रविवार, 15 दिसंबर 2019

ब्लॉग से मुलाकात..बहुत दिनों बाद

Marigold



औ मेरे ब्लॉग ! देखो मैं आ गयी !
थोड़े समय के लिए ही सही 
मन में खुशियाँ छा गयी !

जानते हो तुमसे मिलने को 
क्या कुछ नहीं किया मैंने !
और तो और छोटों से किया
वादा ही तोड़ दिया मैंंने !

पर ये क्या ! ऐसे क्यों उदासीन से बैठे हो !
जरा उत्साहित भी नहीं,
ज्यों गुस्सा होकर ऐंठे हो !

अब तुमसे क्या बताना या छुपाना 
तुम भी तो जानते हो न...
मोबाइल, कम्प्यूटर ठीक नहीं
       सेहत के लिए
ये तुम भी तो मानते हो न !!!

परन्तु तुम तक आने का माध्यम
सिर्फ इंटरनेट है...
उसी से हो तुम,और तुम्हारा सबकुछ
कम्प्यूटर में सैट है...

हम भी नहीं मिलेंगे तुमसे
जब ये वादा करते हैं
तभी अपने छोटों को 
कम्प्यूटर वगैरह से दूर रखते हैं

रेडिएशन के नुकसान अगर 
उनसे कह देते हैं
"आप क्यों" कहकर वे तो
हमें ही चुप कर देते हैं

हाँ दुख होता है कि अपना तो
जमाना ही नहीं आया
छोटे थे तो बड़ों से डरे,
अब बड़े हैं तो
छोटों ने हमें डराया !!!

खैर ! उनकी सलामती के लिए
डर कर ही रह लेते हैं
हम अपने छोटों के खातिर मेरे ब्लॉग !
तुमसे दूरियाँ सह लेते हैं...








बुधवार, 23 अक्तूबर 2019

क्रोध आता नहीं , बुलाया जाता है

Anger : Cause of many diseases


कितनी आसानी से कह देते हैं न हम कि
 क्या करें गुस्सा आ गया था ...
  गुस्से में कह दिया....

                       गुस्सा !!
   गुस्सा (क्रोध) आखिर बला क्या है ?
   
               सोचें तो जरा !

    क्या सचमुच क्रोध आता है.....?
    मेरी नजर में तो नहीं
    क्रोध आता नहीं
    बुलाया जाता है
    सोच समझ कर
    हाँ !  सोच समझ कर
   किया जाता है गुस्सा
  अपनी सीमा में रहकर......
    हाँ ! सीमा में  !!!!
   वह भी
   अधिकार क्षेत्र की ......

   तभी तो कभी भी
  अपने से ज्यादा
  सक्षम पर या अपने बॉस पर
  नहीं कर पाते क्रोध
  चाहकर भी नहीं......
  चुपचाप सह लेते हैं
  उनकी झिड़की, अवहेलना
  या फिर अपमानजनक डाँट
  क्योंकि जानते हैं
  कि भलाई है सहने में......

  और इधर अपने से छोटों पर
  अक्षम पर या अपने आश्रितों पर
  उड़ेल देते हैं सारा क्रोध
  बिना सोचे समझे.....
  बेझिझक, जानबूझ कर
  हाँ !  जानबूझ कर ही तो
  क्योंकि जानते हैं.....
  कि क्या बिगाड़ लेंगे ये
  दुखी होकर भी........

  तो क्या क्रोध हमारी शक्ति है ?
  या शक्ति का प्रदर्शन ?

   हाँ! मात्र प्रदर्शन !!!
   और कुछ भी नही......

  यदि सच को स्वीकारें तो
  ये क्रोध है .......
  हमारी बौद्धिक निर्बलता/अज्ञानता
  जिससे उपजती असहिष्णुता
  और फिर प्रदर्शन !
  वह भी
  अधिकार क्षेत्र की सीमा में........

     तो क्रोध आता नहीं ,
       बुलाया जाता है.....
        ........है ना.........

               चित्र साभार गूगल से....



       
         
 
       



सोमवार, 14 अक्तूबर 2019

शरद पूनम के चाँद


full (sharad poornima) moon

अब जब सब प्रदूषित है
तुम प्रदूषण मुक्त रहोगे न
शरद पूनम के चाँद हमेशा
धवल चाँदनी दोगे न.....

