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खामोशी जो सब कह गई | अनकही भावनाओं की भावुक हिंदी कहानी

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​प्रस्तावना (Introduction) ​ "शब्दों की एक सीमा होती है, पर संवेदनाएँ असीम हैं।" ​ अक्सर हमें लगता है कि मन की उलझनों को शब्दों के धागे में पिरोकर बाहर निकाल देने से हृदय का बोझ कम हो जाएगा। हम सोचते हैं कि कह देने से मन खाली हो जाएगा। लेकिन क्या वाक़ई ऐसा होता है ?  कभी-कभी शब्द उस गुबार को केवल हवा देते हैं, और पीछे छूट जाती है एक भारी खामोशी । ​यह कहानी है एक ऐसी ही संध्या की, जहाँ डूबते सूरज की लाली और बादलों की विरल परतों के बीच एक स्त्री अपने अंतर्मन की गठरी खोलती है। वह बोलती तो है, पर पाती है कि आँसू फिर भी थम नहीं रहे। यह रचना 'कह देने' और 'महसूस करने' के बीच के उस सूक्ष्म अंतर को उकेरती है, जहाँ अंततः उसे समझ आता है कि पूर्णता शब्दों में नहीं, बल्कि स्वयं की खामोशी और वर्तमान स्थिति को स्वीकार करने में है । संध्या की धुंधलाती बेला वह छत के कोने में खामोश खड़ी थी। उसकी निगाहें दूर क्षितिज में कहीं खोई हुई थीं, मानो अपनी उमड़ती भावनाओं का कोई सिरा खोज रही हो। आकाश पर बादलों की विरल परतें, दिनभर के अनकहे भावों को समेटे धीरे-धीरे तैर रही थीं। डूबते सूरज...

पुनर्जन्म

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  इस कहानी में पुनर्जन्म का मतलब किसी जीवात्मा का नया शरीर धारण कर पुनः जन्म लेने से नहीं अपितु सुप्त भाव संवेदनाओं का मन में पुनः जागृत होने से है । पूरे पन्द्रह दिन बाद जब भुविका ननिहाल से लौटी तो  माँ (अनुमेधा) उसे बड़े प्यार से गले लगाकर उलाहना देते हुए बोली,  "उतर गया तेरा गुस्सा ? नकचढ़ी कहीं की ! इत्ते दिनों से नानी के पास बैठी है, अब कुछ ही दिनों में जॉब के लिए चली जायेगी, माँ का तो ख्याल ही नहीं है ! है न" ! माँ से अलग होते हुए भुविका अनमने से मुस्कुरायी और फिर बड़े से बैग को घसीटते हुए अपने कमरे तक ले गयी । "अरे ! इतने बड़े थैले में ये क्या भरकर दिया है तेरी नानी ने" ? अनुमेधा हैरानी से पूछते हुए उसके पीछे-पीछे आयी तो भुविका बैग की चेन खोलते हुए बोली, "आप खुद ही देख लीजिए " ! वह बड़ी उत्सुकता से बैग के अन्दर झाँकने लगी, तभी भुविका ने कुछ मेडल, सम्मानपत्र और तस्वीरें निकालकर वहीं बैड पर फैला दिये । "हैं !....ये क्या है...?  ये....  ये सब यहाँ क्यों ले आई भुवि" ?  हैरानी से आँखें बड़ी कर अनुमेधा ने पूछा तो भुविका बोली , " माँ ! ये सब आपके...

ज़िन्दगी ! समझा तुझे तो मुस्कराना आ गया

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दुपहरी बेरंग बीती सांझ हर रंग भा गया । ज़िन्दगी ! समझा तुझे तो मुस्कुराना आ गया । अजब तेरे नियम देखे,गजब तेरे कायदे । रोते रोते समझ आये,अब हँसी के फ़ायदे । भीगी पलकों संग लब को खिलखिलाना आ गया ।  ज़िन्दगी ! समझा तुझे तो मुस्कुराना आ गया । क्यों कहें संघर्ष तुझको, ये तो तेरा सिलसिला । नियति निर्धारित सभी , फिर क्या करें तुझसे गिला ।  सत्य को स्वीकार कर जीना जिलाना आ गया ।  ज़िन्दगी !  समझा तुझे तो मुस्कुराना आ गया । हो पूनम की रात सुन्दर या तिमिर घनघोर हो । राहें हों कितनी अलक्षित, आँधियाँ चहुँ ओर हो । हर हाल में मेरे 'साँवरे' तेरे गुण गुनाना आ गया । ज़िन्दगी ! समझा तुझे तो मुस्कराना आ गया । पढिए  ऐसे ही जिंदगी से जुड़ी एक और रचना ■  चल जिंदगी तुझको चलना ही होगा

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