गुरुवार, 31 जनवरी 2019

🌜नन्हेंं चाँद की जिद्🌛



moon

           
भोर हुई पर नन्हें शशि आज
आसमान में ही विराजमान हैं
       
पिता आकाश इससे अनभिज्ञ
पुत्र रवि के आगमन की शान में हैं।
   
माँ धरती प्रतीक्षा में चिन्तित......
पुत्र शशि की राहें ताक रही ।

कहाँ रह गया नन्हा शशि.......
झुक सुदूर तक झाँक रही ।
     
नन्हा शशि तो जिद्द कर बैठा.....
मैं आज नहीं घर जाऊँँगा ।
               
याद आती है रवि भैया की......
मैं उनसे यहीं मिल पाऊँँगा ।

धरती माँ ने भेजा संदेशा.....
शशि जल्दी से आओ घर !
                 
क्रोधित होंगे आकाश पिता......
तुम क्या करते हो राहों पर ?...

शीत की ठण्डी में ठिठुरा मैं.....
माँ ! काँप रहा हूँ यहाँ थर-थर ।
               
भाई रवि मेरे धूप मुफ्त में......
बाँट रहे हैं ,धरती पर ।

मिलकर उनसे थोड़ी - सी......
गर्माहट भी ले आऊँगा ।
               
याद आती है रवि भैया की.....
उनसे मिलकर ही घर आऊँँगा ।।

      चित्र ;साभार गूगल से...

30 टिप्‍पणियां:

शैलेन्द्र थपलियाल ने कहा…

बहुत सुंदर। एक पुरानी कविता की याद आ गयी। "हठ कर बैठा चाँद एक दिन माता से यह बोला ।
सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।
सन सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूं ठिठुर ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ।
और आज भाई से मिलने की जिद,और माँ का बुलावा।।
सजीव चित्रण। बहुत खूब।

मन की वीणा ने कहा…

वाह अद्भुत अनुपम शशि की जीद देखो मां को संकट में डाल गई कैसे मिल पाये शशि और रवि भाई।
वाह।

Meena Bhardwaj ने कहा…

बेहद खूबसूरत कल्पना...... बहुत मनभावन रचना सुधा जी ।

Jyoti Dehliwal ने कहा…

बहुत खूबसूरत प्रस्तूति, सुधा दी।

Anuradha chauhan ने कहा…


माँ शीत की ठण्डी में ठिठुरा....
मैं काँप रहा हूँ यहाँ थर-थर ।

भाई रवि मेरे धूप मुफ्त में......
बाँट रहे हैं सदा घर-घर ।

मिलकर उनसे थोड़ी - सी......
गर्माहट भी ले आऊँगा ।

याद आती है रवि भैया की.....
उनसे मिलकर ही आऊँँगा ।।
वाह बहुत ही बेहतरीन रचना सुधा जी

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद, उत्साहवर्धन के लिए.....
"हठ कर बैठा चाँद" राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की सुप्रसिद्ध रचना को
हम भी कंठस्थ रखते थे कभी...।
सस्नेह आभार

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद, सखी! उत्साहवर्धन के लिए....
सस्नेह आभार।

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद, मीना जी....
सस्नेह आभार ।

Sudha Devrani ने कहा…

आपका हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार ज्योति जी !

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद, अनुराधा जी...
सादर आभार।

Sweta sinha ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
४ फरवरी २०१९ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

चाँद सूरज के इस खेल को बाल-सुलभ मन से देखने का सुन्दर प्रयास है ...
काश हर दिल बच्चा हो जाए और इन बातों पर दिल खोल के खिलखिलाए ...
बहुत ही सुन्दर रचना ...

Kamini Sinha ने कहा…

याद आती है रवि भैया की.....
उनसे मिलकर ही घर आऊँँगा
बहुत प्यारी कल्पना ,लाजबाब ,सादर स्नेह सखी

व्याकुल पथिक ने कहा…

बहुत सुंदर भाव

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद श्वेता जी सस्नेह आभार...

Sudha Devrani ने कहा…

बच्चों के साथ सुबह की सैर पर जाते हुए आसमान में चाँद देखकर बच्चों के कोतुहल और जिज्ञासा भरे प्रश्नों के कारण ही मन में ऐसी कल्पना उभरी....
आपका हृदयतल से आभार आभार नासवा जी !

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत धन्यवाद कामिनी जी...
सस्नेह आभार।

Sudha Devrani ने कहा…

आभारी हूँ शशि जी बहुत बहुत धन्यवाद आपका...।

Nitish Tiwary ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति।
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।
iwillrocknow.com

शिक्षा में ने कहा…

बहुत ही शानदार कविता है। पुराने दिनों की याद ताजा कर दी इसने। बहुत आनंद की अनुभूति हुई।

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना सखी
सादर

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद, नितीश जी !
सर्वप्रथम माफी चाहती हूँ प्रत्युत्तर में देरी के लिए....
सादर आभार...

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद आपका...
सादर आभार ।

Sudha Devrani ने कहा…

सस्नेह आभार अनीता जी !

संजय भास्‍कर ने कहा…

पुराने दिनों की याद उनसे मिलकर ही घर आऊँँगा
बहुत प्यारी कल्पना

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद,संजय जी !
सादर आभार...

Himkar Shyam ने कहा…

बहुत सुंदर

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद श्याम जी!
ब्लॉग पर आपका स्वागत है...
सादर आभार।

ज्योति सिंह ने कहा…

वाह लाजवाब

Sudha Devrani ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद, ज्योति जी !
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है...

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