सोसायटी में कोरोना की दस्तक — कोरोना काल की एक और व्यंग्यात्मक लघुकथा
परिचय
कोरोना काल में संक्रमण से बचाव के लिए सावधानी और नियमों का पालन बेहद जरूरी था। लेकिन कई बार संकट की घड़ी में भी मनुष्य अपनी सुविधा और स्वार्थ को प्राथमिकता देने लगता है। प्रस्तुत व्यंग्यात्मक लघुकथा इसी मानसिकता पर हल्के-फुल्के अंदाज में कटाक्ष करती है।
सोसायटी में कोरोना की दस्तक
“माफ कीजिएगा, इंस्पेक्टर साहब! आपसे एक रिक्वेस्ट है। कृपया सोसायटी का गेट बंद मत कीजिए। और यह नोटिस भी गेट के बाहर चिपकाने की क्या जरूरत है? आप इसे हमें दे दीजिए। हम सोसायटी के सभी लोगों को इसकी जानकारी दे देंगे। इसे सोसायटी ऑफिस के बाहर लगा देंगे, वहाँ सभी की नजर पड़ जाएगी। आप बेफिक्र रहिए।”
सोसायटी के प्रधान राकेश चौहान की बात सुनकर इंस्पेक्टर साहब बोले, “चौहान जी, मुझे यह समझ में नहीं आ रहा कि आप गेट को सील क्यों नहीं करने देना चाहते। आपकी सोसायटी में इसके अलावा दो गेट और हैं। इस गेट के पास वाले अपार्टमेंट में कोरोना पॉजिटिव मरीज मिला है। ऐसे में सबकी सुरक्षा को देखते हुए इस गेट का बंद होना जरूरी है। आपको इसमें क्या परेशानी है?”
“परेशानी तो कुछ नहीं, सर! बस सोच रहे थे कि यह गेट हम ही अंदर से लॉक कर देंगे। सोसायटी के सभी लोगों को बता भी देंगे, फिर कोई इधर से आएगा-जाएगा नहीं। वो क्या है न, सर! अगर आप गेट सील करेंगे तो लोगों के मन में इस बीमारी को लेकर भय बैठ जाएगा। और आप तो जानते ही हैं, भय से रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो सकती है, है न सर!”
“ठीक है, चौहान जी। आप इस गेट को कुछ दिन के लिए बंद कर दीजिए और सोसायटी में सोशल डिस्टेंसिंग तथा अन्य नियमों का पालन जरूर होना चाहिए।”
इतनी सख्त हिदायत देकर इंस्पेक्टर साहब अपनी टीम के साथ चले गए।
तब पास खड़े शर्मा जी बोले, “वैसे चौहान जी, हम समझे नहीं। आप काहे उस पुलिस वाले को गेट बंद नहीं करने दिए?”
“अजी शर्मा जी! वो क्या है न, आप भी बड़े भोले हैं। अच्छा, आप ही बताइए, ये कौन-सा महीना चल रहा है?” कहते हुए चौहान जी सोसायटी ऑफिस में जाकर कुर्सी पर पसर गए।
शर्मा जी बोले, “सावन है जी, पर इसमें क्या?”
“आप देखे न, शर्मा जी! हमारे तीसरे गेट के पास बने मंदिर में आजकल श्रद्धालुओं का कैसा ताँता लगा है! जब सबको पता चलेगा कि हमारी सोसायटी में भी ये कमबख्त कोरोना दस्तक दे चुका है, तो बाहर के लोग हमारी सोसायटी के मंदिर में क्यों आएँगे? अब तो समझ ही गए होंगे आप?”
चौहान जी अपनी भौहें नचाते हुए मुस्कराए।
“ओह! अब समझे, चौहान जी। बात तो पक्की है। मंदिर में लोग नहीं आएँगे तो चढ़ावा भी नहीं आएगा। पहले ही लॉकडाउन में मंदिर बंद रहे। अब जब खुले हैं तो…! वैसे भी अब कोनों काम ठप्प नहीं, तो मंदिर ही क्यों! है न?”
