संदेश

फ़रवरी, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मोबाइल फोन: सुविधा या लत? | मोबाइल के फायदे और नुकसान | हिंदी लेख

चित्र
 परिचय आधुनिक युग में विज्ञान का एक अद्भुत और महत्त्वपूर्ण उपहार मोबाइल फोन है। सुबह आँख खुलने से लेकर रात को विश्राम करने तक यह हमारे जीवन का लगभग अभिन्न साथी बन चुका है। जहाँ एक ओर इसने हमारे अनेक कार्यों को सरल बनाया है, वहीं दूसरी ओर इसका अत्यधिक उपयोग कई नई समस्याओं का कारण भी बन रहा है। प्रस्तुत लेख में मोबाइल फोन की उपयोगिता के साथ-साथ इसकी लत से होने वाले दुष्प्रभावों पर चर्चा की गई है।                                आज मोबाइल फोन ने पूरी दुनिया को मानो हमारी मुट्ठी में समेट दिया है। कुछ दशक पहले जिन कार्यों के लिए घंटों या कई दिनों का समय लगता था, वे आज कुछ ही क्षणों में पूरे हो जाते हैं। यह एक ऐसी तकनीकी सुविधा है जिसने मनुष्य के जीवन को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सरल और सुविधाजनक बना दिया है। किसी से तुरंत संपर्क करना हो, पढ़ाई करनी हो, बैंकिंग का कार्य हो या मनोरंजन—अनेक कार्य अब एक ही मोबाइल फोन से सहजता से पूरे हो जाते हैं। यही कारण है कि आज यह बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर आयु वर...

धरा तुम महकी-महकी बहकी-बहकी सी हो

चित्र
फूलों की पंखुड़ियों से धरा तुम यूँ मखमली हो गयी महकती बासंती खुशबू संग शीतल बयार हौले से बही खुशियों की सौगात लिए तुम अति प्रसन्न सी हो । धरा तुम महकी - महकी बहकी - बहकी सी हो ! सुमधुर सरगम गुनगुनाती धानी चुनरी सतरंगी फूलों कढ़ी हौले-हौले से सरसराती, नवोढ़ा सा सोलह श्रृंगार किये आज खिली - खिली सजी-धजी सी हो । धरा तुम महकी - महकी बहकी-बहकी सी हो ! कोई बदरी संदेशा ले के आई  क्या ? आसमां ने प्रेम-पाती भिजवाई क्या ? प्रेम रंग में भीगी भीगी आज मदहोश सी हो । धरा तुम महकी-महकी बहकी - बहकी सी हो ! मिलन की ऋतु आई धरा धानी चुनरीओढे मुख छुपाकर यूँ लजाई , नव - नवेली सुमुखि जैसे सकुचि बैठी मुँह दिखाई आसमां से मिलन के पल "हाल ए दिल" तुम कह भी पायी ? आज इतनी खोई खोई सी हो । धरा तुम महकी - महकी बहकी - बहकी सी हो ! चाँद भी रात सुनहरी आभा लिए था । चाँदनी लिबास से अब ऊब गया क्या ? तुम्हारे पास बहुत पास उतर आया ऐसे , सगुन का संदेश ले के आया जैसे सुनहरी चाँदनी से तुम नहायी रात भर क्या ? ऐसे निखरी और निखरी सी हो । धरा तुम महकी-महकी बहकी-बहकी सी हो !    ...

"अब इसमें क्या अच्छा है ?...

चित्र
जो भी होता है अच्छे के लिए होता है      जो हो गया अच्छा ही हुआ। जो हो रहा है वह भी अच्छा ही हो रहा है।    जो होगा वह भी अच्छा ही होगा ।              अच्छा ,  अच्छा ,  अच्छा !!!     जीवन में सकारात्मक सोच रखेंगे            तो सब अच्छा होगा !!!                         मूलमंत्र माना इसे और अपने मन में, सोच में , व्यवहार में          भरने की कोशिश भी की। परन्तु हर बार कुछ ऐसा हुआ अब तक,          कि प्रश्न किया मन ने मुझसे ,          कभी अजीब सा मुँह बिचकाकर,            तो कभी कन्धे उचकाकर        "भला अब इसमें क्या अच्छा है" ?                     क्या करूँ ?        कैसे बहलाऊँ इस नादान मन को ?  ...

