जल संरक्षण कविता | पानी का करो संचय | मनहरण घनाक्षरी
क्या सफलता केवल व्यक्ति की मेहनत का परिणाम होती है, या उसके पीछे माता-पिता के त्याग, संघर्ष और वर्षों की तपस्या भी छिपी होती है? यह लघुकथा उसी सच को उजागर करती है, जिसे सफलता मिलने के बाद अक्सर लोग भूल जाते हैं। आइए पढ़ते हैं "चींटी के पर निकलना", एक ऐसी मार्मिक प्रेरक लघुकथा जो सफलता के साथ विनम्रता और माँ के त्याग का वास्तविक महत्व समझाती है।
"ये क्या बात हुई, आंटी! सफलता मुझे मिली और बधाइयाँ मम्मी को?" रोहन ने मुस्कराते हुए कहा।
शीला ने स्नेह से उसकी ओर देखा और बोली, "हाँ बेटा! तेरी मम्मी की वर्षों की तपस्या रंग लाई है। बधाई तो उन्हें भी बनती है। और तुझे भी ढेरों शुभकामनाएँ। भगवान करे तू खूब तरक्की करे और हमेशा खुश रहे।"
यह कहते हुए उसने रोहन के सिर पर प्यार से हाथ फेर दिया।
रोहन थोड़ा असहज होकर बोला, "तपस्या कैसी, आंटी? मम्मी ने बस कुछ मन्नतें ही तो माँगी थीं। मेहनत तो मैंने दिन-रात पढ़कर की है। अगर मैं मेहनत न करता, तो क्या सिर्फ मन्नतों से मेरा चयन हो जाता?"
शीला हल्का-सा मुस्कराई।
"सही कहा बेटा। लेकिन मेहनत करने का अवसर भी तभी मिला, जब तेरी माँ ने अपनी हर इच्छा दबाकर, हर मुश्किल सहकर, तुझे यहाँ तक पढ़ाया।"
रोहन तुरंत बोला, "आंटी! कौन-सी बड़ी बात है? हर माँ-बाप अपने बच्चों को पढ़ाते ही हैं। आप भी तो पढ़ा रही हैं अपने बच्चों को।"
शीला की मुस्कान अब गंभीरता में बदल चुकी थी।
"माफ करना बेटा, मुझसे गलती हो गई। सच कहता है तू। बधाई तेरी माँ को नहीं, सिर्फ तुझे ही मिलनी चाहिए। तेरी माँ ने किया ही क्या है? बस अपनी हड्डियाँ तोड़कर मेहनत-मजदूरी करती रही, अपनी ज़रूरतें कुर्बान करती रही, अपनी खुशियाँ गिरवी रखती रही... यह सब तो कोई मायने ही नहीं रखता, है न?"
रोहन का सिर झुकने लगा।
शीला ने अंदर की ओर आवाज़ लगाई—
"अरी सरला! सुन...
मैं तो तुझसे कहने आई थी कि अब परमात्मा की कृपा से बेटा कमाने वाला हो गया है। अब तू खुद को इतना मत खपा। लेकिन अभी रोहन की बातें सुनकर लगता है, तू कमर कस ले। अभी छोटे बेटे मोहन के लिए भी वही सब करना होगा, जो रोहन के लिए किया था।"
फिर उसने रोहन की आँखों में देखते हुए कहा—
"और बेटा...
याद रखना, सफलता कभी अकेले किसी एक की नहीं होती। उसके पीछे किसी माँ का त्याग, किसी पिता का संघर्ष और पूरे परिवार की अनगिनत कुर्बानियाँ छिपी होती हैं।
चींटी के पर निकलना... उसके अपने ही विनाश का कारण बन जाता है।"
रोहन के पास अब कोई उत्तर नहीं था। उसकी झुकी हुई निगाहें पहली बार अपनी सफलता के पीछे खड़ी अपनी माँ की तपस्या को पहचान रही थीं।
निष्कर्ष
सफलता कभी अकेले किसी एक व्यक्ति की नहीं होती। उसके पीछे किसी माँ की अनगिनत कुर्बानियाँ, किसी पिता का संघर्ष और पूरे परिवार का निस्वार्थ सहयोग होता है। इसलिए मंज़िल मिल जाने पर उन हाथों को कभी मत भूलिए जिन्होंने गिरकर भी आपको संभाला। सफलता तभी सार्थक है, जब उसके साथ विनम्रता, कृतज्ञता और अपनों के त्याग का सम्मान भी जुड़ा हो।
✨धन्यवाद🙏
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प्रिय सुधा जी, बहुत अरसे के बाद ब्लॉग पर आकर धीरे -धीरे सबसे जुड़ रही हूँ! आपकी कथा पढ़कर ना जाने कितने नाशुक्रे चेहरे आँखों में सजीव हो उठे! आज कृतघ्न संततियों का युग है! उच्च हो या निम्न हर वर्ग कथित ज्ञानी ( अज्ञानी) और मुंहजोर बच्चों से पीड़ित है! इनसे सुखद भविष्य की आशा रखना व्यर्थ है! एक सार्थक रचना के लिए हार्दिक बधाई 🌺🌺💐💐
जवाब देंहटाएंतहेदिल से धन्यवाद आपका सखी ! आप आ रही हैं ये ही सबसे बड़ी खुशी की बात है । इतने समय बाद आपको ब्लॉग पर देखकर मन आल्हादित है । हार्दिक अभिनंदन सखी !
हटाएंहद दर्जे कल एहसास फरामोश और बदतमीज होती नयी पीढ़ी समाज के लिए गंभीर सरदर्द से कम नहीं है।
जवाब देंहटाएंबहुत कुछ सोचने को मजबूर करती विचारणीय कहानी दी।
सस्नेह प्रणाम दी
सादर
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार १९ जुलाई २०२४ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सस्नेह आभार एवं धन्यवाद प्रिय श्वेता ! अनमोल प्रतिक्रिया के साथ रचना को मंच प्रदान करने हेतु ।
हटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार आ. जोशी जी !
हटाएंसुंदर कहा।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार अनीता जी !
हटाएंबहुत खूब सुधा जी ,पता नहीं इस नई पीढी की सोच कहाँ जाकर रुकेगी ।
जवाब देंहटाएंजी, शुभा जी !हार्दिक आभार आपका ।
हटाएंबहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत सुन्दर मार्मिक रचना
जवाब देंहटाएंसुधार जी बहुत गहन और हृदय स्पर्शी लघु कथा आज का युवा माता पिता के त्याग को समझ ही कहां पाता है, समझेगा जरूर पर जब स्वयं माँ पिता की जगह खड़ा होगा।
जवाब देंहटाएंयथार्थ परक सार्थक सृजन।
खूबसूरती से पिरोया सुन्दर कहानी
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