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जनवरी, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भीषण गर्मी पर दोहा मुक्तक

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 परिचय आज बढ़ती गर्मी केवल एक मौसमी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रकृति की ओर से दिया गया गंभीर संकेत है। तपती धरती, झुलसते उपवन, व्याकुल जनजीवन और घटते वन हमें सोचने पर विवश करते हैं कि कहीं हम स्वयं ही इस संकट के लिए उत्तरदायी तो नहीं हैं। प्रस्तुत हैं इसी विषय पर चार मुक्तक—                                  व्याकुल सकल जहान है, नभ से बरसे आग। लगता अब रवि को नहीं, धरती से अनुराग । लू की लपटों से हुआ , जन जीवन बेहाल, खग मृग सब बेचैन हैं, झुलसे उपवन बाग । आतप से तपती धरा, तपे कृषक - मजदूर । तानाशाही रवि करे, लू की लपटें क्रूर । गर्म धूल आँखों भरी, पर रुकते नहीं पाँव,     दया करो श्रमजीव पर , तज दो भानु गुरूर ।             क्रोध सूर्य का देखकर, काँप रही है छाँव, गर्म नदी में तैरती, औंधे मुँह की नाव । गुमसुम से बाजार हैं, गली-गली सुनसान,  राग-द्वेष की आग में , जलते देखो गाँव । उमस बढ़ गई और भी , बूँद गिरी दो चार , बिजली भी गुल हो गई, जनजीवन लाच...

एक मोती क्या टूटा जो उस माल से...

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एक मोती क्या टूटा जो उस माल से हर इक मोती को खुलकर जगह मिल गयी एक पत्ता गिरा जब किसी डाल से नयी कोंपल निकल कर वहाँ खिल गयी तुम गये जो घरोंदा ही निज त्याग कर त्यागने की तुम्हें फिर वजह मिल गयी लौट के आ समय पर समय कह रहा फिर न कहना कि मेरी जगह हिल गई  था जो कमजोर झटके में टूटा यहाँँ जोड़ कर गाँठ अब उसमें पड़ ही गयी कौन रुकता यहाँँ है किसी के लिए सोच उसकी भी आगे निकल ही गई तेरे जाने का गम तो बहुत था मगर जिन्दगी को अलग ही डगर मिल गई   चित्र साभार pixabay से.....

हिन्दी अपनी शान

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कुण्डलिया छन्द --   प्रथम प्रयास  【1】 हिन्दी भाषा देश की, सब भाषा सिरमोर। शब्दों के भण्डार हैं, भावों के नहिं छोर। भावों के नहिं छोर, सहज सी इसकी बोली। उच्चारण आसान, रही संस्कृत हमजोली। कहे सुधा ये बात, चमकती माथे बिन्दी। भारत का सम्मान, देश की भाषा हिन्दी  【2】 भाषा अपने देश की , मधुरिम इसके बोल। सहज सरल मनभावनी, है हिन्दी अनमोल। है हिन्दी अनमोल, सभी के मन को भाती। चेतन चित्त विभोर, तरंगित मन लहराती। कहे सुधा इक बात, यही मन की अभिलाषा। हिन्दी बने महान , राष्ट्र की गौरव भाषा।। चित्र, साभार pixabay से......

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