अक्टूबर के अनाहूत अभ्र | शरद ऋतु की प्रतीक्षा पर प्रकृति कविता

 परिचय

अक्टूबर का महीना सामान्यतः शरद ऋतु के आगमन का संकेत देता है, जब आकाश निर्मल होने लगता है और शरद पूर्णिमा की उज्ज्वल चाँदनी धरती को आलोकित करती है। किंतु कभी-कभी अनचाहे बादल इस सौंदर्य में व्यवधान बन जाते हैं। प्रस्तुत कविता 'अक्टूबर के अनाहूत अभ्र' उन्हीं अनाहूत मेघों से संवाद है, जो शरद के स्वागत में विलंब कर रहे हैं। प्रकृति के मानवीकरण के माध्यम से यह कविता शरद की शांत, धवल और सौम्य छवि का सुंदर चित्र प्रस्तुत करती है।



अक्टूबर के अनाहूत बादलों के बीच शरद ऋतु के निर्मल आकाश और धवल चंद्रमा का मनोहारी दृश्य।





हे अक्टूबर के अनाहूत अभ्र !

 ये अल्हड़ आवारगी क्यों ?

प्रौढ़ पावस की छोड़ वयस्कता 

चिंघाड़ों सी गरजन क्यों ?


गरिमा भूल रहे क्यों अपनी,

डाले आसमान में डेरा ।

राह शरद की रोके बैठे,

जैसे सिंहासन बस तेरा ।


शरद प्रतीक्षारत देहलीज पे

धरणी लज्जित हो बोली,

झटपट बरसों बचा-खुचा सब

अब खाली कर दो झोली !


शरदचन्द्र पे लगे खोट से

चन्द्रप्रभा का कर विलोप

अति करते क्यों ऐसे जलधर !

झेल सकोगे शरद प्रकोप ?


जाओ अब आसमां छोड़ो !

निरभ्र शरद आने दो!

शरदचंद्र की धवल ज्योत्सना

 धरती को अब पाने दो !


निष्कर्ष

प्रकृति का प्रत्येक परिवर्तन अपने साथ एक नया संदेश लेकर आता है। 'अक्टूबर के अनाहूत अभ्र' केवल अनचाहे बादलों से संवाद नहीं, बल्कि समय, संतुलन और प्रकृति के शाश्वत क्रम का भी स्मरण कराती है। अंततः हर मेघ को हटना ही पड़ता है, ताकि शरद का निर्मल आकाश, धवल चाँदनी और शांत सौंदर्य अपनी पूर्ण गरिमा के साथ धरती को आलोकित कर सके। यही आशा, यही प्रतीक्षा और यही प्रकृति का सनातन सत्य इस कविता का मूल भाव है।



सादर अभिनंदन 🙏🙏

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टिप्पणियाँ

  1. आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 11 अक्तूबर 2022 को साझा की गयी है....
    पाँच लिंकों का आनन्द पर
    आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आ.यशोदा जी मेरी रचना पाँच लिंको के आनंद मंच चयन करने हेतु।

      हटाएं
  2. शरद पूर्णिमा का धवल चन्द्रमा घटाओं की ओट में रहा कल …ऐसे मे अभ्र से शिकायत तो बनती है । बहुत सुन्दर सृजन ।

    जवाब देंहटाएं
  3. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (11-10-22} को "डाकिया डाक लाया"(चर्चा अंक-4578) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    ------------
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार कामिनी जी ! मेरी रचना को चर्चा मंच पर साझा करने हेतु।

      हटाएं
  4. आपकी फटकार से बादल तो छँट गए लेकिन अब शरद पूर्णिमा का चाँद कहाँ देखें 😄😄
    बहुत सुंदर सृजन ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. शरद पूर्णिमा का चाँद तो लुकाछिपी में गया । पर अब करवाचौथ का भी ना दिखा तो कहीं सब भूख प्यास हड़ताल ना बैठ जायें इसलिए एक फटकार आप भी लगा ही दीजिए, मेरी नहीं तो क्या पता की ही सुन ले ये..हैं न 😁😃
      सादर आभार एवं धन्यवाद आपका🙏🙏

      हटाएं
  5. बहुत ही सुंदर रचना, सुधा दी।

    जवाब देंहटाएं
  6. सरकते सरकते ऋतु जून में शीतल हो जाए

    सुन्दर रचना

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. जी, हालात देखकर सच में ऐसा लग रहा है।
      हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार आपका ।

      हटाएं
  7. निर्मेघ नभ पर शरद पूर्णिमा के चाँद की आलोकिक आभा जो वैभव लिए विचरती है उस को मेघों ने अपने आगोश में लेकर धूसरित कर दिया।
    वाह! सुधा जी बहुत ही सुंदर अभिनव प्रस्तुति उलाहना और फटकार दोनों काव्यात्मक लय में , बहुत सुंदर सृजन, काव्यागत सौंदर्य के साथ।
    करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनाएं 🌷🌷🌷

    जवाब देंहटाएं
  8. गोपेश मोहन जैसवाल13 अक्टूबर 2022 को 6:11 pm बजे

    सुधा जी, धरती में व्याप्त अनाचार और अव्यवस्था का प्रभाव अब आकाश पर भी पड़ने लगा है.
    सब ओर गड़बड़ झाला है.
    बेमौसम बरसात हो रही है फिर शरद ऋतु में प्रचंड गर्मी पड़ेगी और वैशाख-जेठ में रजाइयां ओढ़नी पड़ेंगी.

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. जी, आ. सर ! सही कहा आपने.. मौसम का ये परिवर्तित रूप ऐसा सोचने को विवश कर रहा है...सादर आभार एवं धन्यवाद आपका ।

      हटाएं
  9. बहुत सुंदर रचना,
    शरद प्रतीक्षारत देहलीज पे
    धरणी लज्जित हो बोली,
    अब लाज कहां है इसीलिए तो प्रकृति को भी ठीक व्यवहार न रहा। हमें भी वैसा ही वापस मिल रहा है।

    जवाब देंहटाएं
  10. अच्छी जानकारी !! आपकी अगली पोस्ट का इंतजार नहीं कर सकता!
    greetings from malaysia
    let's be friend

    जवाब देंहटाएं

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