभी तू बस शान्त हो जा।"

भुविका ने तुरंत माँ का हाथ पकड़ लिया, मानो उसे कहीं जाने न देना चाहती हो।

"माँ... आप मुझे भी समझो न।"

उसकी आवाज़ अचानक धीमी पड़ गई।

"थोड़ा-सा मुझे भी समझो।"

खिड़की के बाहर साँझ पूरी तरह रात में बदल चुकी थी। दूर कहीं किसी मंदिर की घंटी की ध्वनि हवा के साथ तैरती हुई कमरे तक आ रही थी।

"मुझे अच्छा नहीं लगता आपको इस तरह देखना।"

अब उसकी आँखें भर आई थीं।

"अच्छा नहीं लगता जब कोई आप पर गुस्सा करता है।"

वह क्षणभर रुकी।

"पापा भी..."

शब्द उसके होंठों पर आकर ठहर गए।

"जब पापा भी आपसे उस तरह बात करते हैं न... तो बहुत बुरा लगता है मुझे।"

उसने माँ का हाथ और कसकर पकड़ लिया।

"मन करता है कि..."

"बस... बस!" अनुमेधा ने उसकी बात बीच में ही रोक दी।

उसने दोनों हथेलियों में भुविका का चेहरा थाम लिया।

"मैं समझ गई, मेरी बच्ची।"

उसकी आँखों में ममता छलक आई।

"अब कोई मुझ पर गुस्सा नहीं करेगा। ठीक है?"

वह मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी, पर मुस्कान पूरी तरह बन नहीं पा रही थी।

"लेकिन एक बात तू भी समझ ले।"

उसका स्वर अचानक थोड़ा गंभीर हो गया।

"तू किसी से कुछ नहीं बोलेगी। समझी?"

भुविका कुछ कहने ही वाली थी कि उसने प्यार से उसकी ठोड़ी उठा दी।

"देख भुवि, बच्चों का इस तरह गुस्सा करना, बड़ों से उलझना... अच्छी बात नहीं मानी जाती।"

बाहर रात गहरा चुकी थी। खिड़की के शीशे में अब दोनों के चेहरे एक साथ झिलमिला रहे थे—एक अनुभवों से थका हुआ, दूसरा प्रश्नों और आक्रोश से भरा हुआ।

"लोग क्या सोचेंगे?" अनुमेधा धीरे से बोली।

"यही न कि माँ ने अपने बच्चों को अच्छे संस्कार नहीं दिए।"

कुछ क्षण रुककर उसने भुविका की आँखों में देखा।

"तू चाहती है कि कोई मेरी परवरिश पर उँगली उठाए?

"तो माँ आप ये चाहती हैं कि मैं भी आपकी तरह बन जाऊँ, ?"

भुविका ने सीधा उनकी आँखों में देखते हुए पूछा।

"आप जैसा सोचूँ... हर बार सबकी भलाई, 

घर की शांति और रिश्तों की खातिर खुद को पीछे रखना सीखूँ?"

अनुमेधा की पलकें झुक गईं।

"माँ..."

भुविका का स्वर अब पहले जितना तीखा नहीं था। वह बोली,

"क्या सचमुच यही जीवन है?"

कुछ क्षणों तक कमरे में सन्नाटा पसरा रहा।

फिर अनुमेधा ने नजरें चुराते हुए धीमे स्वर में कहा,

"इतना तो करना ही पड़ता है, बेटा। थोड़ा-बहुत समझौता तो सभी को करना पड़ता है।"

भुविका के चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान उभरी।

"अच्छा...! तो एक बार फिर सोच लीजिए, माँ।"

उसने माँ का हाथ अपने हाथों में ले लिया।

"सब कहते हैं कि मैं आप पर गई हूँ । है न?"

"तो फिर ठीक रहेगा न कि मैं भी अपना आगे का जीवन बिल्कुल आपकी तरह बिताऊँ?"

अनुमेधा ने चौंककर उसकी ओर देखा। 

"किसी के ताने सुनकर चुपचाप रो लूँ..."

"किसी की गलत बात को सिर्फ इसलिए सह लूँ कि घर का माहौल खराब न हो..."

"अपने आत्मसम्मान को बार-बार पीछे रख दूँ..."

उसकी आवाज़ भर्रा गई।

"और अगर कोई मेरे साथ गलत करे, यहाँ तक कि एक -आधे थप्पड़ भी जड़ दे तो भी मै उसे भी सामान्य मानकर सहती रहूँ?"