खीर का दोना रखा जो छत पे
अमृत उसमें भर दोगे न....
सोलह कलाओं से युक्त चन्द्र तुम
पवित्र सदा ही रहोगे न........

चाँदी से बने,सोने से सजे
तुम आज धरा के कितने करीब !
फिर भी उदास से दिखते मुझे
क्या दिखती तुम्हें भी धरा गरीब...?

चौमासे की अति से दुखी धरा का
कुछ तो दर्द हरोगे न....
कौजागरी पूनम के चन्द्र हमेशा
सबको रोग मुक्त कर दोगे न .......

सूरज ने ताप बढ़ाया अपना 
सावन भूला रिमझिम सा बरसना
ऐसे ही तुम भी "ओ चँदा " !
शीतलता तो नहीं बिसरोगे न...

रास पूनम के चन्द्र हमेशा
रासमय यूँ ही रहोगे न....
शरद पूनम के चाँद हमेशा 
धवल चाँदनी दोगे न........
                   
                चित्र साभार गूगल से..

मंगलवार, 20 अगस्त 2019

गृहस्थ प्रेम


beautiful pink flower


तुम साथ होते हो तो
न जाने कितनी कपोल-कल्पनाएं 
उमड़ती-घुमड़ती हैं अंतस में...
और मैं तड़पती हूँ एकान्त के लिए
कि झाँँक सकूँ एक नजर
अपनी कल्पनाओं के खूबसूरत संसार में।

तुम्हारी नजरों से बचते-बचाते
छुप-छुपके झाँक ही लेती हूँ और
देखने लगती हूँ कोई खूबसूरत सपना
पर तभी तुम टोक देते हो.......
कि "कहाँ खो गई" !!!

फिर क्या.....तुमसे छुपाये नहीं छुपा पाती
अपनी खूबसूरत कल्पनाओं के 
अधूरे से सपने को........
और फिर सुनते ही तुम निकल पड़ते हो 
बिना कुछ कहे ,   जैसे रूठे से.....
मैं असमंजस में सोचती रह जाती हूँ 
कि मैंने किया क्या?......
बस सपना ही तो देखा था अधूरा सा.....

तुम्हारे जाने के बाद समय है एकांत भी !
पर न जाने क्यों कोई सपना नजर नहीं आता
नहीं उमड़ती अंतस में वैसी कल्पनाएं
सब सूना सा हो जाता है.......
तब वर्तमान में हकीकत के साथ जीती हूँ मैं
ठीक तुम्हारी तरह
हमारे हकीकत के घर-संसार की
पहरेदार बनकर.....
तुम्हारे इंतजार में तुम्हारी यादों के साथ !

और फिर एक दिन खत्म होता है
ये यादों का सिलसिला और
पल-पल का इंतजार......
...........तुम्हारे आने साथ !................

हाँ ! आते हो तुम ढ़ेर सारी खुशियाँ लेकर
मेरे अधूरे सपने की पूर्णता के साथ....
मेरी कल्पनाओं को हकीकत बनाकर 
बिखेर देते हो मेरे सपने की खुशबू मेरे इर्द-गिर्द....
कि मैं अपने सपने की हकीकत को महसूस करूँ
कल्पनाओं के संसार में खोकर नहीं .......
हकीकत में रहकर
..............तुम्हारे साथ !..........

पर मैं भला ऐसा कहाँ कर पाती हूँ, आदतन.... 
अपने सच हुए सपने से हमारी गृहस्थी सजाकर
तुम्हारे साथ ही फिर से छुप-छुपाकर
झाँक आती हूँ अंतस में बसे कल्पनाओं के संसार में
और ले आती हूँ फिर से एक नया अधूरा सपना !
फिर वही.....तुम चल पड़ते हो उसे पूरा करने
नया आयाम रचने........

..........यही तो है "गृहस्थ प्रेम"..............
किसी भी गृहस्थी की सम्पन्नता का द्योतक
...................है ना...............
     








