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अक्टूबर, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मैं जो गई बाहर

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चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया ! हाँ, बदल सा गया  मेरा घर ! घर की दीवारें । इन दीवारों में पहले सी ऊष्मा तो ना रही रही तो बस ये निस्तब्धता अनचीन्ही सी  । चार दिन.. बस चार दिन, मैं जो गई बाहर, कितना कुछ बदल गया  । घर का आँगन,  आँगन मे रखे गमले, गमलों में उगे पौधे - रोज पानी मिलने पर भी इनकी पत्तियों में,  फूलों में वो मुस्कान तो ना रही, जो पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन,  मैं जो गई बाहर, जैसे सब कुछ बदल गया । हाँ, बदल सा गया  मेरा मन भी । मन के भाव, भावों की ये नदी अब  वैसे शांत तो नहीं बह रही जैसे पहले बहती थी । ये भावों की नदी जाने क्यों जैसे बेचैन सी भाग रही है, किसी अनजान से , सागर की ओर । और भावनाओं की सरगम भी - वैसे तो ना रही, जैसे पहले रहती थी । चार दिन .. बस चार दिन,  मेरे दूर जाते ही.. समय ने जैसे अपना रंग ही बदल लिया । सचमुच.. बहुत कुछ बदल गया । हाँ ! नवीन स्फूर्ति आई । पर ये स्फूर्ति भी तो जैसे वसंत की असमय आँधी — जो पुष्पों को महकाती कम, और बिखेरती अधिक है। और स्थिरता - वह तो मानो शरद की निस्तब्ध चाँद...

नयी सोच 【2】

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                      चित्र, साभार गूगल से.. डब्बू - - दादू ! आज मेरे फ्रेंड्स डिनर पे बाहर जा रहे हैं,   मैं भी जाऊँ उनके साथ ?... प्लीज दादू ! हाँ कह दो न। दादाजी -- अरे नहीं बेटा ! तू अपने दोस्तों के साथ कैसे डिनर करेगा ?  आजकल ज्यादातर लड़के नॉनवेज खाते हैं  डिनर में, फिर एक ही टेबल पर !                  छिः छी...!     अच्छा बता क्या खाना है तुझे ?  अभी मँगवाता हूँ , बोल !  डब्बू - ----  नहीं ना दादू! मुझे बाहर जाना है । दादाजी ----  ओ के ! चल फिर तैयार हो जा ! अभी चलते हैं, आज मैं तुझे तेरी पसंद की हर चीज खिलाउंगा। चल चल !  जल्दी कर! डब्बू - ----  ओह दादू! नहीं जाना मुझे आपके साथ (गुस्से से खीझते हुए)   मुझे समझ नहीं आता नॉनवेज से आपको दिक्कत क्या है ?  हाँ खाते हैं सब लोग नॉनवेज !  खाने की चीज है तो खायेंगे ही न, और हम भी तो खाते हैं न अंडे! दादाजी ---  (सख्त लहजे में) अंडे नॉनवेज में नहीं आते ड...

गति मन्द चंद्र पे तरस आया

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                    चित्र साभार,pixabay.com से बाद पूनम के चाँद वृद्ध सा सफर न पूरा कर पाया। घन बिच बैठा तब भोर भानु  गति मन्द चंद्र पे तरस आया। दी शीतलता दान विश्व को पूनम में है पाया मान नन्हा सा ये बढ़ा शुक्ल में  पाक्षिक उम्र में वृहद ज्ञान आज चतुर्थी के अरुणोदय नभ में दिखी यूँ मलिन काया घन बिच बैठा तब भोर भानु गति मन्द चंद्र पे तरस आया हर भोर उद्भव चमक रवि हर साँझ फिर अवसानी है दिन मात्र जीवन सफर विश्व सम और ना गतिमानी है आदि अंत का जटिल सत्य इनको न कभी भरमा पाया घन बिच बैठा तब भोर भानु गति मन्द चंद्र पे तरस आया नसीहत सदा देती प्रकृति हम सीखते ही हैं कहाँ नीयत से ही बनती नियति कर्मठ बताते हैं यहाँ प्रखर रवि और सौम्य शशि दोनों ने ही जग चमकाया घन बिच बैठा तब भोर भानु गति मन्द चंद्र पे तरस आया