खिड़की से आती रात की हवा ने मेज पर रखी पुरानी तस्वीर को हिला दिया।

भुविका की नजर उसी तस्वीर पर टिक गई।

"यही चाहती हैं न आप, माँ?"

"कि मैं भी धीरे-धीरे खुद को भूल जाऊँ..."

"नहीं!" अनुमेधा लगभग चौंककर बोली।

"बिल्कुल भी नहीं!"

उसकी आवाज़ में पहली बार एक अजीब-सी व्याकुलता उतर आई थी।

"क्या इसीलिए तुझे इतना पढ़ाया-लिखाया? क्या इसीलिए आत्मनिर्भर बनाया कि तू अन्याय सहना सीख जाए?"

भुविका ने माँ की आँखों में सीधी नजर डाल दी।

"वही तो, माँ।"

उसकी आवाज़ धीमी थी, पर शब्द बेहद स्पष्ट।

"आप भी तो पढ़ी-लिखी थीं। आत्मनिर्भर थीं।"

"फिर सबके कहने पर आपने अपनी नौकरी छोड़ दी।"

"धीरे-धीरे हर समझौते को अपना कर्तव्य मान लिया।"

"हर अन्याय को सहनशीलता का नाम देती रहीं।"

वह क्षणभर रुकी।

"और आज..."

उसकी आँखें नम हो उठीं।

"आज आप खुद को ही भूल गई हैं।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

"कभी सोचा है आपने..." भुविका ने धीमे स्वर में पूछा, "नानी पर क्या बीतती होगी आपको इस तरह देखकर?"

उस प्रश्न के साथ ही जैसे किसी ने वर्षों से बंद पड़ा एक दरवाज़ा खोल दिया।

अनुमेधा चुप रह गई।

खिड़की के बाहर रात पूरी तरह उतर चुकी थी। दूर आकाश में एक अकेला तारा टिमटिमा रहा था।

उसकी आँखें अनायास कहीं दूर टिक गईं।

एक पल में बीते वर्षों की अनगिनत परतें उसके सामने खुलने लगीं।

उसे याद आया—

वह भी कभी सपने देखती थी।

अपनी बात पूरे आत्मविश्वास से कहती थी।

अन्याय के सामने चुप रह जाना उसके स्वभाव में नहीं था।

फिर कब और कैसे वह बदलती चली गई?

कब परिस्थितियों, रिश्तों और जिम्मेदारियों के बोझ तले उसने अपने ही व्यक्तित्व को परत-दर-परत दबा दिया?

जीवन के उस लंबे सफर में वह एक बार में नहीं टूटी थी।

वह तो धीरे-धीरे, हर मोड़ पर थोड़ा-थोड़ा बिखरती गई थी।

शायद इसीलिए आज वह इतनी भावशून्य, इतनी शांत दिखाई देती थी।

और दुनिया...

दुनिया ने उसकी इस चुप्पी को त्याग नहीं, कमजोरी समझ लिया था।

उसकी सहनशीलता को विवेक नहीं, मजबूरी समझ लिया था।

और सच तो यह था कि भुविका गलत भी नहीं कह रही थी।

वर्षों से वह सबकी शिकायतें, सबका गुस्सा, सबकी अपेक्षाएँ अपने भीतर समेटती रही थी।

मानो सचमुच एक पंचिंग बैग... हाँ सही तो कह रही भुवि उसे पंचिग बैग...


नहीं...

अब और नहीं।

अनुमेधा ने आँखें मूँद लीं।

वर्षों से मन के किसी अँधेरे कोने में दबा उसका स्वाभिमान आज जैसे पहली बार करवट ले रहा था।

उसे लगा जैसे राख की मोटी परतों के नीचे दबी कोई चिंगारी अब भी जीवित है।

बस उसे पहचानने भर की देर थी।

उसने भुविका की ओर देखा।

उसकी आँखों में चिंता थी, प्रेम था और अपनी माँ को खो देने का भय भी।

और तभी पहली बार अनुमेधा ने स्वयं से एक प्रश्न पूछा—

"क्या सचमुच मैं अपनी बेटी के लिए यही जीवन आदर्श के रूप में छोड़ जाना चाहती हूँ?"

नहीं।

बिल्कुल नहीं।

इससे पहले कि मेरी बेटी मेरे लिए सबसे लड़ती फिरे और लोगों की नजरों में गलत ठहराई जाए...

या फिर मुझे देखकर स्वयं भी समझौतों और चुप्पियों से भरा जीवन जीना सीख ले...

