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भीषण गर्मी पर दोहा मुक्तक

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 परिचय आज बढ़ती गर्मी केवल एक मौसमी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रकृति की ओर से दिया गया गंभीर संकेत है। तपती धरती, झुलसते उपवन, व्याकुल जनजीवन और घटते वन हमें सोचने पर विवश करते हैं कि कहीं हम स्वयं ही इस संकट के लिए उत्तरदायी तो नहीं हैं। प्रस्तुत हैं इसी विषय पर चार मुक्तक—                                  व्याकुल सकल जहान है, नभ से बरसे आग। लगता अब रवि को नहीं, धरती से अनुराग । लू की लपटों से हुआ , जन जीवन बेहाल, खग मृग सब बेचैन हैं, झुलसे उपवन बाग । आतप से तपती धरा, तपे कृषक - मजदूर । तानाशाही रवि करे, लू की लपटें क्रूर । गर्म धूल आँखों भरी, पर रुकते नहीं पाँव,     दया करो श्रमजीव पर , तज दो भानु गुरूर ।             क्रोध सूर्य का देखकर, काँप रही है छाँव, गर्म नदी में तैरती, औंधे मुँह की नाव । गुमसुम से बाजार हैं, गली-गली सुनसान,  राग-द्वेष की आग में , जलते देखो गाँव । उमस बढ़ गई और भी , बूँद गिरी दो चार , बिजली भी गुल हो गई, जनजीवन लाच...

सब क्या सोचेंगे !

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  "मोना !.. ओ मोना" !... आवाज देते हुए माँ उसके स्टडी रूम में पहुँची तो देखा कि बेटी ने खुली किताब के ऊपर डॉल हाउस सजा रखा और अपनी गुड़िया को सजाने में इतनी तल्लीन है कि ना तो उसे कोई आवाज सुनाई दे रही और ना ही माँ के आने की आहट । कल इसकी परीक्षा है और आज देखो इसे ! ये लड़की पढ़ने के नाम पर खेल में बिजी है । गुस्से में माँ ने उसकी बाँह पकड़कर उसे झिझोड़ा तो वो एकदम झसक सी गई  । सामने माँ को देखकर आँख बंद कर गहरी साँस ली फिर बोली "ओह ! मम्मी ! आप हो ! मुझे लगा पापा ही पहुँच गए"। "अच्छा ! पापा का डर और मम्मी ऐवीं" ! गुस्से के कारण माँ की आवाज ऊँची थी । "श्श्श...क्या मम्मी ! आपके अंदर पापा की आत्मा घुस गई क्या" ? "देख मोना ! मुझे गुस्सा मत दिला ! बंद कर ये खेल खिलौने ! और चुपचाप पढ़ने बैठ !  कल तेरी परीक्षा है, कम से कम आज तो मन लगाकर पढ़ ले" ! "वही तो कर रही हूँ मम्मी ! मन बार -बार इसके बारे में सोच रहा था तो सोचा पहले इसे ही तैयार कर लूँ , फिर मन से पढ़ाई करूँगी" । "बेटा ! तुझे समझ क्यों नहीं आता ? क्यों नहीं सोचती कि तेरे कम मार्...

ज्ञान के भण्डार गुरुवर

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 ख्याति लब्ध पत्रिका 'अनुभूति' के 'अपनी पाठशाला' विशेषांक में मेरी रचना 'ज्ञान के भण्डार गुरुवर ' प्रकाशित करने हेतु आ.पूर्णिमा वर्मन दीदी का हार्दिक आभार । ज्ञान के भंडार गुरुवर,  पथ प्रदर्शक है हमारे । डगमगाती नाव जीवन,  खे रहे गुरु के सहारे । गुरु की पारस दृष्टि से ही ,  मन ये कुंदन सा निखरता । कोरा कागज सा ये जीवन,  गुरु की गुरुता से महकता । देवसम गुरुदेव को हम,  दण्डवत कर, पग-पखारें  । ज्ञान के भंडार गुरुवर,  पथ प्रदर्शक है हमारे । गुरु कृपा से ही तो हमने , नव ग्रहों का सार जाना । भू के अंतस को भी समझा,  व्योम का विस्तार जाना । अनगिनत महिमा गुरु की,  पा कृपा, जीवन सँवारें । ज्ञान के भंडार गुरुवर,  पथ प्रदर्शक है हमारे । तन में मन और मन से तन,  के गूढ़ को बस गुरु ही जाने । बुद्धि के बल मन को साधें,  चित्त चेतन के सयाने । अथक श्रम से रोपते , अध्यात्म शिष्योद्यान सारे। ज्ञान के भंडार गुरुवर,  पथ प्रदर्शक है हमारे । पढ़िए पत्रिका 'अनुभूति' में प्रकाशित मेरी एक और रचना ●  बने पकौड़े गरम-गरम

जीवन की राहों में आखिर असली प्रतिस्पर्धा किससे है ? | प्रेरणादायक लेख

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जीवन की राहों में असली प्रतिस्पर्धा किससे है? बचपन से परीक्षाओं में अव्वल रहने वाले लोग अक्सर यह मान लेते हैं कि वे जीवन की हर प्रतिस्पर्धा में सफल होंगे। लेकिन क्या सच में ऐसा होता है? जीवन की राहों में असली प्रतिस्पर्धी कौन? बचपन से परीक्षाओं में उत्तीर्ण और कक्षा में उत्तीर्ण रहने वाले लोगों को अपनी बुद्धिमानी पर कभी कोई संदेह नहीं रहता । उन्हें विश्वास हो जाता है कि जीवन की हर परीक्षा भी वे अपनी बुद्धि के बल पास कर ही लेंगे ।  लेकिन अक्सर वे नहीं जानते कि जीवन की  परीक्षाएं कुछ अलग होती हैं — यहाँ प्रतिस्पर्धी अपने ही होते हैं। अपनों से प्रतिस्पर्धा का सच  यह सच सामने आता भी है, तो वे सोचते हैं — "अपनों से प्रतिस्पर्धा में भला क्या डर!" हार भी अपनी और जीत भी अपनी । आगे बढ़ने की कीमत: अकेलापन इसीअपनत्व और स्नेह के भाव के साथ वे आगे बढ़ते हैं। लेकिन जैसे ही वे दूसरों से दो कदम आगे निकलते हैं, वे खुद को अकेला पाते हैं। क्यों खींचते हैं लोग पीछे? क्योंकि अपनों के साथ होने वाली ऐसी प्रतिस्पर्धाएं अक्सर आगे बढ़ने की होती ही नहीं, ये प्रतिस्पर्धाएं तो किसी को आगे बढ़ने से...

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