पुनर्जन्म – एक स्त्री के स्वाभिमान और आत्मविश्वास की प्रेरणादायक हिंदी कहानी

परिचय

कभी-कभी जीवन में पुनर्जन्म का अर्थ नया जीवन पाना नहीं, बल्कि अपने भीतर खो चुके आत्मविश्वास, स्वाभिमान और व्यक्तित्व को फिर से पहचान लेना होता है। “पुनर्जन्म” ऐसी ही एक भावनात्मक हिंदी कहानी है, जो यह एहसास कराती है कि सहनशीलता एक गुण है, लेकिन आत्मसम्मान की कीमत पर नहीं ।
 



पुनर्जन्म हिंदी कहानी में आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को फिर से पाने वाली माँ और बेटी





पूरे पंद्रह दिन बाद जब भुविका ननिहाल से लौटी तो माँ (अनुमेधा) उसे बड़े प्यार से गले लगाकर उलाहना देते हुए बोली, “उतर गया तेरा गुस्सा? नकचढ़ी कहीं की! इतने दिनों से नानी के पास बैठी है, अब कुछ ही दिनों में जॉब के लिए चली जाएगी, माँ का तो ख्याल ही नहीं है! है न?”

माँ से अलग होते हुए भुविका अनमने-से मुस्कुराई और फिर बड़े से बैग को घसीटते हुए अपने कमरे तक ले गई।

“अरे! इतने बड़े थैले में ये क्या भरकर दिया है तेरी नानी ने?” अनुमेधा हैरानी से पूछते हुए उसके पीछे-पीछे आई तो भुविका बैग की चेन खोलते हुए बोली, “आप खुद ही देख लीजिए।”

वह बड़ी उत्सुकता से बैग के अंदर झाँकने लगी, तभी भुविका ने कुछ मेडल, सम्मानपत्र और तस्वीरें निकालकर वहीं बेड पर फैला दिए।

“हैं! ये क्या है...? ये... ये सब यहाँ क्यों ले आई भुवि?” हैरानी से आँखें बड़ी कर अनुमेधा ने पूछा तो भुविका बोली, “माँ! ये सब आपके हैं न? ये सभी मेडल वगैरह... सब आपको मिले हैं न? और ये आपकी पुरानी तस्वीरें!” तस्वीर उठाकर दिखाते हुए वह बोली, “ये... ये आप ही हैं न, माँ?”

“हाँ! तो...? ये सब बहुत पुराने हैं भुवि! अब इनका यहाँ क्या काम?” फटाफट सबको समेटते हुए वह बोली, “बेटा! ये सब यहाँ नहीं लाने चाहिए थे तुझे!” फिर अपना माथा पकड़कर बुदबुदाई, “और ये माँ भी न! नानी ने मना नहीं किया तुझे? क्यों लाई इन्हें?”

सबको खींचकर जल्दी-जल्दी वापस बैग में डालते हुए माँ झुंझलाई तो भुविका माँ को रोकते हुए बोली, “माँ!... माँ! रहने दो न! शांत हो जाओ! छोड़ो सब! आओ न यहाँ, आराम से बैठो!”

हाथ पकड़कर बेड पर बिठाते हुए वह बोली, “माँ! जानते हो वहाँ सब मुझे क्या कह रहे थे? कह रहे थे कि मैं बिल्कुल आप पर गई हूँ। 

आप भी पहले ऐसी ही थीं, बहुत बुद्धिमान, होशियार और तेज-तर्रार! फिर अब क्या हो गया आपको? क्यों इतनी सीधी और भोली बनी फिरती हैं? देखते नहीं, परिवार में सब आपके भोलेपन और अच्छाई का कैसे फायदा उठाते हैं! माँ! इतना अच्छा होना भी न, अच्छा नहीं होता आजकल। देखो न, कोई भी कुछ भी कह जाता है आपसे... बड़े तो बड़े, अब छोटे भी!... और पापा! कम से कम उन्हें तो आपका पक्ष लेना चाहिए न! वे तो और भी महान हैं, जब चाहें छोटी-सी बात पर भी सबके सामने आपको झिड़कते रहते हैं और उस दिन तो हाथ भी...!”