मुझे लौटना होगा।

उस अनुमेधा के पास लौटना होगा, जो स्वयं अपनी पहचान थी  ।

जिसकी आँखों में आत्मविश्वास था।

जिसकी आवाज़ में अपने अस्तित्व का भरोसा था।

वह धीरे-से मुस्कुराई।

कितनी विडम्बना थी...अपने बच्चों के लिए ही उसने कभी स्वयं को बदल दिया था।और अब उन्हीं बच्चों के लिए उसे फिर से स्वयं तक लौटना था।


अगले कुछ दिनों में घर का माहौल बदलने लगा।

यह बहुत बड़ा बदलाव नहीं था।

बस अब अनुमेधा हर बात पर चुप नहीं रहती थी।

गलत बात को विनम्रता से गलत कह देती थी।

अपनी राय भी रखने लगी थी।

वर्षों से दबा उसका आत्मविश्वास जैसे धीरे-धीरे साँस लेने लगा था।

और यही बात घर के कुछ लोगों को सबसे अधिक खटक रही थी।

विशेषकर उसकी सास और पति को।

उन्हें यह नया स्वरूप फूटी आँख नहीं सुहाता था।

आख़िर एक सुबह, जब पूरा परिवार नाश्ते की मेज पर बैठा था,

तब  उसकी सास का सब्र बाँध टूट ही गया।

सास ने अपने पुराने और आज़माए हुए हथियार का सहारा लिया।

अपने बेटे की ओर देखकर बोली—

"ज़रा अपने सासरे फोन लगा तो!"

फिर होंठ भींचकर बोली,

"आज बताती हूँ उन्हें उनकी बेटी के कारनामे। वो भी देखें, यहाँ कैसे - कैसे गुल खिलाए जा रही है उनकी लाडली!"

उम्मीद के विपरीत आज अनुमेधा के चेहरे पर न घबराहट थी, न सफाई देने की बेचैनी।

वह पूरी शांति से चाय का कप मेज़ पर रखते हुए बोली,

"भुवि! लगा तो बेटा नानी को फोन। और हाँ, स्पीकर ऑन कर देना। फिर दादी आराम से बात कर लेंगी।"

भुविका, जो पहले से ही घरवालों के बदले हुए भाव देखकर मन ही मन मुस्कुरा रही थी, माँ की बात सुनकर अपनी मुस्कान रोक न सकी।

"जी माँ, अभी लगाती हूँ।"

उसने तुरंत मोबाइल उठाकर नानी का नम्बर डायल कर दिया।

फोन की घंटी बजते ही दादी के चेहरे का रंग उड़ गया।

एक पल पहले तक जो आत्मविश्वास उनके चेहरे पर था, वह जाने कहाँ गायब हो गया।

वे असहज होकर इधर-उधर देखने लगीं।

मन ही मन कोई उपाय खोज रही थीं कि किसी तरह भुविका को फोन लगाने से रोक दें।

आख़िर ऐसी स्थिति पहले कभी आई ही कहाँ थी!

अब तक तो हर बार बात बढ़ने से पहले ही अनुमेधा गिड़गिड़ाकर माफी माँग लेती थी।

अपनी गलती हो या न हो, घर की शांति के नाम पर झुक जाना उसकी पुरानी आदत थी।

पर आज...

आज उसकी आँखों में वही पुरानी अनु लौटती दिखाई दे रही थी।

और यही बात सबसे अधिक असहज कर रही थी।

जब तक दादी अपने बेटे को कोई इशारा करतीं, तब तक भुविका फोन लगा चुकी थी।

कुछ ही क्षणों में उधर से नानी की परिचित, स्नेहभरी आवाज सुनाई दी।

"हैलो भुवि! पहुँच गई बिटिया आराम से ? सब कुशल-मंगल है न ?"

थोड़ी देर हालचाल पूछने के बाद उन्होंने हँसते हुए पूछा,

"पर आज सुबह-सुबह फोन कैसे ? सब ठीक तो है ?"

भुविका ने एक नजर दादी की ओर डाली।

दादी के चेहरे पर फैलती बेचैनी देखकर उसकी मुस्कान और गहरी हो गई।

"सब बिल्कुल ठीक है, नानी," उसने संयत स्वर में कहा, "दरअसल दादी आपसे बात करना चाहती हैं।"

"अच्छा!" उधर से नानी ने आश्चर्य से कहा, "आज समधन जी ने सुबह-सुबह कैसे याद कर लिया ? कोई खास बात है क्या ?"

भुविका ने होंठ भींचकर अपनी हँसी रोकने की कोशिश की।

"जी नानी," उसने धीरे से कहा, "शायद दादी आपको बधाई देना चाहती हैं।"

"बधाई ?" उधर कुछ क्षण सन्नाटा रहा।

फिर नानी की हैरान आवाज सुनाई दी,

"अरे, किस बात की बधाई?"

