संदेश

अक्टूबर, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भीषण गर्मी पर दोहा मुक्तक

चित्र
 परिचय आज बढ़ती गर्मी केवल एक मौसमी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रकृति की ओर से दिया गया गंभीर संकेत है। तपती धरती, झुलसते उपवन, व्याकुल जनजीवन और घटते वन हमें सोचने पर विवश करते हैं कि कहीं हम स्वयं ही इस संकट के लिए उत्तरदायी तो नहीं हैं। प्रस्तुत हैं इसी विषय पर चार मुक्तक—                                  व्याकुल सकल जहान है, नभ से बरसे आग। लगता अब रवि को नहीं, धरती से अनुराग । लू की लपटों से हुआ , जन जीवन बेहाल, खग मृग सब बेचैन हैं, झुलसे उपवन बाग । आतप से तपती धरा, तपे कृषक - मजदूर । तानाशाही रवि करे, लू की लपटें क्रूर । गर्म धूल आँखों भरी, पर रुकते नहीं पाँव,     दया करो श्रमजीव पर , तज दो भानु गुरूर ।             क्रोध सूर्य का देखकर, काँप रही है छाँव, गर्म नदी में तैरती, औंधे मुँह की नाव । गुमसुम से बाजार हैं, गली-गली सुनसान,  राग-द्वेष की आग में , जलते देखो गाँव । उमस बढ़ गई और भी , बूँद गिरी दो चार , बिजली भी गुल हो गई, जनजीवन लाच...

माटी मेरे गाँव की : भावुक गढ़वाली गीत | पहाड़ की यादें

चित्र
क्या आपको भी अपने गाँव की मिट्टी की खुशबू और बचपन की यादें बार-बार अपनी ओर खींचती हैं ? प्रस्तुत है एक भावपूर्ण गढ़वाली गीत “ माटी मेरे गाँव की” , जिसमें पहाड़ की बदलती तस्वीर, पुरानी यादें और गाँव का स्नेहिल अपनापन झलकता है। यह गीत उन प्रवासियों को रैबार (संदेश) देकर पुकारता है, जो रोज़गार या परिस्थितियों के कारण गाँव छोड़कर दूर बस गए और फिर लौट नहीं पाए। साथ ही, यह गाँव की उन बेटियों को भी स्नेह से याद करता है, जो ससुराल और शहर की व्यस्तताओं में अपने मायके—अपने गाँव—तक अब कम ही पहुँच पाती हैं। छ्वाया फूटे सौण - भादों , धार नदियों संग आई  माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी बोली मुझसे खुद लगीं बा  हो सके तो गाँव आ जा बीसीयों बीते मिले आ अब तो ये सूरत दिखा जा मटण्या पाणी, सौंधी खुशबू समलौण्या दुलार लायी माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी वो पहाड़ी धार वाली बोली द्या अब ना गिरेगी बाट चौड़े पक्के वाले  माट में अब ना सनेगी गाड़ी मोटर पों-पों करती अब तो हर इक ख्वाल आयी माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी म्याल ना लिपने पड़ेंगे चमचमाती फर्श बोली कूड़ी में लेंटर पड़...

फ़ॉलोअर