मेरे दीप तुम्हें जलना होगा

चित्र
    है अंधियारी रात बहुत, अब तुमको ही तम हरना होगा... हवा का रुख भी है तूफानी, फिर भी    मेरे दीप तुम्हें जलना होगा !!! मंदिम-मंदिम ही सही तुम्हें, हर हाल में रोशन रहना होगा....    अब आशाएं बस तुमसे ही, मेरे दीप तुम्हें जलना होगा !!!  तूफान सामने से गुजरे जब, शय मिले जिधर लौ उधर झुकाना... शुभ शान्त हवा के झोकों संग, फिर हौले से  तुम जगमगाना !!! अब हार नहीं लाचार नहीं हर तिमिर तुम्हेंं हरना होगा... उम्मीदों की बाती बनकर, मेरे दीप तुम्हें जलना होगा !!! राहों में अंधेरापन इतना,गर तुम ही नहीं तो कुछ भी नहीं.... क्या पाया यों थककर हमने, मंजिल न मिली तो कुछ भी नहीं !!! हौसला निज मन में रखकर, तूफ़ानों से अब लड़ना होगा .... मन ज्योतिर्मय करने को मेरे दीप तुम्हें जलना होगा !!! जलने मिटने से क्या डरना, नियति यही किस्मत भी यही.... रोशन हो जहांं कर्तव्य निभे, अविजित तुमको रहना होगा !!! अंधियारों में प्रज्वलित रहके  जग ज्योतिर्मय करना होगा तूफानो में अविचलित रह के अब ज्योतिपुंज बनना होगा अब आशाएं बस तुमसे ही म...

जीवन जैसी ही नदिया निरन्तर बहती जाती....

चित्र
पहाड़ों से उद्गम, बचपन सा अल्हड़पन, चपल, चंचल वेगवती,झरने प्रपात बनाती अलवेली सी नदिया, इठलाती बलखाती राह के मुश्किल रौड़ो से,कभी नहीं घबराती काट पर्वत शिखरों को,अपनी राह बनाती इठलाती सी बालपन में,सस्वर आगे बढ़ती जीवन जैसी ही नदिया, निरन्तर बहती जाती.... अठखेलियां खेलते, उछलते-कूदते पर्वतों से उतरकर,मैदानों तक पहुँचती बचपन भी छोड़ आती पहाड़ों पर ही यौवनावस्था में जिम्मदारियाँँ निभाती कर्मठ बन मैदानों की उर्वरा शक्ति बढ़ाती कहीं नहरों में बँटकर,सिंचित करती धरा को कहीं अन्य नदियों से मिल सुन्दर संगम बनाती अब व्यस्त हो गयी नदिया रिश्ते अनेक निभाती जीवन जैसी ही नदिया, निरन्तर बहती जाती........ अन्नपूरित धरा होती, सिंचित होकर नदियों से हर जीवन चेतन होता,तृषा मिटाती सदियों से, अनवरत गतिशील प्रवृति, थामें कहाँ थम पाती है थमती गर क्षण भर तो,विद्युत बना जाती है परोपकार करते हुये कर्मठ जीवन अपनाती जीवन जैसी ही नदिया, निरन्तर बहती जाती....... वेगवती कब रुकती, आगे बढ़ना नियति है उसकी अब और सयानी होकर, आगे पथ अपना स्वयं बनाती छोड़ चपलता चंचलता , गंभीरता अपनाती कहीं डेल्टा कहीं...

फ़ॉलोअर

लेबल

कुण्डलिया छंद5 कुण्डलिया छन्द3 गजल10 गढ़वाली कविता एवं उसका हिन्दी रूपांतरण1 गढ़वाली गीत1 गर्मी पर कविता1 गर्मी पर बाल कविता1 गीत18 गीतात्मक कविता1 घरेलू हिंसा1 चिड़िया1 चौपाई1 जल संरक्षण पर कविता1 जलवायु परिवर्तन ग्लोबल वार्मिंग1 दोहा मुक्तक3 दोहे6 नवगीत15 नारी सशक्तिकरण1 परिवार1 पाँच लिंकों का आनंद स्थापना दिवस1 पारिवारिक कहानी1 पारिवारिक रिश्ते1 पावस पर कविता1 पुस्तक समीक्षा1 प्रकृति2 प्रार्थना3 प्रेणादायक आलेख1 प्रेरक लघुकथा1 प्रेरणादायक कहानी1 प्रेरणादायक हिंदी कविता1 बाल कविता3 भावनात्मक1 भावनात्मक रचना1 मन1 मनहरण घनाक्षरी2 मनहरण घनाक्षरी छंद5 महिला सशक्तिकरण पर प्रेरणादायक कहानी।1 माँ का त्याग1 माँ की ममता1 माता पिता1 मुक्तक3 मुहावरे पर आधारित लघुकथा1 मोबाइल की लत तकनीक डिजिटल जीवन1 रिश्ते2 रोला छंद2 लघु कथा2 लघु कहानी6 लघुकथा19 लेख3 वर्षा ऋतु1 व्यंग कविता1 व्यंग लेख1 शराब की लत1 शिक्षा -परीक्षा1 शुभकामना कविता1 संघर्ष1 संवेदनाएँ1 संस्मरण2 संस्मरणात्मक लेख1 सकारात्मक सोच1 सच्ची घटना1 समीक्षा2 सामाजिक लेख1 साहित्य1 हाइबन1 हायकु3 हास्यव्यंग कविता1 हास्यव्यंग लघुकथाएं1 हिंदी भावनात्मक कहानी1 हिंदी लघुकथा प्रेरक लघुकथा रिश्ते मनमुटाव संवाद जीवन दर्शन1 हिंदी लघुकथा माँ का त्याग प्रेरक लघुकथा प्रेरणादायक कहानी1 हिंदी लेख1 हिंदी साहित्य1 हिन्दी कविता1
ज़्यादा दिखाएं