तीन कुण्डलिया :- भारत महान, हार और विचलित
अनुभूति पत्रिका में प्रकाशित तीन कुण्डलिया कुण्डलिया हिन्दी साहित्य का एक लोकप्रिय छंद है जो अपनी लय, भाव और संदेश के कारण पाठकों को आकर्षित करता है। प्रस्तुत हैं तीन कुण्डलिया— 'भारत महान', 'हार' और 'विचलित'। इन रचनाओं में देशप्रेम, संघर्ष में सकारात्मक सोच तथा मानसिक संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया गया है। भारत महान सारे जग मे हो रहा ,भारत का गुणगान । शुभ संस्कारी भावना, है इसकी पहचान । है इसकी पहचान, सभ्यता बड़ी निराली । सर्व धर्म सत्कार, बनाता गौरवशाली । कहे सुधा सुन मीत, लगा लो तुम भी नारे । भारत देश महान, कह रहे जग में सारे।। हार हार करें स्वीकार जो, होते नहीं निराश । सतत परिश्रम कर सदा,मन में रखते आस ।। मन में रखते आस, नहीं बाधा से डरते । गिरकर उठते रोज, कभी ना मन से थकते ।। कहे सुधा निज बात, है यही जीत का सार । करते रहें प्रयास, सौपान बनेगी हार ।। बिचलित बिचलित गर मन हो रहा, कर लें प्राणायाम । साधें श्वास - प्रश्वास निज, मिले सुखद आराम ।। मिले सुखद आराम, धैर्य मन में है आता । मिटे बिचार विकार, भाव निर्मल हो जाता ।। कहे सुधा सुन मीत,श्वास साधें जो नियमित...

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 27 जुलाई 2021 शाम 5.00 बजे साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंतहेदिल से धन्यवाद आ.यशोदा जी मेरी रचना को मुखरित मौन के मंच पर स्थान देने हेतु।
हटाएंसादर आभार।
रिश्तों का ऐसा क्यो़ होता ताना-बाना
जवाब देंहटाएंसाथ चलते है लगते मगर अजनबी अनजाना।
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सुंदर भावपूर्ण सृजन प्रिय सुधा जी।
सस्नेह।
बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ श्वेता जी!
हटाएंसहृदय धन्यवाद एवं आभार आपका।
रिश्तों ने भी बदलते समय में अपना चेहरा बदला है। भौतिकता के आगे प्रेम प्यार गौण होकर रह गए हैं। रिश्तों पर गहनता से पड़ताल करतीं रचना प्रिय सुधा जी। जिन्होंने रिश्ते नातों का उत्कर्ष देख रखा हो उनके लिए ये पतन किसी सदमे से कम नहीं। पर क्या करें हर जगह यही हो रहा है।
जवाब देंहटाएंसारगर्भित प्रतिक्रिया द्वारा प्रोत्साहन हेतु बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार रेणु जी!
हटाएंजीवन के कुछ सच ऐसे भी होते हैं। सही कहा आपने। दिल को छू लिया।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार एवं धन्यवाद आ.विश्वमोहन जी!
हटाएंरिश्तों में स्वार्थ के आ जाना ही दुखदायी है ।
जवाब देंहटाएंभौतिक साधनों के पीछे भागते भागते रिश्तों की अहमियत को खो देते हैं । विचारणीय रचना ।
तहेदिल से धन्यवाद आ.संगीता जी! आपकी सराहनासम्पन्न प्रतिक्रिया हमेशा उत्साह द्विगुणित कर देती है।
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