हायकु

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     चित्र, साभार picabay.com से        [1] कर स्पर्श से लाजवन्ती सिकुड़ी ~ गाँव की राह            [2] मावठ भोर~ फटी बंडी की जेब टटोले वृद्ध          [3] मकड़ीजाले~ जीर्ण झुग्गी में बैठे वृद्ध युगल             [4] ठूँठ झखाड़~ झरोखे में चिड़िया तिनका दाबे         [5] ज्येष्ठ मध्याह्न~ गन्ने लादे नारी के नंगे कदम           [6] कुहासा भोर~ मुड़ा खत पकड़े माँ दूल्हे संग              [7] भोर कुहासा~ बाला बाँधी फूलों की  तिरंगी बेणी      [8] भोर लालिमा~ कूड़े के ढ़ेर संग शिशु रूदन        [9] श्रावण साँझ~ दलदल में फँसा  हाथी का बच्चा          [10] मावठ भोर~ लहसुन की क्यारी में नन्ही चप्पल      [11] फाग पूर्णिमा~ महिला मुख पर गोबर छींटे      [12] गोस्त की गन्ध~ बालिका की गोद में लेटा मेमना    ...

कबूतर की दादागिरी

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                    चित्र साभार pixabay से एक कबूतर जमा रहा है,  बिखरे दानों पर अधिकार । शेष कबूतर दूर हो रहे, उसकी दादागिरी से हार । गोल घूमता गुटर-गुटर कर , गुस्से से फूला जाता । एक-एक के पीछे पड़कर, उड़ा सभी को दम पाता । श्वेत कबूतर तो कुष्ठी से, हैं अछूत इसके आगे । देख दूर से इसके तेवर, बेचारे डरकर भागे । बैठ मुंडेरी तिरछी नजर से, सबकी बैंड बजाता वो । सुबह से पड़ा दाना छत पर, पूरे दिन फिर खाता वो । समझ ना आता डर क्यों उसका, इतना माने पूरा दल ? मिलकर सब ही उसे भगाने, क्यों न लगाते अपना बल ? किस्सों में पढ़ते हैं हम जो, क्या ये सच में है सरदार ? या कोई बागी नेता ये, बना रहा अपनी सरकार ? नील गगन के पंछी भी क्या, झेलते होंगे सियासी मार ? इन उन्मुक्त उड़ानों का क्या, भरते होंगे ये कर भार ? पढ़िए एक और रचना इसी ब्लॉग पर ●  लघु-कविताएं -- सैनर्यु

व्रती रह पूजन करते

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कुण्डलिया छंद चित्र : साभार pixabay से...... {1}  बदली में छुपते फिरे, सावन मास मयंक। दर्शन को मचले धरा, गगन समेटे अंक । गगन समेटे अंक , बहुत  ही लाड-लड़ाये। भादो बरसे मेघ, कौन अब तुम्हें छुपाये। कहे धरा मुस्काय, शरद में मत छुप जाना। व्रती निहारे चाँद, प्रेमरस तुम बरसाना ।।                          {2} नवराते में गूँजते, माँ के भजन संगीत । जयकारे करते सभी,  माँ से जिनको प्रीत। माँ से जिनको प्रीत, व्रती  रह पूजन करते। पा माँ का आशीष, कष्ट जीवन के हरते। कहे सुधा करजोरि, करो माँ के जगराते। हो जीवन भयमुक्त, सफल जिनके नवराते। व्रती -- उपवासी पढिए, माता की भक्ति पर एक और रचना निम्न लिंक पर ●  विधना की लिखी तकदीर बदलते हो तुम

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