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फ़रवरी, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भीषण गर्मी पर दोहा मुक्तक

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 परिचय आज बढ़ती गर्मी केवल एक मौसमी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रकृति की ओर से दिया गया गंभीर संकेत है। तपती धरती, झुलसते उपवन, व्याकुल जनजीवन और घटते वन हमें सोचने पर विवश करते हैं कि कहीं हम स्वयं ही इस संकट के लिए उत्तरदायी तो नहीं हैं। प्रस्तुत हैं इसी विषय पर चार मुक्तक—                                  व्याकुल सकल जहान है, नभ से बरसे आग। लगता अब रवि को नहीं, धरती से अनुराग । लू की लपटों से हुआ , जन जीवन बेहाल, खग मृग सब बेचैन हैं, झुलसे उपवन बाग । आतप से तपती धरा, तपे कृषक - मजदूर । तानाशाही रवि करे, लू की लपटें क्रूर । गर्म धूल आँखों भरी, पर रुकते नहीं पाँव,     दया करो श्रमजीव पर , तज दो भानु गुरूर ।             क्रोध सूर्य का देखकर, काँप रही है छाँव, गर्म नदी में तैरती, औंधे मुँह की नाव । गुमसुम से बाजार हैं, गली-गली सुनसान,  राग-द्वेष की आग में , जलते देखो गाँव । उमस बढ़ गई और भी , बूँद गिरी दो चार , बिजली भी गुल हो गई, जनजीवन लाच...

"पुष्प और भ्रमर"

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तुम गुनगुनाए तो मैने यूँ समझा प्रथम गीत तुमने मुझे ही सुनाया तुम पास आये तो मैं खिल उठी यूँ अनोखा बसेरा मेरे ही संग बसाया । हमेशा रहोगे तुम साथ मेरे, बसंत अब हमेशा खिला ही रहेगा तुम मुस्कुराये तो मैंं खिलखिलाई ये सूरज सदा यूँ चमकता रहेगा । न आयेगा पतझड़ न आयेगी आँधी, मेरा फूलमन यूँ ही खिलता रहेगा। तुम सुनाते रह़ोगे तराने हमेशा और मुझमें मकरन्द बढता रहेगा। तुम्हें और जाने की फुरसत न होगी मेरा प्यार बस यूँ ही फलता रहेगा ।।            "मगर अफसोस" !!! तुम तो भ्रमर थे मै इक फूल ठहरी वफा कर न पाये ? / था जाना जरूरी ? मैंं पलकें बिछा कर तेरी राह देखूँ                    ये इन्तजार अब यूँ ही चलता रहेगा । मौसम में जब भी समाँ लौट आये मेरा दिल हमेशा तडपता रहेगा कि ये "शुभ मिलन" अब पुनः कब बनेगा                                                      ...

हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते-बिखरते देखा है ;

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जंग लगे/दीमक खाये खोखले से थे वे, कलई / पालिस कर चमका दिये गये नये /मजबूत से दिखने लगे एकदम... ऐसे सामानों को बाजारों में बिकते देखा है। खोखले थे सो टूटना ही था, दोष लाने वालों पर मढ़ दिये गये... शुभ और अशुभ भी हो गयी घड़ियाँ.... मनहूसियत को बहुओं के सर मढ़ते देखा है। हाँ !मैने कुछ रिश्तों को टूटते-बिखरते देखा है। झगड़ते थे बचपन मे भी, खिलौने भी छीन लेते थे एक-दूसरे के.... क्योंकि खिलौने लेने तो पास आयेगा दूसरा, हाँ! "पास आयेगा" ये भाव था प्यार/अपनेपन का.... उन्ही प्यार के भावों में नफरत को भरते देखा है। हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है। वो बचपन था अब बड़े हुए, तब प्यार था अब नफरत है..... छीनने के लिए खिलौने थे, औऱ अब पैतृक सम्पत्ति..... तब सुलह कराने के लिए माँ-बाप थे, अब वकील औऱ न्यायाधीश.... भरी सभा में सच को मजबूरन गूँगा होते देखा है ; या यूँ कह दें-"झूठ के आगे सच को झुकते देखा है"। हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है ।। हो गयी जीत मिल गये हिस्से, खत्म हुए अब कोर्ट के किस्से... ...

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