गुरुवार, 8 अगस्त 2019

भावनाओं के प्रसव की उपज है कविता....



dairy : full of emotions


आज मन में ख्याल आया
रचूँ मैं भी इक कविता
मन को बहुत अटकाया
इधर-उधर दौड़ाया
कुछ पल की सैर करके
ये खाली ही लौट आया
डायरी रह गयी यूँ कोरी
कल्पना रही अधूरी
मैने भी जिद्द थी ठानी
है कविता मुझे बनानी
जा ! उड़ मन परी लोक में
ला ! परियों की कोई कहानी
मैं उसमें से कुछ चुन लूँ
फिर कागज पे कलम से बुन लूँ
बन जाये कोई कविता
जो मन को लगे सुहानी
फुर उड़ चला ये नील गगन में
लौटा फिर इसी चमन में
पर ना साथ कुछ भी लाया
मैने फिर इसे भगाया
जा ! सागर बड़ा सुहाना
सुन्दर हो कोई मुहाना !
कहीं सीपी मचल रही हो...
बूँद मोती में ढल रही हो !
जा ! वहीं से कुछ ढूंढ लाना
रे ! मन खाली न आना !!
पर ये खाली ही आया....
इसे वहां भी कुछ न भाया
मैं तब भी ना हार मानी
मुझे कविता जो थी बनानी
इस मन को फिर समझाया
देख ! सावन कहीं हो आया
रिमझिम फुहारें बरस रहीं हो
धरा महकी बहकी सी हो
कोई नवेली सज रही हो
हाथ मेंहदी रच रही हो
हौले उसके पास जाना
प्रीत थोड़ी ले के आना
मैं उसी से प्रीत चुन लूँ
फिर कागज पे कलम से बुन लूँ
बने कविता या फिर कहानी
जो मन को लगे सुहानी
मेरी जिद्द पे मन उकताया
झट अन्तर में जा समाया
भाव समन्दर के मंथन से
कुछ काव्यरस बाहर आया
झट शब्दमोती चुन न पायी
हाय ! मैं कविता बुन न पायी
उथले में रही अनजानी
न कविता बनी ना कहानी
************************
ले लेती जो इक गहन गोते का सुख
मेरी कविता भी होती सबके सम्मुख
**************************
भावनाओं  के प्रसव की उपज है कविता....
यूँ बनाने से कहाँ कब बन सकी कविता !!!!














शनिवार, 4 मई 2019

बेटी----टुकड़ा है मेरे दिल का



 Eternal Mothers love

मुद्दतों बाद उसका भी वक्त आया
जब वह भी कुछ कह पायी
सहमत हो पति ने आज सुना
वह भी दिल हल्का कर पायी

आँखों में नया विश्वास जगा
आवाज में क्रंदन था उभरा
कुचली सी भावना आज उठी
सोयी सी रुह ज्यों जाग उठी

हाँ!बेटी जनी थी बस मैंने
तुम तो बेटे ही पर मरते थे
बेटी बोझ, परायी थी तुमको
उससे नजरें यूँ फेरते थे...

तिरस्कार किया जिसका तुमने
उसने देवतुल्य सम्मान दिया
निज प्रेम समर्पण और निष्ठा से
दो-दो कुल का उत्थान किया

आज बुढापे में बेटे ने
अपने ही घर से किया बेघर
बेटी जो परायी थी तुमको
बिठाया उसने सर-आँखोंं पर

आज हमारी सेवा में
वह खुद को वारे जाती है
सीने से लगा लो अब तो उसे
ये प्रेम उसी की थाती है.......

**********************

सच कहती हो,खूब कहो !
शर्मिंदा हूँ निज कर्मों से......
वंश वृद्धि और पुत्र मोह में 
उलझा था मिथ्या भ्रमोंं से


फिर भी धन्य हुआ जीवन मेरा
जो पिता हूँ मैं भी बेटी का
बेटी नहीं बोझ न पराया धन
वह तो टुकड़ा अपने दिल का !!!!!!
   

               चित्र- साभार गूगल से...

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

बेटी----माटी सी


soil and daughter connection


कभी उसका भी वक्त आयेगा ?
कभी वह भी कुछ कह पायेगी ?
सहमत हो जो तुम चुप सुनते 
मन हल्का वह कर पायेगी ?

हरदम तुम ही क्यों रूठे रहते
हर कमी उसी की होती क्यूँ....?
घर आँगन के हर कोने की
खामी उसकी ही होती क्यूँ....?

गर कुछ अच्छा हो जाता है
तो श्रेय तुम्ही को जाता है
इज्ज़त है तुम्हारी परमत भी
उससे कैसा ये नाता है......?

