खडा था वह आँगन के पीछे लम्बे ,सतत प्रयास और अथक, इन्तजार के बाद आयी खुशियाँ । शाखा -शाखा खिल उठी थी, खूबसूरत फूलों से मंद हवा के झोकों के संग, होले-होले जैसे पत्ती-पत्ती खुशियों का, जश्न मनाती धीमी-धीमी हिलती-डुलती, खिलते फूलो संग जैसे मधुर-मधुर सा गीत, गुनगुनाती खुशियाँ ही खुशियाँ थी हर-पल, दिन भी थे हसीन चाँदनी में झूमती, मुस्कुराती टहनी, रातें भी थी रंगीन आते-जाते पंथी भी मुदित होते, खूबसूरत फूलोंं पर कहते "वाह ! खिलो तो ऐसे जैसे , खिला सामने गुलमोहर । विशाल गुलमोहर हर्षित हो प्रसन्न, देखे अपनी खिलती सुन्दर काया, नाज किये था मन ही मन, कितना प्यारा था वह क्षण ! खुशियों की दोपहर अभी ढली नहीं कि - दुख का अंधकार तूफान बनकर ढा गया, बेचारे गुलमोहर पे ! लाख जतन के बाद भी ना बचा पाया अपनी खूबसूरत शाखा, भंयकर तूफान से अधरों की वह मुस्कुराहट अधूरी सी , रह गयी । जब बडी सी शाखा टूटकर जमीं पर , ढह गयी । तब अवसाद ग्रस्त, ठूँठ-सा दिखने लगा वह अपना प्रिय हिस्सा खोकर, फिर हिम्मत रख सम्भाला खुद को नयी- ...