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मोबाइल फोन: सुविधा या लत? | मोबाइल के फायदे और नुकसान | हिंदी लेख

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 परिचय आधुनिक युग में विज्ञान का एक अद्भुत और महत्त्वपूर्ण उपहार मोबाइल फोन है। सुबह आँख खुलने से लेकर रात को विश्राम करने तक यह हमारे जीवन का लगभग अभिन्न साथी बन चुका है। जहाँ एक ओर इसने हमारे अनेक कार्यों को सरल बनाया है, वहीं दूसरी ओर इसका अत्यधिक उपयोग कई नई समस्याओं का कारण भी बन रहा है। प्रस्तुत लेख में मोबाइल फोन की उपयोगिता के साथ-साथ इसकी लत से होने वाले दुष्प्रभावों पर चर्चा की गई है।                                आज मोबाइल फोन ने पूरी दुनिया को मानो हमारी मुट्ठी में समेट दिया है। कुछ दशक पहले जिन कार्यों के लिए घंटों या कई दिनों का समय लगता था, वे आज कुछ ही क्षणों में पूरे हो जाते हैं। यह एक ऐसी तकनीकी सुविधा है जिसने मनुष्य के जीवन को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सरल और सुविधाजनक बना दिया है। किसी से तुरंत संपर्क करना हो, पढ़ाई करनी हो, बैंकिंग का कार्य हो या मनोरंजन—अनेक कार्य अब एक ही मोबाइल फोन से सहजता से पूरे हो जाते हैं। यही कारण है कि आज यह बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर आयु वर...

माटी मेरे गाँव की : भावुक गढ़वाली गीत | पहाड़ की यादें

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क्या आपको भी अपने गाँव की मिट्टी की खुशबू और बचपन की यादें बार-बार अपनी ओर खींचती हैं ? प्रस्तुत है एक भावपूर्ण गढ़वाली गीत “ माटी मेरे गाँव की” , जिसमें पहाड़ की बदलती तस्वीर, पुरानी यादें और गाँव का स्नेहिल अपनापन झलकता है। यह गीत उन प्रवासियों को रैबार (संदेश) देकर पुकारता है, जो रोज़गार या परिस्थितियों के कारण गाँव छोड़कर दूर बस गए और फिर लौट नहीं पाए। साथ ही, यह गाँव की उन बेटियों को भी स्नेह से याद करता है, जो ससुराल और शहर की व्यस्तताओं में अपने मायके—अपने गाँव—तक अब कम ही पहुँच पाती हैं। छ्वाया फूटे सौण - भादों , धार नदियों संग आई  माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी बोली मुझसे खुद लगीं बा  हो सके तो गाँव आ जा बीसीयों बीते मिले आ अब तो ये सूरत दिखा जा मटण्या पाणी, सौंधी खुशबू समलौण्या दुलार लायी माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी वो पहाड़ी धार वाली बोली द्या अब ना गिरेगी बाट चौड़े पक्के वाले  माट में अब ना सनेगी गाड़ी मोटर पों-पों करती अब तो हर इक ख्वाल आयी माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी म्याल ना लिपने पड़ेंगे चमचमाती फर्श बोली कूड़ी में लेंटर पड़...

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