दिन रात की ड्यूटी करके भी
करती क्या हो सब कहते हैं
वह लाख जतन कर ले कोशिश
पग पग पर निंदक रहते हैं......

खुद को साबित करते करते
उसकी तो उमर गुजरती है
जब तक  विश्वास तुम्हें होता
तब तक हर ख्वाहिश मरती है...

सूनी पथराई आँखें तब
भावशून्य हो जाती हैं
फिर वह अपनी ही दुश्मन बन 
इतिहास वही दुहराती है......

बेटी को वर देती जल्दी
दुख सहना ही तो सिखाती है
बेटी माटी सी बनकर रहना
यही सीख उसे भी देती है......

रविवार, 24 मार्च 2019

पौधे---अपनों से


Plants


कुछ पौधे जो मन को थे भाये
घर लाकर मैंंने गमले सजाये
मन की तन्हाई को दूर कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये.......

हवा जब चली तो ये सरसराये 
मीठी सी सरगम ज्यों गुनगनाये
सुवासित सुसज्जित सदन कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये.......

इक रोज मुझको बहुत क्रोध आया
गुस्से में मैंंने इनको बहुत कुछ सुनाया।
न रूठे न टूटे मुझपे, स्वस्यचित्त रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये........

खुशी में मेरी ये भी खुशियाँँ मनाते
खिला फूल तितली भौंरे सभी को बुलाते
उदासीन मन उल्लासित कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये.......

मुसीबतों में जब मैंने मन उलझाया
मेरे गुलाब ने प्यारा पुष्प तब खिलाया
आशान्वित मन मेरा कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये........

धूल भरी आँधी या तूफान आये
घर के बड़ों सा पहले ये ही टकरायेंं
घर-आँगन सुरक्षित कर रहे ये
अपनों के जैसे अपने लगे ये.....

                  चित्र साभार गूगल से...











शनिवार, 2 मार्च 2019

अब भावों में नहीं बहना है....


leaf flowing with air indicating emotions


जाने कैसा अभिशाप है ये
मन मेरा समझ नहीं पाता है
मेरी झोली में आकर तो
सोना भी लोहा बन जाता है

जिनको मन से अपना माना
उन्हीं ने ऐसे दगा दिया
यकींं भी गया अपनेपन से
तन्हा सा जीवन बिता दिया

एक सियासत देश में चलती
एक घरों में चलती है
भाषण में दम जिसका होता
सरकार उसी की बनती है

सच ही कहा है यहाँ किसी ने
"जिसकी लाठी उसकी भैंस"
बड़बोले ही करते देखे
हमने इस दुनिया में ऐश

नदी में बहने वाले को
साहिल शायद मिल भी जाये
भावों में बहने वाले को
 अब तक "प्रभु" भी ना बचा पाये

गन्ने सा मीठा क्या बनना
कोल्हू में निचोड़े जाओगे
इस रंग बदलती दुनिया में
गिरगिट पहचान न पाओगे

दुनियादारी सीखनी होगी
गर दुनिया में रहना है
"जैसे को तैसा" सीख सखी !
अब भावों में नहीं बहना है
                   
                   चित्र;साभार गूगल से....

गुरुवार, 31 जनवरी 2019

🌜नन्हेंं चाँद की जिद्🌛



moon

           
भोर हुई पर नन्हें शशि आज
आसमान में ही विराजमान हैं
       
पिता आकाश इससे अनभिज्ञ
पुत्र रवि के आगमन की शान में हैं।
   
माँ धरती प्रतीक्षा में चिन्तित......
पुत्र शशि की राहें ताक रही ।

कहाँ रह गया नन्हा शशि.......
झुक सुदूर तक झाँक रही ।
     
नन्हा शशि तो जिद्द कर बैठा.....
मैं आज नहीं घर जाऊँँगा ।
               
याद आती है रवि भैया की......
मैं उनसे यहीं मिल पाऊँँगा ।

धरती माँ ने भेजा संदेशा.....
शशि जल्दी से आओ घर !
                 
क्रोधित होंगे आकाश पिता......
तुम क्या करते हो राहों पर ?...

शीत की ठण्डी में ठिठुरा मैं.....
माँ ! काँप रहा हूँ यहाँ थर-थर ।
               
भाई रवि मेरे धूप मुफ्त में......
बाँट रहे हैं ,धरती पर ।

मिलकर उनसे थोड़ी - सी......
गर्माहट भी ले आऊँगा ।
               
याद आती है रवि भैया की.....
उनसे मिलकर ही घर आऊँँगा ।।

      चित्र ;साभार गूगल से...

