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बने पकौड़े गरम-गरम | बारिश में पकौड़े पर भावपूर्ण हिंदी कविता

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परिचय बारिश की रिमझिम फुहारें, भीगी मिट्टी की सौंधी खुशबू और गरमागरम पकौड़ों के साथ अदरक वाली चाय—बरसात का मौसम अपने साथ ऐसी ही मनभावन यादें लेकर आता है। ‘बने पकौड़े गरम-गरम’  बरसात पर लिखा एक भावपूर्ण और मनोरंजक हिंदी गीत है, जिसमें बारिश के सुहाने मौसम और परिवार के साथ पकौड़े-चाय का आनंद सहज शब्दों में चित्रित किया गया है। ख्यातिलब्ध पत्रिका  'अनुभूति'  के  'गरम पकौड़े'  विशेषाँक में मेरे गीत 'बने पकौड़े गरम-गरम' को सम्मिलित करने हेतु ' आदरणीया पूर्णिमा वर्मन जी ' का हार्दिक आभार । घुमड़-घुमड़ कर घिरी घटाएं बिजली चमकी चम चम चम   झम झम झम झम बरसी बूँदें बने पकौड़े गरम-गरम सनन सनन कर चली हवाएं,  सर सर सर सर डोले पात  भीगी माटी सौंधी महकी पुलकित हुआ अवनि का गात  राहत मिली निदाघ से अब तो हुआ सुहाना ये मौसम  झम झम झम झम बरसी बूँदें बने पकौड़े गरम-गरम अदरक वाली कड़क चाय की,  फरमाइश करते दादा । दादी बोली मेरी चाय में मीठा हो थोड़ा ज्यादा ! बच्चों को मीठे-मीठे  गुलगुले चाहिए नरम नरम झम झम झम झम बरसी बूँदें,  बने पकौड़े गरम-गरम खट्टी...

चींटी के पर निकलना | माँ की तपस्या पर प्रेरक लघुकथा

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  परिचय क्या सफलता केवल व्यक्ति की मेहनत का परिणाम होती है, या उसके पीछे माता-पिता के त्याग, संघर्ष और वर्षों की तपस्या भी छिपी होती है? यह लघुकथा उसी सच को उजागर करती है, जिसे सफलता मिलने के बाद अक्सर लोग भूल जाते हैं। आइए पढ़ते हैं "चींटी के पर निकलना" , एक ऐसी मार्मिक प्रेरक लघुकथा जो सफलता के साथ विनम्रता और माँ के त्याग का वास्तविक महत्व समझाती है।           सफलता किसकी? बेटे की या माँ की तपस्या की "ये क्या बात हुई, आंटी! सफलता मुझे मिली और बधाइयाँ मम्मी को?" रोहन ने मुस्कराते हुए कहा। शीला ने स्नेह से उसकी ओर देखा और बोली, "हाँ बेटा! तेरी मम्मी की वर्षों की तपस्या रंग लाई है। बधाई तो उन्हें भी बनती है। और तुझे भी ढेरों शुभकामनाएँ। भगवान करे तू खूब तरक्की करे और हमेशा खुश रहे।" यह कहते हुए उसने रोहन के सिर पर प्यार से हाथ फेर दिया। रोहन थोड़ा असहज होकर बोला, "तपस्या कैसी, आंटी? मम्मी ने बस कुछ मन्नतें ही तो माँगी थीं। मेहनत तो मैंने दिन-रात पढ़कर की है। अगर मैं मेहनत न करता, तो क्या सिर्फ मन्नतों से मेरा चयन हो जाता?" शीला हल्का-सा मु...

भीषण गर्मी और पर्यावरण संरक्षण पर कुण्डलिया छंद

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 परिचय:  वर्तमान समय में बढ़ती गर्मी, अनियमित वर्षा और जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन चुके हैं। मानव द्वारा प्रकृति के निरंतर दोहन और वनों की कटाई का दुष्परिणाम आज भीषण गर्मी, सूखा और पर्यावरण असंतुलन के रूप में सामने आ रहा है। प्रस्तुत कुण्डलियों में इसी गंभीर समस्या का चित्रण करते हुए वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया है। 【1】 भीषण गर्मी से हुआ, जन-जीवन बेहाल । लू की लपटें चल रही, तपे दुपहरी ज्वाल ।  तपे दुपहरी ज्वाल, सभी बारिश को तरसें । बीत रहा आषाढ़, बूँद ना बादल बरसे । कहे सुधा सुन मीत, बने सब मानव धर्मी । आओ रोपें वृक्ष , मिटेगी भीषण गर्मी ।। 【2】 रातें काटे ना कटे,  अलसायी है भोर । आग उगलती दोपहर, त्राहि-त्राहि चहुँ ओर । त्राहि-त्राहि चहुँ ओर, वक्त ये कैसा आया । प्रकृति से खिलवाड़, नतीजा ऐसा पाया । कहे सुधा कर जोरि, वनों को अब ना काटें । पर्यावरण सुधार , सुखद बीते दिन-रातें ।। निष्कर्ष:  प्रकृति और मानव का संबंध अत्यंत गहरा है। यदि हम पर्यावरण संरक्षण के प्रति सजग नहीं होंगे तो बढ़ती गर्मी और जलवायु संकट भविष्य को और अधिक ...

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