"वो क्या है न, नानी..." भुविका ने मुस्कुराते हुए कहा, "आजकल उनकी बहू में आपकी बेटी का पुनर्जन्म जो हो गया है।"

वह एक पल को रुकी और फिर शरारत से बोली,

"तो बधाई तो बनती है न!"

उसकी बात सुनकर मेज़ के आसपास बैठे लोगों के चेहरे देखने लायक थे।

भुविका हँसते हुए फोन दादी की ओर बढ़ाने लगी, पर तब तक वे वहाँ से खिसक चुकी थीं।

उसने पापा की ओर देखा।

वे भी अचानक किसी जरूरी काम की याद आने पर कुर्सी से उठ खड़े हुए।

बुआ, चाचा और चाची ने भी एक-दूसरे की ओर देखा और धीरे-धीरे वहाँ से सरक लिए।

कुछ ही क्षणों में डाइनिंग टेबल के आसपास का शोर जैसे हवा हो गया।

उधर फोन पर नानी की उलझी हुई आवाज आई—

"अरे! कोई मुझे भी तो बताए कि बात क्या है?"

भुविका खिलखिला उठी।

"नानी, फिलहाल तो आप मेरी बधाई स्वीकार कीजिए।"

फिर उसने स्नेह से माँ की ओर देखा।

"और अपनी बेटी को भी पुनर्जन्म की बधाई दीजिए।"

यह कहते हुए उसने फोन अनुमेधा की ओर बढ़ा दिया।

अनुमेधा ने फोन थाम लिया।

उसके चेहरे पर एक शांत, आत्मविश्वासी मुस्कान थी—वैसी ही, जैसी शायद बरसों पहले हुआ करती थी।

फोन लेते-लेते उसने अपनी दूसरी हथेली भुविका की ओर बढ़ा दी।

भुविका ने तुरंत जोर से ताली मारी।

अगले ही पल वह हँसते हुए माँ से लिपट गई।

खिड़की से आती सुबह की सुनहरी धूप दोनों पर बिखर रही थी।

मानो वर्षों से सोई हुई किसी रोशनी ने सचमुच फिर से आँखें खोल दी हों।

निष्कर्ष

कभी-कभी जीवन में पुनर्जन्म का अर्थ नया जीवन पाना नहीं, बल्कि अपने भीतर खो चुके आत्मविश्वास, स्वाभिमान और व्यक्तित्व को फिर से पहचान लेना होता है। "पुनर्जन्म" ऐसी ही एक भावनात्मक हिंदी कहानी है, जो बताती है कि सहनशीलता एक गुण है, लेकिन आत्मसम्मान की कीमत पर नहीं।



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टिप्पणियाँ

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 22 जून 2023 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आ.रविन्द्र जी ! रचना को मंच प्रदान करने हेतु ।

      हटाएं
  2. हार्दिक धन्यवाद आ.शास्त्री जी !मेरी रचना चयन करने हेतु ।
    सादर आभार ।

    जवाब देंहटाएं
  3. गोपेश मोहन जैसवाल25 जून 2023 को 4:03 pm बजे

    बहुत ख़ूब !
    जब जागो, तभी सवेरा है.

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह! सुधा जी बहुत खूब शीशे पर से बस धूल भरी पोंछनी थी।
    सुंदर सार्थक कथा।

    जवाब देंहटाएं
  5. उत्तर
    1. अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आपका भारती जी !

      हटाएं
  6. सकारात्मकता जगाती बहुत ही प्रेरक कहानी।
    ऐसी कहानियों की निहायत आवश्यकता है।
    साझा करने के लिए आपका आभार सखी।

    जवाब देंहटाएं
  7. अनुमेधाओं को पुनर्जन्म के लिए भुवि जैसी बेटियों की सख़्त ज़रूरत है समाज में। लाजवाब सृजन के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें सुधा जी ।

    जवाब देंहटाएं
  8. साकारात्मक, बहुत सार्थक लेखन ...
    आज के समय में ऐसी पोसितिविटी की बहुत ज़रुरत है ...

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत प्रेरक, शानदार रचना के लिए हार्दिक बधाई !

    जवाब देंहटाएं
  10. इतनी शानदार कहानी मैंने विलंब से पढ़ी सुधाजी। बहुत अच्छी, सचमुच बहुत ही अच्छी कहानी लिखी है आपने। प्रशंसा हेतु शब्द कम पड़ रहे हैं।

    जवाब देंहटाएं

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