सोमवार, 28 जनवरी 2019

"कल दे दूंगी.....कसम से"



school with a teacher welcoming


सीमा बहुत ही सीधी-सादी लड़की थी,बहुत दूर के गाँव से आती थी स्कूल में पढ़ने..........अकेली वही लड़की थी उस गाँव की...लड़के तो बहुत आते थे वहाँ से....  पर लड़कियों को नहीं पढ़ाते थे वे लोग....
उनके गाँव में तो कोई स्कूल था नहीं, दूर के गाँव भेजकर लड़कियों को पढाना वे ठीक नहीं समझते थे ।
क्योंकि  बारहवीं तक के स्कूल में कॉलेज से भी बद्तर माहौल था स्कूल दूर होने के कारण बच्चों को देर से पढाना शुरू करते थे । बारहवीं तक पहुँचते-पहुँचते वे विवाह योग्य हो जाते.........।
लड़कों  में अक्सर अनुशासनहीनता ज्यादा रहती थी।कुछ बिगड़ैल लड़के स्कूल में दादागिरी करते,जिनके  डर से वहाँ लड़कियों कम ही पढ़ती थी.....

सीमा पढ़ने में बहुत ही होशियार थी सबके खिलाफ जाकर उसकी विधवा माँ उसे पढ़ाने भेजती ढ़ेर सारी सीख के साथ।  और सीमा भी माँ की सीख का मान रखने में कोई कसर ना छोड़ती।  जंगल के लम्बे रास्ते आते-जाते ढे़र सारी मुसीबतें पार करते हुए सीमा का बारहवीं का आखिरी साल चल रहा था ।

कुछ लड़कियों से सीमा की पक्की दोस्ती हो गयी थी इतने सालों में ।  पर अब बारहवीं कक्षा के बाद हमेशा के लिए बिछड़ना था इनसे ।   इसीलिए ये सब एक दूसरे
की यादों को सहेजने के लिए उनसे फोटोग्राफ (तस्वीर) ले रहे थे ।

एक सहेली का फोटो सीमा ने अपनी नोटबुक मेंं रखा था।नोटबुक चैक करवाकर लाते हुए राहुल के हाथ लग गयी वह तस्वीर ।
उन दिनों किसी लड़की की तस्वीर किसी लड़के के पास बहुत बड़ी चर्चा का विषय बन जाया करती थी....सीमा की तो आफत ही आ गयी...उफ! अब कैसे निकालूँ इससे ये तस्वीर............। कहींं सहेली को पता चल गया तो...क्या सोचेगी वो मेरे बारे में उसकी एक फोटो भी न सम्भाल पायी मैं.....।  नहीं मुझे कुछ भी करके उससे फोटो वापस लेनी होगी........।

राहुल के पास जाकर बोली;...... मेरी सहेली का फोटो जो तुमने मेरी नोटबुक से लिया उसे मुझे दे दो प्लीज....

अच्छा ! तुम्हें दे दूँ ?...बदले में क्या दोगी तुम मुझे.....?  राहुल बोला, तो सीमा ने कहा; "क्या चाहिए तुम्हें ! किसी विषय का काम पूरा न हो तो मैं कर दुंगी या मेरी नोटबुक चाहिए तो दे देती हूँ, पर राहुल प्लीज वह तस्वीर मुझे दे दो"।

ए......!  मुझे तेरी नोटबुक वगैरह नहीं चाहिए... इस फोटो के बदले अपनी फोटो देनी है तो बात कर,वरना....(कुटिलता से भौंहों को उचकाते हुए) बोल ! देगी अपनी फोटो ...?   बोल न !.......

