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बेरोजगारी : "एक अभिशाप"

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   नवयुवा अपने देश के,     पढे-लिखे ,डिग्रीधारी     सक्षम,समृद्ध, सुशिक्षित      झेल रहे बेरोजगारी।                                                            कर्ज ले,प्राप्त की उच्च शिक्षा,                                अब सेठजी के ताने सुनते।                                परेशान ये मानसिक तनाव से,                                 आत्महत्या के रास्ते ढूँढते।      माँ,बहनों के दु:ख जो सह न सके,  वे अभागे गरीबी मिटाने के वास्ते, परचून की दुकान पर मिर्ची तोलते। तो कुछ सैल्समैन बन गली-गली डोलते।     ...

नारी अबला नहीं | नारी सशक्तिकरण पर कविता

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परिचय सदियों से नारी को अनेक सामाजिक रूढ़ियों, कुप्रथाओं और भेदभाव का सामना करना पड़ा है। उसे कमजोर और पराश्रित मानने वाली सोच ने उसके आत्मसम्मान और अस्तित्व को भी प्रभावित किया। प्रस्तुत कविता इसी मानसिकता के विरुद्ध नारी को अपनी शक्ति पहचानने, आत्मनिर्भर बनने और अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जागृत होने का आह्वान करती है। आभूषण रूपी बेड़ियाँ पहनकर, अपमान, प्रताड़ना का दंड, सहना नियति मान लिया। अबला बनकर निर्भर रहकर, जीना है यह जान लिया। सदियों से हो रहा ये शोषण, अब विनाश तक पहुँच गया। नर-पिशाच का फैला तोरण, पूरे समाज तक पहुँच गया।। अब वक्त आ गया अस्तित्व बचाने का, अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, कुप्रथाओं से हो रहे विनाश को हरने का। हाँ! वक्त आ गया अब पुनः शक्ति-रूप धारण करने का। त्याग दो ये बेड़ियाँ तुम, लौह-तन अपना बना दो! थरथराएँ अब ये दानव, शक्तियाँ अपनी जगा दो! लो हिसाब हर शोषण का, उखाड़ फेंको अब ये तोरण! याद आ जाए सभी को, रानी लक्ष्मीबाई का युद्ध-भीषण। उठो नारी! आत्मजागृति लाकर, आत्मशक्तियाँ तुम बढ़ाओ! आत्मरक्षक स्वयं बनकर, निर्भय निज जीवन बनाओ! शक्ति अपनी तुम जगाओ!    ...

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