दुखती रगों को दबाते बहुत हैं — रिश्तों पर ग़ज़ल
परिचय “रिश्तों में अपनापन सुख देता है, लेकिन कभी-कभी अपनों का व्यवहार मन को गहरी ठेस पहुँचा देता है। यह ग़ज़ल ऐसे ही रिश्तों और उन व्यवहारों को स्वर देती है, जहाँ किसी की सफलता से मुँह मोड़ा जाता है, असफलता को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है और तानों से मन आहत किया जाता है।” दुखती रगों को दबाते बहुत हैं, कुछ अपने, दुखों को बढ़ाते बहुत हैं । सुनकर सफलता मुँह फेरते जो, खबर हार की वो फैलाते बहुत हैं । अंधेरों में तन्हा डरा छोड़़ जाते, उजालों में वे साथ आते बहुत हैं । भूखे से बासी भी भोजन छुपाते, मनभर को छक-छक खिलाते बहुत हैं । बनी बात सुनने की फुर्सत नहीं है, बिगड़ी को फिर-फिर दोहराते बहुत हैं । पूछो तो कुछ भी नहीं जानते हैं , भटको तो ताने सुनाते बहुत हैं । बड़े प्यार से अपनी नफरत निभाते, समझते नहीं पर समझाते बहुत हैं । दिखाना है इनको मंज़िल जो पाके, इसी होड़ में कुछ, कमाते बहुत हैं । तानों से इनके आहत ना हों तो, अनजाने ही दृढ़ बनाते बहुत हैं । ✨धन्यवाद🙏 रिश्तों की संवेदनाओं को अभिव्यक्त करती एक और रचना पढ़िए — ● खून के हैं जो रिश्ते बदलते नहीं