सीमा असमंजस में पड़ गयी सोचने लगी अपनी फोटो क्यूँ दूँ इसे.........फिर भी सहेली का फोटो लेने के चक्कर में कह दिया, हाँ ! दे दुंगी, अब फोटो दो मुझे....।

राहूल बोला; "तो फिर एक हाथ दे एक हाथ ले....ले पकड़ अपनी सहेली की फोटो......और ला दे अपनी फोटो !......।

झट से फोटो उसके हाथ से लेते हुए सीमा बोली ; "पर मेरी फोटो तो आज मेरे पास नहीं है, पर मैं कल ले आउंगी पक्का" !!!........।

ऐ......!   झूठ मत बोल !!  होगी तेरे पास जरूर.......दे जल्दी अपनी फोटो...!!! नखरे मत दिखा मुझे !!!!     (राहुल चिढ़ते हुए बोला) .......
सीमा ने विश्वास दिलाते हुए कहा ; सच्ची में आज नहीं है मेरे पास......कल पक्का ले आउंगी...।

ऐ......!   खा कसम ! कल पक्का लायेगी, राहुल उंगली दिखाते हुए बोला...तो सीमा ने भी अपनी उंगलियों  से गले को छू्ते हुए बोल ही दिया कसम से !कल जरूर ले आउंगी.....।

(कह तो दिया पर सारे रास्ते इसी उधेड़बुन में रही कैसे टालूं इसे...अपनी फोटो इसे दूंगी तो भूचाल ही आ जायेगा....उफ ! अब क्या करूँ? छुट्टी मार लेती हूँ एक दो दिन की .....पर घर में क्या कहूंगी ? ना ना ....कुछ और ही करना होगा... माँ से पूछूँ ? नहीं यार माँ नहीं समझ पायेगी......माँ से कहना भी ठीक नहीं होगा...खुद ही सोचना होगा मुझे....भगवान जी साथ देना हाँ मेरा!
(आसमान में ताकते हुए हाथ जोड़कर सीमा ने मन्नत माँगी)....।

अगली सुबह राहुल तो अपनी मित्र मंडली के साथ रास्ते में खड़ा था उस के इन्तजार में....।

उसे देखते ही सीमा अन्दर से तो डर सी गयी पर झट से खुद को सम्भालते हुए और भी संजीदा होकर सामने से निकलने लगी तो राहुल बड़े ही छिछोरेपन से उसे रोकते हुए बोला ;    ए...! फोटो कहाँ है ?.......ला दे जल्दी !

सीमा चुप खड़ी होकर उसकी तरफ देखने लगी तो वह बोला; देखती क्या है कसम खायी है तूने......अब मुकर मत जाना...ला दे !!!.

ओह ! फोटो ! अब इसमेंं क्या मुकरना?..वो तो मैने लानी ही है,जब कसम खायी है तो लानी तो है ही...कहा है न "कल पक्का लाउंगी कसम से"....सीमा ने फिर उसी तरह विश्वास दिलाते हुए सादगी से कहा तो उसके दोस्तों ने कहा;चल छोड़ यार!आज भूल गयी होगी...कह रही है तो कल ले ही आयेगी......

अगली सुबह भी यही हुआ सीमा यही कहते हुए आगे बढ़ गयी परन्तु आज उसकी सहेलियां भी उसके साथ थी उन सबको जब पूरी बात पता चली तो उन्हें सीमा की फिक्र होने लगी बोली; क्या जरूरत थी उसके मुंह लगने की, कसम क्यों ली तूने.....? अब क्या करेगी......?  कब तक ऐसे चला पायेगी उसे.....?    तू जानती तो है न इन लड़को को..... अब क्या होगा......  चल और लड़कियों को इकट्ठा करते हैं तब सब मिलकर लड़ेंगे इनसे...।

सीमा जानती थी कोई भी लड़की नहीं लड़ेगी।
ऐसे लड़को से पंगा लेकर कौन खुद को मुसीबत में डालेगा...
वह बोली बस कल ही सब खत्म कर दूंगी चिन्ता मत करो..... सब ठीक हो जायेगा । 
तो तू देगी इसे अपनी फोटो ?......  दिमाग तो ठीक है न तेरा ? क्या करेगी अब?...... उसकी सहेलियां उसे घुड़कने लगी।

अगली सुबह स्कूल पहुँचते ही राहुल दोस्तोंं के साथ  वहीं खड़ा मिला, बोला अब आज भी मना मत कर देना.... चुपचाप दे दे अपनी फोटो....!    बस गुस्सा मत दिलाना मुझे, वरना...