“श्श्श...! कुछ ज्यादा ही सोच रही है तू! अरे! इतना तो चलता है घर-परिवार में। हाँ, थोड़े-से गुस्से वाले हैं तेरे पापा! पर मैं ये सब संभाल लेती हूँ।” कहते हुए वह उठने लगी तो भुविका ने बाँह पकड़कर रोक दिया और आँखों में आँखें डालकर बोली, “माँ! संभाल नहीं रही आप, झेल रही हैं उनके दुर्व्यवहार को! और ये बहुत गलत बात है माँ!”

“नहीं बेटा! ऐसा नहीं है। फिर घर-गृहस्थी में ये छोटी-छोटी बातें तो होती ही रहती हैं। अरे! मेरे थोड़ा-सा सह लेने से घर में सुख-शांति बनी रहती है तो ठीक ही है न?” समझाने की कोशिश करते हुए माँ ने कहा।

“कौन-सी सुख-शांति माँ? और आपके मन की सुख-शांति का क्या? आपके आत्मसम्मान का क्या? छुप-छुपकर बहाए आपके इन आँसुओं का कोई मोल नहीं? ये घर-गृहस्थी और इसकी सुख-शांति का ठेका क्या आपने अकेले ले रखा है? और किसी को तो इसकी कोई परवाह ही नहीं!”

बेटी को आक्रोशित देख माँ उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, “नहीं बच्चे! गुस्सा नहीं करते! देख! सबका अपना-अपना स्वभाव है। बस, जो जैसा है उसे वैसे ही स्वीकार कर लेना चाहिए और जितना हो सके शांत रहकर परिवार निभाते रहें तो धीरे-धीरे सब ठीक हो ही जाता है। इतना मत सोच! चल, मैं तेरे लिए कुछ खाने को लाती हूँ, तब तक तू हाथ-मुँह धो ले!”

“सही कहा माँ आपने कि सबका अपना-अपना स्वभाव होता है, तो फिर कहाँ गया आपका मेरे जैसा तेज-तर्रार स्वभाव? लगता है आपके उस स्वभाव को तो यहाँ किसी ने स्वीकार नहीं किया और आपको अपना स्वभाव बदलना पड़ा... है न! फिर बन गई आप वैसी ही, जैसा यहाँ सबको चाहिए था। सीधी-सादी गाय-सी... और फिर बहाती रही आजीवन आँसू! वह भी छुप-छुपकर, ताकि यहाँ की सुख-शांति में खलल न पड़े। है न माँ!” मुँह घुमाते हुए व्यंग्यपूर्ण लहजे में कहा उसने।

“हे भगवान! ये लड़की भी न! अरे! तू अभी तक वहीं अटकी है! मुझे लगा इतने दिन नानी के पास रहकर तू सब भूल-भाल गई होगी। अरे! जीवन में ये सब तो चलता ही रहता है। इन छोटी-छोटी बातों में अटकी रही तो आगे कैसे बढ़ेगी! चल, छोड़ इन सब बातों को और कुछ खा-पीकर उसके बाद सबसे मिल ले और हाँ, उस दिन जो जुबान लड़ाई न बड़ों से, उसके लिए माफी माँगना मत भूलना! समझी!” कहते हुए अनुमेधा ने उसके सिर पर हल्की-सी चपत लगाई।

“माँ! आपसे माँगी किसी ने माफी? गलती तो उनकी भी थी न?” भुविका ने कहा तो माँ बोली, “बेटा! वो बड़े हैं और बड़ों से ऐसी अपेक्षा ठीक नहीं।”

“ये क्या बात हुई माँ! कोई बड़ा है! अपने आप में महान! तो कोई छोटा है! नासमझ बेचारा!... तो एक बात बताओ! आप क्या हो? आप अपना बताओ न माँ! आप हो क्या? कोई पंचिंग बैग? हैं? हद है माँ!”

भुवि को गुस्से से आपा खोते देख अनुमेधा उसके कंधे पर हाथ रखकर बोली, “शांत!... शांत हो जा मेरी काली माई! अच्छा ठीक है! तू कहती है तो मैं ध्यान दूँगी तेरी बात पर! ठीक है! पर अभी तू बस शांत हो जा!”

कहते हुए उसने बेटी के कंधे को सहलाया तो वह माँ का हाथ पकड़कर बोली, “माँ! आप मुझे भी समझो न! थोड़ा तो समझो मुझे! मुझे अच्छा नहीं लगता आपको इस हाल में देखना। नहीं लगता मुझे अच्छा जब कोई आप पर गुस्सा करता है! चाहे पापा भी करें न तो बहुत बुरा लगता है मुझे! मन करता है...”