बगल में कुर्सी खिसकाकर बैठते हुए शर्मा जी बोले।
और दोनों के ठहाकों से सिक्योरिटी ऑफिस गूँज उठा।
निष्कर्ष
संकट की घड़ी में सुरक्षा और सावधानी सबसे जरूरी होती है, लेकिन स्वार्थ सामने आते ही इंसान उन्हीं नियमों का अपने हित के अनुसार अर्थ निकालने लगता है। कोरोना काल जैसी कठिन परिस्थिति में भी मंदिर के चढ़ावे की चिंता करना इसी स्वार्थपूर्ण सोच को उजागर करता है।
✨धन्यवाद🙏
कोरोना काल की अन्य लघुकथाएं --
● फर्क
● बेबसी : कोरोना काल की एक लघुकथा

सुधा दी, कोरोना अपनी जगह है। लेकिन इस महामारी में भी लोग अपनी अपनी रोटियां सेंक रहे है। कड़वी सच्चाई व्यक्त करती रचना।
जवाब देंहटाएंजी, ज्योति जी!कड़वी सच्चाई ही है यह
हटाएंहार्दिक धन्यवाद एवं आभार आपका।
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 16 सितंबर 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार पम्मी जी मेरी रचना को पाँच लिंकों का आनंद पर साझा करने हेतु।
हटाएंबहुत सुन्दर सृजन सुधा जी ! सही कहा ज्योति जी ने-कोरोना महामारी जैसी आपदा में भी लोग कपनी ही रोटियाँ सेंकने में लगे हैं । स्वार्थपरता को दर्शाता सुन्दर सृजन ।
जवाब देंहटाएंजी, मीना जी! तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार आपका...।
हटाएंपरिस्थितियों को व्यक्त करती सुंदर रचना ....
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद एवं आभार रिशभ जी!
हटाएंब्लॉग पर आपका स्वागत है।
सामयिक रचना।
जवाब देंहटाएंअत्यंत आभार एवं धन्यवाद आदरणीय।
हटाएंयथार्थ चित्रण
जवाब देंहटाएंअत्यंत आभार एवं धन्यवाद राकेश जी !
हटाएंविचारोत्तेजक रचना
जवाब देंहटाएंसाधुवाद 🙏
हार्दिक आभार एवं धन्यवाद आ.वर्षा जी!
हटाएंनमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार 21 सितंबर 2020) को 'दीन-ईमान के चोंचले मत करो' (चर्चा अंक-3831) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
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-रवीन्द्र सिंह यादव
हार्दिक धन्यवाद आ.रविन्द्र जी मेरी रचना को चर्चा मंच पर साझा करने हेतु...।
हटाएंसादर आभार।
सारगर्भित, चिंतन-मनन योग्य इस रचना के लिए हार्दिक बधाई सुधा जी !!!
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद डॉ.शरद जी!
हटाएंब्लॉग पर आपका स्वागत है।
बहुत सुन्दर सृजन
जवाब देंहटाएंबढ़िया :)
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद एवं आभार आ.जोशी जी!
हटाएंऐसी मानसिकता का परिणाम विश्व भुगत रहा है । आभार ।
जवाब देंहटाएंसही कहा आपने अमृता जी!बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार आपका उत्साहवर्धन हेतु...।
हटाएंब्लॉग पर आपका स्वागत है।
ओह !!!! इस संकटकाल में भी कुटिलता ? आश्चर्य होता है इसी सोच वालों पर | पर ये बहुत जगह का कडवा सच है | सार्थक लघुकथा सुधा जी | हार्दिक शुभकामनाएं | |
जवाब देंहटाएंजी सखी! कड़वा है पर सच है...
हटाएंउत्साहवर्धन हेतु अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आपका।
बहुत अच्छी पोस्ट |आपका हार्दिक आभार
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद आदरणीय!
हटाएंसादर आभार।
बहुत सुंदर रचना । बधाई
जवाब देंहटाएंअत्यंत आभार एवं धन्यवाद, आदरणीय!
हटाएंब्लॉग पर आपका स्वागत है।