तभी सीमा ने बीच में ही उसे रोकते हुए सादगी कहा; मैं क्यूँ मना करूंगी भला ?...आखिर कसम खायी है मैंने...तुम तो जानते हो मैं कभी झूठी कसम नहीं लेती......पर मैं क्या करूं ? रोज फोटो रखती हूँ अपने पास कि कल तुम्हें देनी है पर हर सुबह आज बन जाती है और मैंने कसम खाकर कहा है कि कल दूंगी फिर आज देकर कसम थोड़े न तोड़नी है ...है न...जब कल आयेगा पक्का दे दूंगी,  "कसम से"(कहकर सीमा धीरे-धीरे आगे बढ़ गयी)......।

राहुल और उसके दोस्त हक्के-बक्के से एक दूसरे का मुंह ताकने लगे.......। एक बोला अरे! इसने तो हम सबको बेवकूफ बना दिया....(मुंह बनाते हुए) कल दूंगी...कसम से...और कल तो आता ही नहीं....भई राहुल इसे तो छोड़ेंगे नहीं.... बड़ी आई सीधी-सच्ची लड़की....। पर राहुल एकदम शान्त स्वर में बोला; चलो कल देखते हैं...।

इधर सीमा की सहेलियां भी झिड़कने लगी उसे...तुझे क्या लगता है वो चुप बैठेगा... पता नहीं अब वो सब क्या करेंगे... सीमा शान्त स्वर में बोली,  देखते हैं....

अगले दिन सीमा का विज्ञान का प्रेक्टिकल था...वह प्रयोगशाला में जा रही थी , उसकी कक्षा की कुछ और लड़कियां और उसकी सहेलियां भी उसके साथ थी,तभी राहुल को अपनी तरफ आते हुए देख कर ये सभी वहीं खड़ी हो गयी.....एक अज्ञात सा भय था सबके मन में....।
राहुल सीमा के पास आया हाथ आगे बढ़ाकर मुस्कराते  हुए बोला ; ऑल दि बैस्ट सीमा! गुड लक... राहुल  से ऐसे अप्रत्याशित से शब्द सुनकर सीमा चुप खड़ी की खड़ी रह गयी...बिना हाथ मिलाये ही राहुल आगे बढ़ गया ...सीमा उसे जाते हुए देखकर सोचने लगी अरे मुझे भी तो उसे विश करना था,प्रेक्टिकल तो उसका भी है...... तभी राहुल ने पीछे मुड़कर देखा सीमा ने बिना कुछ बोले अपना अगूंठा दिखाते हुए विश किया उसने भी हाथ हिला दिया....बाकी सभी लड़कियां सीमा की समझदारी और बुद्धिमत्ता का लोहा मानने लगी... वे भी समझ चुकी थी कि हर जंग लड़कर ही नहीं जीती जाती।


शनिवार, 5 जनवरी 2019

चलो बन गया अपना भी आशियाना



Old broken home full of dreams and hopes

कहा था मैंने तुमसे
इतना भी न सोचा करो
एक दिन सब ठीक हो जायेगा
अपना ख्याल भी रखा करो
रहते थे तुम्हारे सूखे होंठ 
फुर्सत न थी इतनी कि
पी सको पानी के घूँट
अथक ,अनवरत परिश्रम करके 
हमेशा चली तुम संग मेरे मिलके
दर-दर की भटकन, 
बनजारों सा जीवन
चाहिए था तुम्हें बस अपना आशियाना
लगता बुरा था तब किरायेदार कहलाना....
पाई-पाई बचा-बचाके
जोड़-जुगाड़ सभी लगाके
उम्र भर करते-कमाते
आज बुढ़ापे की देहलीज पे आके
अब जब बना पाये  ये आशियाना
तब तक खो चुकी तुम
अपनी अनमोल सेहत का खजाना
रूग्ण देह कराहते हुए भी
कहती मुझे तुम ये घर सजाना
चलो बन गया अपना भी आशियाना !

पर मैं करूं क्या तुम्हारे बिना
कराहती हो तुम तड़पता है ये दिल 
दुख में हो तुम तो दर्द में हूँ मैं भी
नहीं भा रहा अपना ये आशियाना
अकेले क्या इसको मैंने सजाना
तुम बिन नहीं कुछ भी ये आशियाना

काश मै तब और सक्षम होता
जीवन तुम्हारा कुछ और  होता
आज भी तुम सुखी मुस्कुराती
ये आशियाना खुद से सजाती
हम फिर उसी प्रेम को आज जीते !
बिखरे से सपनों को फिर से संजोते !!
                                       
                       चित्र; साभार गूगल से