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दिसंबर, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भीषण गर्मी पर दोहा मुक्तक

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 परिचय आज बढ़ती गर्मी केवल एक मौसमी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रकृति की ओर से दिया गया गंभीर संकेत है। तपती धरती, झुलसते उपवन, व्याकुल जनजीवन और घटते वन हमें सोचने पर विवश करते हैं कि कहीं हम स्वयं ही इस संकट के लिए उत्तरदायी तो नहीं हैं। प्रस्तुत हैं इसी विषय पर चार मुक्तक—                                  व्याकुल सकल जहान है, नभ से बरसे आग। लगता अब रवि को नहीं, धरती से अनुराग । लू की लपटों से हुआ , जन जीवन बेहाल, खग मृग सब बेचैन हैं, झुलसे उपवन बाग । आतप से तपती धरा, तपे कृषक - मजदूर । तानाशाही रवि करे, लू की लपटें क्रूर । गर्म धूल आँखों भरी, पर रुकते नहीं पाँव,     दया करो श्रमजीव पर , तज दो भानु गुरूर ।             क्रोध सूर्य का देखकर, काँप रही है छाँव, गर्म नदी में तैरती, औंधे मुँह की नाव । गुमसुम से बाजार हैं, गली-गली सुनसान,  राग-द्वेष की आग में , जलते देखो गाँव । उमस बढ़ गई और भी , बूँद गिरी दो चार , बिजली भी गुल हो गई, जनजीवन लाच...

"नववर्ष मंगलमय हो"

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                  नववर्ष के शुभ आगमन पर,                   शुभकामनाएं हैं हमारी।                   मंगलमय जीवन हो सबका,                   प्रेममय दुनिया हो सारी।                   हवा सुखमय मधुर महके,                   हरितिमा अपनी धरा हो।                   खुशनुमा  आकाश अपना,                   स्वर्ग सा संसार हो।                   नववर्ष ऐसा मंगलमय हो।                           आशाओं के अबुझ दीपक,                  अब जले हर इक सदन में। ...

"तुम हो हिन्दुस्तानी"

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   प्यारे बच्चों ! दुनिया में तुम नया सवेरा लाना,        जग में नाम कमाना ,कुछ नया-सा कर के दिखाना।          फैली तन्हाई, अब तुम ही इसे मिटाना,             ऐसा कुछ कर जाना..   गर्व करें हर कोई तुम पर "तुम हो हिन्दुस्तानी"।       क्षितिज का तुम भ्रम मिटाना,          ज्ञान की ऐसी ज्योति जगाना।             धरा आसमां एक बनाकर,                सारे भेद मिटाना....                 कुछ ऐसा करके दिखाना,  गर्व  करें हर कोई तुम पर "तुम हो हिन्दुस्तानी"।   अन्धकार मे भी प्रकाश सा उजियारा हो,         सत्य घोष हो हर तरफ जय का नारा हो।           जाति-पाँति का फर्क मिटाकर,              सबको एक बनाना..    गर्व करे हर कोई तुम पर "तुम हो हिन्दुस्तान...

बच्चों के मन से

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                                          माँ ! तुम इतना बदली क्यों ?                मेरी प्यारी माँ बन जाओ                बचपन सा प्यार लुटाओ यों                माँ ! तुम इतना बदली क्यों ?                                                                           बचपन में जब भी गिरता था               दौड़ी- दौड़ी आती थी।               गले मुझे लगाकर माँ तुम               प्यार से यों सहलाती थी।               चोट को मेेरी...

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