“बस्स! बस... मैं समझ गई। अब कोई मुझ पर गुस्सा नहीं करेगा! ठीक है!” भुविका की बात बीच में ही काटते हुए अनुमेधा आगे बोली, “पर तू किसी से कुछ नहीं बोलेगी! समझी! देख भुवि! बच्चों का ऐसे गुस्सा करना, बड़ों के मुँह लगना बिल्कुल भी अच्छी बात नहीं! लोग सोचते हैं माँ ने अच्छे संस्कार नहीं दिए अपने बच्चों को। तू चाहती है कि कोई मेरी परवरिश पर सवाल उठाए?”

“माँ! तो आप ये चाहती हैं कि मैं आप जैसी बन जाऊँ? आप जैसा सोचूँ? सबकी भलाई, घर की सुख-शांति वगैरह-वगैरह... इसके लिए आपके जैसे ही समझौते करना सीखूँ?” भुवि ने माँ की आँखों में आँखें डालकर पूछा तो वह नजर चुराकर मरी-सी आवाज में बोली, “करना ही पड़ता है, इतना तो सभी को।”

“माँ! एक बार और सोच लीजिए कि पक्का दूसरा कोई ऑप्शन नहीं होता जीवन में? माँ! जैसा कि सभी कहते हैं कि मैं आप पर गई हूँ। है न! तो ठीक रहेगा न कि मैं भी अपने आगे का जीवन आप जैसा रो-धोकर बिता लूँ? किसी के ताने सुनकर रोऊँ, तो किसी के एक-आधे थप्पड़ को नॉर्मल समझकर सह लूँ? आत्मसम्मान को ताक पर लगा, बस घर की सुख-शांति के लिए सही-गलत का विचार भी न करूँ? है न माँ?”

“नहीं! बिल्कुल भी नहीं! क्या इसीलिए तुझे इतना पढ़ा-लिखाकर आत्मनिर्भर बनाया है?” व्याकुल होकर कहा उसने तो भुविका ने भी आँखों में आँखें डालकर पलटकर कहा, “वही तो माँ! आप भी तो पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर थीं न! फिर सबके कहने पर आपने अपनी जॉब छोड़ गृहिणी बनने का फैसला लिया और फिर हर ज्यादती को सहते-सहते आज खुद को ही भूल गईं! कभी सोचा आपने कि नानी औरों पर क्या बीतती होगी आपकी ये हालत देखकर?”

भुवि की बातें सुन अनुमेधा सोच में पड़ गई। एक पल में उसका सारा अतीत किसी चलचित्र की तरह उसकी आँखों के सामने आ गया। याद किया उसने कि कैसे-कैसे मजबूरियों ने उसे इस कदर बदलने को विवश किया। जीवन के इस लंबे सफर में पग-पग पर कैसे वह थोड़ा-थोड़ा मरती गई। हाँ! मरती ही तो गई, तभी तो इस तरह भावशून्य-सी हो गई, जिसे सबने उसकी बेवकूफी और मजबूरी समझ लिया। और जरा भी नहीं चूके उसे कभी भी कुछ भी कहने में... सही ही तो कह रही है भुवि, उसे पंचिंग बैग!

पर अब और नहीं! इससे पहले कि मेरी बेटी को मेरे लिए सबसे झगड़कर सबकी नजरों में बुरा बनना पड़े या फिर मुझे देख, मेरा ही अनुसरण कर वह भी अपना जीवन दुखों से भर ले, मुझे फिर से पहली वाली अनुमेधा बनना होगा। हाँ! मुझे बदलना होगा! अपने बच्चों के लिए ही तब भी इस तरह बदली थी और अब इन्हीं के लिए वापस लौटना होगा...

अगले दिन से ही पूरे घर में खुसर-फुसर शुरू हो गई। सास और पति को तो उसके ये तेवर फूटी आँख नहीं सुहाते थे। जब सहन न हुआ तो एक दिन सुबह नाश्ता करते समय, जब सब डाइनिंग टेबल पर थे, तभी सास अपने वही पुराने हथियार का सहारा लेकर अपने बेटे से बोली, “जरा अपने सासरे फोन लगा तो! बताती हूँ उन्हें इसकी करतूतें! वो भी तो देखें, क्या गुल खिला रही है उनकी बेटी यहाँ पर!”

