मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा | गढ़वाली गीत

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  ✨ परिचय (Intro) गढ़वाल की वादियों में हर मौसम अपनी अलग कहानी लेकर आता है, लेकिन मोल्यारी मास (बसंत ऋतु) का सौंदर्य कुछ खास होता है। यह गीत उसी बसंती एहसास, पहाड़ की खुशबू, बचपन की यादों और लोकजीवन की सरलता को शब्दों में पिरोता है। कलीं कलीं वनफसा फूलीं, उँण्या कुण्याँ सँतराज खिल्याँ  मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  बाट किनार बसींगा फूलीं छन रौली-खौली काली जीरी फूलीं  चल दगड़्यों म्याल खैयोला बण की डाली फलूण झूलीं उड़दि तितली रंग-बिरंगी भोंरा बि छन गुंजण लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा,डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  ऊँची डाड्यूँ मा सुनेरी उल्यार रोली खोली हर्याली छयीं छुम बजांदि दाथुणि छुमका घास घस्याण घसेरी जयीं खुदेड़ गीतुंक गुणगुणाट आँख्यूँ मा टुपि दे आँसू बह्याँ। मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ पुराण दिन याद आदिन मैति मैत्युंक लोभ लग्याँ खुद लगदि ज्यु खुदेंदी फूलूँ दगड़ी भाव बग्याँ धरती म्यरि, म्यरु पहाड़्यों स्वरग जणि च भलि लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ फसल कटि, बिखौंति मनीगे जगा जगा ...

मैं जो गई बाहर ( हिंदी कविता)

मैं जो गई बाहर, स्त्री मन की अनुभूति 


"यह एक भावनात्मक हिंदी कविता है जिसमें स्त्री के मन, घर से दूर जाने और जीवन में आए सूक्ष्म बदलावों को सुंदर रूप से व्यक्त किया गया है।"



मैं जो गई बाहर हिंदी कविता स्त्री मन पर आधारित



चार दिन..

बस चार दिन,

मैं जो गई बाहर,

कितना कुछ बदल गया !


हाँ, बदल सा गया 

मेरा घर !

घर की दीवारें ।

इन दीवारों में

पहले सी ऊष्मा तो ना रही

रही तो बस ये निस्तब्धता

अनचीन्ही सी  ।


चार दिन..

बस चार दिन,

मैं जो गई बाहर,

कितना कुछ बदल गया  ।


घर का आँगन, 

आँगन मे रखे गमले,

गमलों में उगे पौधे -

रोज पानी मिलने पर भी

इनकी पत्तियों में,  फूलों में

वो मुस्कान तो ना रही,

जो पहले रहती थी ।


चार दिन ..

बस चार दिन, 

मैं जो गई बाहर,

जैसे सब कुछ बदल गया ।


हाँ, बदल सा गया 

मेरा मन भी ।

मन के भाव,

भावों की ये नदी अब 

वैसे शांत तो नहीं बह रही

जैसे पहले बहती थी ।


ये भावों की नदी जाने क्यों

जैसे बेचैन सी भाग रही है,

किसी अनजान से ,

सागर की ओर ।


और भावनाओं की सरगम भी -

वैसे तो ना रही,

जैसे पहले रहती थी ।


चार दिन ..

बस चार दिन, 

मेरे दूर जाते ही..

समय ने जैसे अपना रंग ही बदल लिया ।

सचमुच.. बहुत कुछ बदल गया ।


हाँ ! नवीन स्फूर्ति आई ।

पर ये स्फूर्ति भी तो

जैसे वसंत की असमय आँधी —

जो पुष्पों को महकाती कम,

और बिखेरती अधिक है।


और स्थिरता -

वह तो मानो

शरद की निस्तब्ध चाँदनी थी

जो इन चार दिनों की

बादलों भरी रातों में

कहीं विलीन सी हो गई ।


दुनिया की चकाचौंध से

 चुंधियाई ये आँखें

बरबस बंद होकर प्रतीक्षा कर रही हैं

मन के लौट आने की

पहले की तरह स्वयं में सिमट

अंर्तमुखी हो जाने की ।


और मन ..

मन भी कहाँ रमा इन सब में..

वह भी सहमा सा बैठा है

जैसे घोंसले से दूर

भटका सा कोई पंछी,

जिसे आकाश की व्यापकता नहीं,

अपने तिनकों की सुरक्षा भाती है।


हाँ , मन लौटना चाहता है

अंतरतम की गहरी गली में..

जहाँ मिले उसे 

अपना संतुलन,

अपनी गहराई,

अपना मौन और

 असीम शांति के साथ वही स्थिरता

जिसमें बड़े  सुकून  से

धीरे-धीरे जन्म लेगी

फिर से...

उसकी अनुभूतियों की

वही कोमल धारा ।

उसकी अपनी कविता !


चार दिन..

बस चार दिन,

मैं जो गई बाहर,

कितना कुछ बदल गया !


✨धन्यवाद🙏

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#हिंदी_कविता#स्त्री_मन#भावनात्मक_कविता#HindiPoetry#WomenWriting












टिप्पणियाँ

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 26 मार्च, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  2. उम्रेदाराज माँग कर लाये थे चार दिन, ये चार दिन की ही तो ज़िंदगी है, वे भी बाहर ही गुजार दिये

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  3. वाह ! क्या बात बहुत ही सुंदर! अनुपम

    जवाब देंहटाएं
  4. समय की नब्ज़ टटोलती
    कमाल की रचना

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  5. बहुत सुंदर और मर्मस्पर्शी भावाभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं
  6. हृदयस्पर्शी सृजन ।बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति ।

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