संदेश

अगस्त, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

परित्यक्ता नहीं..परित्यक्त | पति की बेवफाई और सास ससुर का साथ - हिन्दी कहानी

चित्र
परिचय क्या एक पत्नी सिर्फ इसलिए सब कुछ सहती रहे क्योंकि उसके पास मायके से विदा लेने बाद जाने के लिए कोई और ठिकाना नहीं है ? क्या प्रेम विवाह करने वाली स्त्री अपने ही रिश्तों में सबसे अधिक अकेली हो जाती है ? यह कहानी है सना की जिसे पति की बेवफाई ने तोड़ने की कोशिश की लेकिन उसके सास ससुर ने उसे परित्यक्ता नहीं बल्कि सम्मानित बेटी बनाकर दुनिया के सामने एक मिसाल कायम कर दी पढ़िए रिश्तों विश्वासघात और स्वाभिमान की हृदयस्पर्शी हिंदी कहानी दिल्ली की हल्की ठंडी सुबह थी। खिड़की से छनकर आती धूप ड्रॉइंग रूम के फर्श पर सुनहरी चादर बिछा रही थी, लेकिन सना के मन में जैसे धूप का एक कतरा भी नहीं बचा था। पिछले कुछ महीनों से वह प्रतीक के व्यवहार में बदलाव साफ महसूस कर रही थी। देर रात तक मोबाइल पर मुस्कुराकर बातें करना, उसके आते ही स्क्रीन लॉक कर देना, छोटी-छोटी बातों पर झल्ला उठना—सब कुछ बदलता जा रहा था। "प्रतीक! आज बच्चों के स्कूल में पेरेंट्स-टीचर्स मीटिंग है... तुम भी चलोगे?" सना ने धीमे स्वर में पूछा। प्रतीक ने मोबाइल से नजर उठाए बिना कहा— "मुझसे क्यों पूछ रही हो? अपने काम खुद नहीं कर ...

गृहस्थ प्रेम

चित्र
तुम साथ होते हो तो न जाने कितनी कपोल-कल्पनाएं  उमड़ती-घुमड़ती हैं अंतस में... और मैं तड़पती हूँ एकान्त के लिए कि झाँँक सकूँ एक नजर अपनी कल्पनाओं के खूबसूरत संसार में। तुम्हारी नजरों से बचते-बचाते छुप-छुपके झाँक ही लेती हूँ और देखने लगती हूँ कोई खूबसूरत सपना पर तभी तुम टोक देते हो कि "कहाँ खो गई" !!! फिर क्या.....तुमसे छुपाये नहीं छुपा पाती अपनी खूबसूरत कल्पनाओं के  अधूरे से सपने को। और फिर सुनते ही तुम निकल पड़ते हो  बिना कुछ कहे ,   जैसे रूठे से मैं असमंजस में सोचती रह जाती हूँ  कि मैंने किया क्या? बस सपना ही तो देखा था, अधूरा सा। तुम्हारे जाने के बाद समय है एकांत भी ! पर न जाने क्यों कोई सपना नजर नहीं आता नहीं उमड़ती अंतस में वैसी कल्पनाएं सब सूना सा हो जाता है तब वर्तमान में हकीकत के साथ जीती हूँ मैं ठीक तुम्हारी तरह हमारे हकीकत के घर-संसार की पहरेदार बनकर तुम्हारे इंतजार में तुम्हारी यादों के साथ ! और फिर एक दिन खत्म होता है ये यादों का सिलसिला और पल-पल का इंतजार तुम्हारे आने के साथ ! ह...

भावनाओं के प्रसव की उपज है कविता....

चित्र
आज मन में ख्याल आया रचूँ मैं भी इक कविता मन को बहुत अटकाया इधर-उधर दौड़ाया कुछ पल की सैर करके ये खाली ही लौट आया डायरी रह गयी यूँ कोरी कल्पना रही अधूरी मैने भी जिद्द थी ठानी है कविता मुझे बनानी जा ! उड़ मन परी लोक में ला ! परियों की कोई कहानी मैं उसमें से कुछ चुन लूँ फिर कागज पे कलम से बुन लूँ बन जाये कोई कविता जो मन को लगे सुहानी फुर उड़ चला ये गगन में लौटा फिर इसी चमन में पर ना साथ कुछ भी लाया मैने फिर इसे भगाया जा ! सागर बड़ा सुहाना सुन्दर हो कोई मुहाना ! कहीं सीपी मचल रही हो बूँद मोती में ढल रही हो ! जा ! वहीं से कुछ ढूंढ लाना रे ! मन खाली न आना ! पर ये खाली ही आया इसे वहां भी कुछ न भाया मैं तब भी ना हार मानी मुझे कविता जो थी बनानी इस मन को फिर समझाया देख ! सावन कहीं हो आया रिमझिम फुहारें बरस रहीं हो धरा महकी बहकी सी हो कोई नवेली सज रही हो हाथ मेंहदी रच रही हो हौले उसके पास जाना प्रीत थोड़ी ले के आना मैं उसी से प्रीत चुन लूँ फिर कागज पे कलम से बुन लूँ बने कविता या फिर कहानी जो मन को लगे सुहानी मेरी जिद्द पे मन उकताया झट अन्तर में जा समाया...

फ़ॉलोअर