उम्मीद के विपरीत आज अनुमेधा बड़ी शांति से बोली, “भुवि! लगा तो बेटा! नानी को फोन लगा और दादी को दे दे, हाँ! स्पीकर ऑन कर देना।”

भुवि, जो पहले ही सबके हाल देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रही थी, माँ की बात सुन उसकी मुस्कान और बड़ी हो गई।

“जी माँ! अभी देती हूँ!” कहकर उसने नानी का नंबर डायल किया तो दादी के चेहरे का रंग बदल गया। बड़ी कशमकश में सोचने लगी कि भुवि को फोन लगाने से कैसे रोके! आज तक तो कभी ऐसी नौबत आई ही नहीं। इससे पहले ही अनु गिड़गिड़ाकर माफी माँग लिया करती थी, पर आज देखो तो इसके तेवर!

जब तक वह बेटे को कुछ इशारा करती, तब तक भुवि फोन लगा चुकी थी। उधर से नानी ने कुशल-मंगल पूछने के बाद सुबह-सुबह फोन करने का कारण पूछा तो भुवि बोली, “नानी! दादी आपसे बात करना चाहती हैं।”

“क्या बात है, आज समधन जी ने सुबह-सुबह याद किया, कुछ खास बात है क्या?” नानी ने पूछा।

तो भुवि बोली, “जी नानी! शायद दादी आपको बधाई देना चाहती हैं!”

“बधाई! किस बात की?” नानी की आवाज में आश्चर्य था।

“वो क्या है न नानी! आजकल उनकी बहू में आपकी बेटी का पुनर्जन्म जो हो गया है! तो बधाई तो बनती है न।”

कहकर भुविका हँसी और फोन दादी की तरफ घुमाया, पर दादी तब तक वहाँ से जा चुकी थीं। उसने पापा की तरफ देखा तो वे भी हड़बड़ाकर उठे और चल दिए। बुआ, चाचा-चाची सभी एक-एक कर उठ खड़े हुए।

“हेलो! समधन जी!” उधर से नानी की आवाज आई तो भुवि बोली, “नानी! अभी तो फिलहाल आप मेरी बधाई लीजिए। और अपनी बेटी को पुनर्जन्म की बधाई दीजिए।”

कहते हुए भुवि ने माँ को फोन दिया तो अनुमेधा ने एक हाथ में फोन लेते हुए दूसरी हथेली बेटी की तरफ पसार दी। जोर से ताली बजाकर भुवि खुशी से माँ से लिपट गई।


 


✨धन्यवाद🙏

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टिप्पणियाँ

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 22 जून 2023 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आ.रविन्द्र जी ! रचना को मंच प्रदान करने हेतु ।

      हटाएं
  2. हार्दिक धन्यवाद आ.शास्त्री जी !मेरी रचना चयन करने हेतु ।
    सादर आभार ।

    जवाब देंहटाएं
  3. गोपेश मोहन जैसवाल25 जून 2023 को 4:03 pm बजे

    बहुत ख़ूब !
    जब जागो, तभी सवेरा है.

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह! सुधा जी बहुत खूब शीशे पर से बस धूल भरी पोंछनी थी।
    सुंदर सार्थक कथा।

    जवाब देंहटाएं
  5. उत्तर
    1. अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आपका भारती जी !

      हटाएं
  6. सकारात्मकता जगाती बहुत ही प्रेरक कहानी।
    ऐसी कहानियों की निहायत आवश्यकता है।
    साझा करने के लिए आपका आभार सखी।

    जवाब देंहटाएं
  7. अनुमेधाओं को पुनर्जन्म के लिए भुवि जैसी बेटियों की सख़्त ज़रूरत है समाज में। लाजवाब सृजन के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें सुधा जी ।

    जवाब देंहटाएं
  8. साकारात्मक, बहुत सार्थक लेखन ...
    आज के समय में ऐसी पोसितिविटी की बहुत ज़रुरत है ...

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  9. बहुत प्रेरक, शानदार रचना के लिए हार्दिक बधाई !

    जवाब देंहटाएं
  10. इतनी शानदार कहानी मैंने विलंब से पढ़ी सुधाजी। बहुत अच्छी, सचमुच बहुत ही अच्छी कहानी लिखी है आपने। प्रशंसा हेतु शब्द कम पड़ रहे हैं।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी प्रशंसात्मक टिप्पणी पाकर सृजन सार्थक हुआ आदरणीय जितेन्द्र जी !
      हृदयतल से आभार एवं धन्यवाद आपका ।

      हटाएं

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